अचलेश्वर महादेव धाम मेला 2025 : पंजाब में है भगवान कार्तिकेय की तपोभूमि, जानिए पौराणिक महत्व
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अचलेश्वर महादेव धाम मेला 2025 : पंजाब में है भगवान कार्तिकेय की तपोभूमि, जानिए पौराणिक महत्व

अमृतसर रोड स्थित अचलेश्वर महादेव धाम में भगवान कार्तिकेय की तपोस्थली पर नवमी-दशमी का 2 दिवसीय मेला 31 अक्तूबर से आरंभ हो रहा है।

Written byराकेश सैनराकेश सैन
Oct 30, 2025, 04:26 pm IST
inधर्म-संस्कृति, पंजाब

वेद-पुराणों में सप्तसिन्धू कहे जाने वाली पंजाब की पग-पग भूमि पौराणिक आख्यानों की साक्षी रही है। भक्त प्रह्लाद की नगरी मुल्तान रही तो रघुवंशी श्रीराम के पुत्र लव की नगरी लाहौर, कुश की नगरी कसूर, तक्ष की नगरी तक्षशिला इत्याति अनेकों स्थल हैं जो इस धरा को पावन बनाते हैं। इन्हीं पुण्य भूमियों में एक स्थान है अचलेश्वर धाम, जो अमृतसर रोड पर स्थित बाबा बकाला से बटाला जाती सड़क पर स्थित है। यह वही स्थान है जहां भगवान शिव ने अपने पुत्रों गणपति व कार्तिकेय की बुद्धि की परीक्षा ली।

अचलेश्वर धाम से जुड़ी पौराणिक कथा

इस स्थान से जुड़ी पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान भोलेनाथ कैलाश पर्वत पर माता पार्वती के संग विराजमान थे। भोलेनाथ के मन में विचार आया कि क्यों न अपने पुत्रों की बुद्धि कौशल की परीक्षा ली जाए। इसके लिए भगवान भोलेनाथ ने अपने दोनों पुत्रों से कहा कि उनमें से जो पहले ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करके पहले कैलाश पर पहुंचेगा, वही उनका उत्तराधिकारी होगा।

गणेश और कार्तिकेय की परिक्रमा कथा

कार्तिक का वाहन मोर है। यह सुनकर कार्तिक अपने वाहन मोर पर सवार होकर परिक्रमा के लिए उड़ गए। दूसरी तरफ गणेश जी भी मूषक की सवारी ले चल दिए। कार्तिकेय जी की गति तेज थी और लगने लगा था कि वे विजयी होंगे। लेकिन गणेश जी को रास्ते में नारद जी मिल गए। उन्होंने गणेश जी को ज्ञान दिया कि समस्त लोक तो माता-पिता के चरणों में है। ऐसा सुनते ही श्री गणेश जी वापस कैलाश पर आकर अपने माता-पिता की परिक्रमा करने लगे और अपना काम पूर्ण कर अंत में प्रणाम किया।

अचलेश्वर धाम का उद्गम

इस पर भगवान शिव ने अपना उत्तराधिकारी श्री गणेश को बना दिया। आकाश में भ्रमण कर रहे कार्तिक जी को जब पता चला तो वह रूठ कर नीचे उतर आए और निराश भाव से इस स्थान पर विराजमान हो गए, जिसे आज अचलेश्वर धाम के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि कार्तिकेय जी यहां रम गए, अचल हो गए, इसी कारण इस स्थान को अचलेश्वर धाम कहा जाने लगा। यह जानकर भगवान शंकर 33 करोड़ देवी-देवताओं सहित आए और उन्हें मनाना चाहा, लेकिन कार्तिक नहीं माने और अचल रहे। तब भगवान शंकर जी ने उन्हें अचलेश्वर महादेव की उपाधि देकर उनका यहां निवास स्वीकार कर लिया। इसलिए यह स्थान हिंदू धर्म में महापूज्य है।

गुरु नानक देव जी का आगमन

इसी जगह पर हर साल कार्तिक माह की नवमीं-दसवीं को यह मेला लगता है। कहते हैं कि अपने जीवनकाल में सिख परंपरा के प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव जी भी यहां तीर्थाटन को आए और यहां पर सिद्धों के साथ गोष्ठी की। उनकी स्मृति में मंदिर के सामने गुरुद्वारा भी स्थापित है।

अचलेश्वर धाम में लगने वाला मेला

भगवान शिव के पुत्र स्वामी कार्तिकेय की तपोस्थली श्री अचलेश्वर महादेव धाम में लगने वाला नवमी-दशमी का 2 दिवसीय मेला 31 अक्तूबर शुक्रवार से शुरू हो रहा है। दो दिनों के मेले में श्रद्धालु शिवालय के सरोवर में डुबकी लगाएंगे और शिवालय व गुरुद्वारा साहिब में नतमस्तक होंगे।

श्रद्धालुओं के लिए की गई व्यवस्थाएं

प्रबंधकों ने मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पर्याप्त प्रबंध किए हैं। रात को विशेष धार्मिक आयोजन किए जाएंगे। खरीदारी के लिए दुकानें सज गई हैं। इसके अलावा पंजाब समेत दूसरे राज्यों से साधु-संत पहुंच गए हैं।

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