'प्यार वासना नहीं': अनुच्छेद 142 की शक्तियों का इस्तेमाल कर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला
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‘प्यार वासना नहीं’: अनुच्छेद 142 की शक्तियों का इस्तेमाल कर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने POCSO एक्ट के तहत नाबालिग से प्रेम संबंध के मामले में सजा पलट दी। जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने आर्टिकल 142 के तहत इंसाफ किया, कहा- ये प्यार था, वासना नहीं। अब शादीशुदा कपल और बच्चे के साथ शांतिपूर्ण जीवन।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Nov 1, 2025, 07:32 am IST
inभारत
Supreme court

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे केस को पलट दिया जहां एक शख्स को POCSO एक्ट के तहत नाबालिग लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए 10 साल की सजा सुनाई गई थी। कोर्ट ने कहा कि ये रिश्ता प्यार का था, न कि वासना का। शीर्ष अदालत ने ये फैसला आर्टिकल 142 के स्पेशल पावर से लिया जो कोर्ट को कानून से ऊपर उठकर इंसाफ करने की ताकत देता है। आरोपी और वो लड़की अब शादीशुदा हैं, उनका एक बच्चा भी है। पत्नी ने कोर्ट में कहा कि वो अपने पति और बच्चे के साथ शांतिपूर्ण जिंदगी जीना चाहती है। कोर्ट ने इसे मान लिया और केस को खारिज कर दिया।

क्या है पूरा मामला?

मामला कुछ यूं है कि ये सब तब शुरू हुआ जब आरोपी और पीड़िता के बीच प्रेम हुआ था। इसके बाद दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बना। उस वक्त लड़की नाबालिग थी। इसी के बाद लड़की के परिवार ने पुलिस में शिकायत की। उसके खिलाफ POCSO एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया। मामला कोर्ट पहुंचा। आरोपी को पकड़ा गया। कोर्ट ने इसे सीरियस अपराध माना क्योंकि कानून में उम्र की सख्त सीमा है। लेकिन बाद में कपल ने शादी कर ली और उनका परिवार बस गया। पत्नी ने बताया कि वो अपने पति पर निर्भर है, और जेल की सजा से उनका घर टूट जाएगा।

ट्रायल कोर्ट ने क्या किया

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराया। POCSO एक्ट के सेक्शन के तहत 10 साल की सख्त सजा दी गई। कोर्ट का कहना था कि ये अपराध नाबालिग के खिलाफ था, इसलिए कोई ढील नहीं। आरोपी जेल चला गया। लेकिन अपील के चक्कर में मामला ऊपर चढ़ता गया।

सुप्रीम कोर्ट बोला-प्यार वासना नहीं

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह की बेंच ने अपील सुनी। उन्होंने केस की फाइलें देखीं और पाया कि अपराध वासना से नहीं, बल्कि प्यार से हुआ था। कोर्ट ने कहा कि आरोपी को जेल में रखना पीड़िता, उसके पति और बच्चे सबको नुकसान पहुंचाएगा। इसलिए आर्टिकल 142 का इस्तेमाल किया, जो कानून से ऊपर इंसाफ कराने की पावर देता है। केस को खत्म कर दिया गया। लेकिन शर्तें लगाईं: आरोपी अपनी पत्नी या बच्चे को कभी नहीं छोड़ेगा। उन्हें सम्मान से मेंटेन करेगा। अगर ऐसा न किया, तो पत्नी या बच्चा या शिकायतकर्ता कोर्ट में बताए, तो सजा और सख्त हो जाएगी। कोर्ट ने ये भी कहा कि ऐसी कंसेंशुअल रिलेशनशिप्स को क्रिमिनल न बनाया जाए।

पत्नी की गुहार

पीड़िता जो अब पत्नी है, ने कोर्ट को चिट्ठी लिखी। उसने कहा कि वो अपने पति के बिना जिंदगी नहीं चला सकती। बच्चे की परवरिश के लिए पति जरूरी है। वो चाहती है कि परिवार बिना अपराधी के दाग के खुश रहे। कोर्ट ने इस दर्द को समझा और सहानुभूति दिखाई।

जजों के महत्वपूर्ण बयान

सुनवाई के दौरान एक जज ने कहा, “हमें लगता है कि ये वो केस है जहां कानून को न्याय के आगे झुकना चाहिए।” कोर्ट ने ये भी कहा, “पत्नी की दया और सहानुभूति की पुकार को नजरअंदाज करना इंसाफ नहीं होगा।” POCSO अपराध पर कहा, “हमने देखा कि ये क्राइम वासना का नतीजा नहीं, बल्कि प्यार का था।” कोर्ट ने ये भी कहा कि पीड़िता खुद चाहती है कि वो अपने पति के साथ शांत जिंदगी जिए, बिना अपराधी के निशान के। हालांकि, राहत के साथ ही अदालत ने चेतावनी दी, “अगर भविष्य में कोई गलती हुई और पत्नी या बच्चा बताए, तो परिणाम बुरे होंगे।”

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कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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