अखिल भारतीय साहित्य परिषद का 17वां अधिवेशन: अमित कुशवाहा का 'स्व जागरण संदेश'
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अखिल भारतीय साहित्य परिषद का 17वां अधिवेशन: अमित कुशवाहा का ‘स्व जागरण संदेश’

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन में प्रो. अमित कुशवाहा ने स्व का जागरण पर विमर्श किया। लोकगीत, वेद-उपनिषदों से आत्मबोध की चर्चा। जानें कैसे स्व जागरण से राष्ट्र विकास और श्रेष्ठ समाज का निर्माण होता है।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Nov 8, 2025, 11:56 pm IST
in मध्य प्रदेश
Akhil bhartiya Sahitya Parishad Amit kushwaha

मंच पर बोलते अमित कुशवाहा

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन के तीसरे सत्र के दूसरे वक्ता के तौर पर अपना वक्तव्य देते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफेसर अमित कुशवाहा ने स्व के जागरण विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि स्व का जागरण लोकगीत, लोक संगीत, वेशभूषा, भवन इन सब से ही अल्हादित होता है। इस प्रक्रिया में हम लगातार आगे बढ़ रहे हैं औऱ जैसे-जैसे मानवमात्र में इस स्व का जागरण होगा। ये हमारे अंदर आत्मबोध के रूप में मौजूद होगा।

जिस दिन स्व का जागरण हो गया, तो उस दिन उस राष्ट्र का विकास हो जाएगा। इस अधिवेशन का थीम है आत्मबोध से विश्व बोध। जब हम वेद, पुराण और उपनिषदों की बात करते हैं तो आत्मबोध हमारी संस्कृति का मूल मंत्र है। अपने सनातन धर्म के माध्यम से अपने हिन्दू साहित्य को लेकर लिखे गए उस हजारों वर्षों के साहित्य की जब मूल को देखते हैं तो एक ही चीज का पता चलता है और वो है स्व का जागरण। हम हिन्दुओं के लिए स्व का जागरण कितना अनिवार्य है इसे आज हम विमर्श के तौर पर देख रहे हैं।

स्व की जनजागृति का अभियान पूरे राष्ट्र में चल रहा है। ये प्रक्रिया बहुत ही पुरातन प्रक्रिया है, जो कि हर कालखंड में उस आत्मबोध और उस स्व को लेकर चिंतन और विमर्श हमारे भारतीय मनीषियों ने हमेशा किया है। उपनिषद में एक शब्द आत्मनानम् विधि का प्रयोग आता है। इसका अर्थ है खुद को जानो औऱ जब एक बार हम खुद को जान लेते हैं तो मन के भीतर का राग, द्वेष, कलुषित विकारों से हम दूर चले हैं। तभी सही मायनों में हम अपने आत्मबोध को जानते हैं और अपनी असली शक्ति को पहचानते हैं।

खुद को जानने वाला ही श्रेष्ठ समाज का निर्माण कर सकता है

अमित कुशवाहा कहते हैं कि जब हम आत्मबोध के माध्यम से अपनी शक्ति को पहचान लेते हैं तो हम एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण कर पाते हैं। जब हम आत्मबोध से मानवता को जानते हैं। एक मनुष्य़ का एक मनुष्य़ के प्रति एक तत्व मषि होता है। इसका अर्थ ये है कि जो हमारे बाहर परिलक्षित होता है वही हमारे भीतर होता है। भारत की ही बात करें तो यहां इतनी विवधताएं है, लेकिन, इन सब के बीच एक तत्व भारतत्व का जो बोध है वो इतनी विवधताओं के बाद भी हमें जोड़े हुए है।

चाहे सब कुछ परिवर्तित हो जाए, लेकिन हम सब में एक बात सामान्य है और वो ये कि हम सब हिन्दू हैं और इस अनुभूति का तत्व ही आत्मबोध है और यही हमारा मूल है।

 

Topics: सनातन धर्मअमित कुशवाहाअखिल भारतीय साहित्य परिषदराष्ट्र विकासSanatan DharmaAwakening of selfउपनिषदworld realization through self-realizationAll India Sahitya ParishadHindu literaturenational developmentAmit KushwahaSelf-RealizationUpanishadस्व का जागरणआत्मबोधआत्मबोध से विश्व बोधहिंदू साहित्य
कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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