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देव दीपावली की इस तरह हुई शुरुआत, होती है अरुणाचलम पर्वत की परिक्रमा, महारानी अहिल्याबाई होल्कर से भी जुड़ा है प्रसंग

मान्यता है कि महाभारत के विनाशकारी युद्ध में योद्धाओं और सगे-संबंधियों की मृत्यु से दुखी महाराज युधिष्ठिर ने भाइयों के साथ गढ़मुक्तेश्वर में कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान व यज्ञ किया था।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Nov 7, 2022, 11:40 am IST
inभारत, धर्म-संस्कृति
प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

तीनों लोक से न्यारी काशी में प्रकाश का पर्व दो-दो बार मनाया जाता है। पहला कार्तिक कृष्ण अमावस्या को और दूसरा कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को। अमावस्या को जब दीपावली मनाते हैं तो गणेश व लक्ष्मी का पूजन किया जाता है क्योंकि उस समय सृष्टि के संचालक भगवान विष्णु अपनी चातुर्मासीय योगनिद्रा में लीन होते हैं। देवोत्थान एकादशी को श्रीहरि जब अपनी योगनिद्रा त्याग कर जागृत होते हैं तो उनके स्वागत में देवगण काशी के पावन घाटों पर देव दीपावली का उत्सव मनाकर श्री हरि और मां लक्ष्मी का वंदन करते हैं।

महादेव ने किया था त्रिपुर असुरों का अंत

एक अन्य पौराणिक प्रसंग जो देवदीपावली उत्सव को आधार देता है, वह है महादेव द्वारा तारकासुर के तीन महाबलशाली पुत्रों का अंत। स्कन्द पुराण के कथानक के अनुसार शिवपुत्र कार्तिकेय द्वारा तारकासुर के वध से क्रोधित उसके तीनों पुत्रों (तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली) ने बदला लेने के लिए घोर तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया कि उन्हें जीतना असंभव हो गया। उन तीनों महाअसुरों ने असुर शिल्पी मयदानव से अंतरिक्ष में तैरने वाली तीन जादुई नगरियों स्वर्णपुरी, रजतपुरी और लौहपुरी का निर्माण कराया। ब्रह्मा जी से यह वर मिला था कि जब ये तीनों जादुई नगरियां अभिजित नक्षत्र में एक सीधी रेखा में आएं और उस वक्त यदि कोई क्रोधजित महायोगी असंभव रथ पर सवार होकर उन पर असंभव बाण का संधान करे तो ही उनकी मृत्यु हो सके। इस वरदान के कारण जब उन दानवों के आतंक से चहुंओर त्राहि त्राहि मच गयी तब देवशक्तियों की प्रार्थना पर भगवान शिव ने उन असुरों के अंत के लिए माया रची। उन्होंने पृथ्वी को अपना रथ बनाया, जिसमें सूर्य व चन्द्रमा उस रथ के पहिये बने। ब्रह्मा जी सारथी और विष्णु जी बाण बने; मेरुपर्वत उनका धनुष बना और नागराज वासुकि उस धनुष की प्रत्यंचा। महायोगी शिव ने अभिजित नक्षत्र में उन तीनों पुरियों के एक सीध में आते ही अपने विलक्षण बाण का संधान कर उनमें मौजूद तीनों महादैत्यों का अंत कर दिया। वह पावन तिथि थी कार्तिक पूर्णिमा। तीनों महाअसुरों के आतंक से मुक्त होने की खुशी में सभी देवताओं ने काशी के घाटों पर दीप जलाकर दीपोत्सव मनाया। वह शिव नगरी की प्रथम देव दीपावली थी।

कार्तिक पूर्णिमा से जुड़े पौराणिक संन्दर्भ

एक बार काशी के राजा दिवोदास ने देवताओं की किसी बात पर नाराज होकर उनका अपने राज्य में प्रवेश प्रतिबन्धित कर दिया। तब भगवान शंकर ने दिवोदास व देवों में सुलह करवाई जिस पर देवताओं ने काशी में प्रवेश कर कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीपावली मनायी। मान्यता है कि इसी दिन प्रलयकाल में वेदों की रक्षा के लिए तथा सृष्टि को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार धारण किया था। महाभारत के विनाशकारी युद्ध में योद्धाओं और सगे संबंधियों की मृत्यु से दुखी महाराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ गढ़मुक्तेश्वर में कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान व यज्ञ किया था। तभी से कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान की परम्परा शुरू हो गयी। इस दिन गंगास्नान सर्वाधिक फलदायी माना जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन तमिलनाडु में अरुणाचलम पर्वत की 13 किमी की परिक्रमा होती है, जिसमें भाग लेकर लाखों लोग पुण्य कमाते हैं। यह दिन बहुत खास है क्योंकि इसी दिन गुरु नानकदेवजी का जन्म भी हुआ था।

मनोमुग्धकारी आकाशगंगा का पावन संदेश

काशी देश की इकलौती ऐसी नगरी है जहां का देव दीपावली महोत्सव देश-दुनिया में अनूठी पहचान बना चुका है। जगद्गुरु आदि शंकराचार्य की प्रेरणा से यह दीप महोत्सव शुरू हुआ था। देव दीपावली की आधुनिक परम्परा की शुरुआत 1915 में पंचगंगा घाट में हजारों दिये जलाकर की गई थी। देव-दीपावली उत्सव को आधुनिक रूप स्वरूप में लाने के पीछे महारानी अहिल्याबाई होलकर का अविस्मरणीय योगदान है। महारानी होलकर ने प्रसिद्ध पंचगंगा घाट पर एक हजार दीपों वाला एक भव्य प्रस्तर स्तम्भ स्थापित कर इस उत्सव को परंपरा और आधुनिकता का जो अनूठा रूप दिया, वह आज तक कायम है। देव दीपावली के दिन पंचगंगा घाट का यह “हजारा दीपस्तंभ” 1001 दीपों की लौ से जगमग होकर प्रत्येक भावनाशील श्रद्धालु को “तमसो मा ज्योर्तिगमय” का पावन संदेश देता है। देव दीपावली उत्सव को भव्यता प्रदान करने में पूर्व काशी नरेश स्वर्गीय डॉ. विभूतिनारायण सिंह का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। काशी नरेश के सहयोग से स्वामी रामनरेशाचार्य जी, नारायण गुरु किशोरी रमण दुबे “बाबू महाराज” (गंगोत्री सेवा समिति, दशाश्वमेध घाट), सत्येन्द्र मिश्र “मुन्नन जी” (गंगा सेवानिधि) तथा कन्हैया त्रिपाठी (गंगा सेवा समिति) ने इस समारोह को भव्य आयाम प्रदान किया। आज देवदीपावली के इस भव्य उत्सव में मुख्य सहभागी होते हैं- काशी, काशी के घाट और काशी के लोग। इस विश्वविख्यात आयोजन में जब रविदास घाट से लेकर आदि केशव तक के समस्त ऐतिहासिक घाटों के समेत वरुणा के तट एवं घाटों पर स्थित देवालय, महल, भवन, मठ-आश्रम जब असंख्य दीपकों और झालरों की रोशनी से जगमगा उठते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि मानो काशी में समूची आकाशगंगा ही उतर आयी हो।

Topics: Kartik PurnimaGuru Nanak GurpurabGuru Nanakअरुणाचलम पर्वतमहारानी अहिल्याबाई होल्करArunachalam MountainsMaharani Ahilyabai HolkarDiwaliदेव दीपावलीकार्तिक पूर्णिमाDev Deepawali
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