काशी की देव दीपावली: जब गंगा किनारे उतरती है आकाशगंगा, जानिए इस अद्भुत पर्व की कहानी
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काशी की देव दीपावली: जब गंगा किनारे उतरती है आकाशगंगा, जानिए इस अद्भुत पर्व की कहानी

देश की सांस्कृतिक राजधानी काशी का देव दीपावली महोत्सव बीते दो-ढाई दशकों में देश दुनिया में अपनी अलग पहचान बन चुका है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by Mahak Singh
Nov 5, 2025, 12:19 pm IST
in उत्तर प्रदेश

देश की सांस्कृतिक राजधानी काशी का देव दीपावली महोत्सव बीते दो-ढाई दशकों में देश दुनिया में अपनी अलग पहचान बन चुका है। जगद्गुरु आदि शंकराचार्य की प्रेरणा से प्रारंभ होने वाला यह दीप महोत्सव बीती सदी में केवल पंचगंगा घाट की शोभा बढ़ाता था जो अब विस्तृत होकर तीन किलोमीटर की अर्धचंद्राकार परिधि में फैले काशी के समस्त 80 घाटों को अपने दायरे में समेट चुका है। जानना दिलचस्प हो कि काशी में चार “लाखा” मेलों की अति प्राचीन परंपरा है जिसमें एक लाख से अधिक भक्त व दर्शक जुटते हैं। ये चार लाखा मेले हैं- नाटी इमली का भरत मिलाप, तुलसी घाट की नागनथैया, चेतगंज की नटैया और रथयात्रा मेला तथा रामनगर की रामलीला; लेकिन काशी के घाटों पर संपन्न होने वाले देव दीपावली महोत्सव के मौके पर जुटने वाली लाखों की भीड़ ने इसे काशी के पांचवें “लाखा” मेले का रूप दे दिया है।

“तमसो मा ज्योर्तिमय” का पावन संदेश देता है पंचगंगा घाट का दीपस्तंभ

ज्ञात हो कि देव दीपावली की आधुनिक परम्परा का शुभारम्भ सबसे पहले 1915 में पंचगंगा घाट में हजारों दिये जलाकर किया गया था। देव-दीपावली उत्सव को आधुनिक रूप स्वरूप में लाने के पीछे महारानी अहिल्याबाई होलकर का योगदान अविस्मरणीय है। महारानी होलकर ने प्रसिद्ध पंचगंगा घाट पर एक हजार दीपों वाला एक भव्य प्रस्तर स्तम्भ स्थापित कर इस उत्सव को परंपरा और आधुनिकता का जो अनूठा रूप दिया था, वह आज तक कायम है। देव दीपावली के दिन पंचगंगा घाट का यह “हजारा दीपस्तंभ” 1001 दीपों की लौ से जगमगा कर प्रत्येक भावनाशील श्रद्धालु को “तमसो मा ज्योर्तिमय” का पावन संदेश देता है। यही नहीं, देव दीपावली उत्सव को भव्यता प्रदान करने में पूर्व काशी नरेश स्वर्गीय डॉ. विभूतिनारायण सिंह का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। काशी नरेश के सहयोग से स्वामी रामनरेशाचार्य जी, नारायण गुरु किशोरी रमण दुबे “बाबू महाराज” (गंगोत्री सेवा समिति, दशाश्वमेध घाट), सत्येन्द्र मिश्र “मुन्नन जी” (गंगा सेवानिधि) तथा कन्हैया त्रिपाठी (गंगा सेवा समिति) ने इस समारोह को भव्य आयाम प्रदान किया था।

आज देवदीपावली के इस भव्य उत्सव में मुख्य सहभागी होते हैं- काशी, काशी के घाट और काशी के लोग। धार्मिक एवं सांस्कृतिक नगरी काशी के इस विश्वविख्यात आयोजन में जब रविदास घाट से लेकर आदि केशव तक के समस्त ऐतिहासिक घाटों के समेत वरुणा के तट एवं घाटों पर स्थित देवालय, महल, भवन, मठ-आश्रम जब असंख्य दीपकों और झालरों की रोशनी से जगमगा उठते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि मानो काशी में समूची आकाशगंगा ही उतर आयी हो।

लाखों दीपों की साक्षी में महाआरती का अनुष्ठान

धर्मशास्त्रों में कार्तिक पूर्णिमा का खूब महिमा गान मिलता है। तमाम पौराणिक, धार्मिक, आध्यात्मिक व सामाजिक प्रसंग इसकी महत्ता को उजागर करते हैं। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार कार्तिक अमावस्या के दिन मनुष्य लोक में दीपोत्सव के उपरान्त इस पावन तिथि को देवगण दीपावली मनाते हैं। कार्तिक पूर्णिमा की संध्याबेला में कल-कल बहती सदानीरा गंगा के तट पर बसी शिव नगरी के अस्सी घाटों पर वैदिक मंत्रों के बीच शास्त्रोक्त विधि से प्रज्ज्वलित लाखों दीपों की साक्षी में जब महाआरती का अनुष्ठान किया जाता है तो चहुंओर एक दिव्य आभामंडल की सृष्टि हो जाती है। विश्व की प्राचीनतम नगरी में देव दीपावली के इस नयनाभिराम अलौकिक दृश्य को अपनी आंखों में संजो लेने के लिए प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु व विदेशी अतिथि गांगाघाटों पर उमड़ पड़ते हैं।

शास्त्रीय मान्यता के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि को गंगापूजन के उपरान्त घाटों पर जगमगाते असंख्यों दीपकों व आकाशदीपों (कंदीलों) की जगमगाती रोशनी में दीपदान के माध्यम से देवाराधन और पितरों की अभ्यर्थना का दिव्य भाव ही इस देवपर्व का प्राण तत्व है।

देव दीपावली से जुड़े रोचक पौराणिक कथानक

देव दीपावली की पृष्ठभूमि में अनेक पौराणिक कथानक निहित हैं। इस पर्व से जुड़े सर्वाधिक लोकप्रिय कथानक भोलेशिव से जुड़ा है। त्रिपुरासुर को नष्ट करने के कारण महादेव को त्रिपुरांतक कहा जाता है। महाभारत के कर्णपर्व में त्रिपुरासुर की वध की कथा बड़े विस्तार से कही गयी है। कथा है कि शिवपुत्र कार्तिकेय के द्वारा तारकासुर के वध से क्रोधित उसके तीनों बेटों ने पिता की मौत का बदला लेने के लिए घोर तपस्या से ब्रह्मा को प्रसन्न कर अजेय और अमर होने का वरदान मांगा। इस पर पितामह ने कहा वे उन्हें अमरता का वरदान नहीं दे सकते किन्तु वे कुछ ऐसा मांग सकते हैं जिससे उनकी मृत्यु आसानी से न हो सके। इस पर तीनों असुर भाइयों ने खूब विचार विमर्श कर ब्रह्माजी से यह वरदान मांगा कि वे उनके लिए अंतरिक्ष में उनकी इच्छानुसार चलने तथा रूप व आकर बदलने वाली तीन पुरियों का निर्माण कर दें और उन पुरियों के भीतर रहते उन्हें कोई भी मार न सके; जब वे तीनों पुरियां अभिजित नक्षत्र में एक पंक्ति में खड़ी हों; और कोई क्रोधजित महायोगी पूर्ण शांत मनोस्थिति में विलक्षण धनुष पर बाण का संधान करे तभी उनकी मृत्यु हो सके। ब्रह्माजी ने यह वरदान उन्हें दे दिया। वरदान के अनुसार तारकाक्ष के लिए स्वर्णपुरी, कमलाक्ष के लिए रजतपुरी और विद्युन्माली के लिए लौहपुरी का निर्माण विश्वकर्मा ने कर दिया।

तीनों भाई इन तीनों पुरियों में रहते हुए अपने आतंक से जब सभी देवशक्तियों को आतंकित कर दिया। तो थकहार कर सभी देवगण महादेव के पास गये। उनकी प्रार्थना पर महादेव ने अपने महान शिष्य दानवीर दधीचि की अस्थियों से निर्मित पिनाक धनुष से तीनों पुरियों समेत तीनों महाबली असुरों का अंतकर देवों को उनके आतंक से मुक्ति दिलायी। तभी से वे त्रिपुरान्तक कहलाये। वह पावन तिथि कार्तिक पूर्णिमा की थी। उन तीनों महाअसुरों के आतंक से मुक्त होने की खुशी में देवों ने दीपावली मनायी थी। इस उत्सव से जुडे़ एक अन्य प्रसंग के मुताबिक देवोत्थानी एकादशी के दिन श्री हरि चातुर्मास कालीन योग निद्रा से जागते हैं और हरिवल्लभा तुलसी के संग उनका पांच दिवसीय विवाह समारोह कार्तिक पूर्णिमा को ही सम्पन्न होता है। तत्पश्चात वे बैकुंठ लोक प्रस्थान कर जाते हैं। इस मंगलबेला में देवगण दीपोत्सव का आयोजन कर जगतपालक का अभिनंदन करते हैं।

एक अन्य रोचक पौराणिक प्रसंग भी इस पर्व से जुड़ा है। कहा जाता है कि एक बार किसी मसले पर नाराज होकर काशी के राजा दिवोदास ने अपने राज्य में देवताओं का प्रवेश प्रतिबन्धित कर दिया था। जब भोले शंकर को यह बात ज्ञात हुई तो उन्होंने कार्तिक पूर्णिमा के दिन रूप बदल कर काशी के पंचगंगा घाट पर आकर गंगा स्नान-ध्यान किया। यह बात जब राजा दिवोदास को पता चला तो उन्हें अपनी भूल कर अहसास हुआ और उन्होंने देवताओं के नगर प्रवेश के प्रतिबन्ध को हटा दिया। तब सभी देवगणों ने काशी में प्रवेश कर दीप जलाकर दीपावली मनायी। मान्यता है कि वह शिव नगरी की प्रथम देव दीपावली थी।

यह भी कहा जाता है कि इसी दिन प्रलयकाल में वेदों की रक्षा के लिए तथा सृष्टि को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही अपना प्रथम मत्स्य अवतार धारण किया था। यही नहीं, महाभारत के विनाशकारी युद्ध में योद्धाओं और सगे संबंधियों की मृत्यु से दुखी महाराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ गढ़मुक्तेश्वर में कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान व यज्ञ के उपरांत सूर्यास्त के बाद दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए दीपदान करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की थी।

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