भारत के पड़ोसी जिन्ना के जिहादी सोच के देश द्वारा पहलगाम में किए गए आतंकवादी हमले के बाद, भारत ने सिंधु जल संधि निरस्त करके उस देश को घुटनों पर ला दिया है। अब उस देश की बची—खुची कसर या कहें हेकड़ी अफगानिस्तान की तालिबान हुकूमत निकालने जा रही है। खबर है कि तालिबान के शीर्ष नेताओं ने अफगानिस्तान से बहकर पाकिस्तान जा रही कुनार नदी पर बांध बनाने का फैसला किया है।
इस योजना के अमल में आने के बाद पाकिस्तान को पानी के मोर्चे पर दोहरा झटका लगना और गंभीर जल संकट पैदा होना तय माना जा रहा है। पाकिस्तान बेशक अब दो मोर्चों से जल संकट के दबाव में होगा, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों को लगता है, वह इसे खुलकर नहीं स्वीकारेगा और उसका जिहादी सोच का जनरल असीम मलिक भारत और अफगानिस्तान को लेकर वैश्विक मंचों पर झूठ फैलाता रहेगा।
उल्लेखनीय है कि भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद 1960 की सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया था, जिसके तहत पाकिस्तान को सिंधु और उसकी सहायक नदियों का पानी मिलता था। भारत की इस कार्रवाई से पाकिस्तान की जलापूर्ति पर गंभीर असर पड़ा है, क्योंकि पाकिस्तान को मिलता रहा लगभग 76 प्रतिशत पानी इसी नदी प्रणाली से जाता था। यह पानी पाकिस्तान की 80 प्रतिशत कृषि भूमि को सींचता था और उसकी कई बिजली परियोजनाओं के लिए भी जरूरी था।
भारत फिलहाल करीब 5-10 प्रतिशत से अधिक पानी को रोक पाने की क्षमता रखता है, क्योंकि बांध निर्माण और जलाशय में समय लगता है, लेकिन जल संधि के निलंबन से पाकिस्तान की कृषि, विद्युत उत्पादन और शहरी जल आपूर्ति प्रभावित हुई है। इससे पाकिस्तान में खाद्य उत्पादन गिर सकता है और जल संकट तो गहरा ही गया है, जो वहां आर्थिक संकट और सामाजिक अशांति को जन्म दे रहा है। सिंधु नदी प्रणाली के पानी में कटौती से पाकिस्तान की सकल घरेलू उत्पाद पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है। इसके अलावा, भारत ने पानी के प्रवाह और बाढ़ चेतावनी का डेटा साझा करना भी बंद कर दिया है, जिससे बाढ़ से निपटने की पाकिस्तान की तैयारी प्रभावित हो रही है।
वहीं अब ताजा रिपोर्ट बताती हैं कि अफगानिस्तान की तालिबान हुकूमत ने कुनार नदी पर जल प्रवाह रोकने के लिए बांध बनाने का काम शुरू करने के निर्देश दिए हैं। इससे पाकिस्तान की जल स्थिति बेहद नाजुक हो जाएगी, क्योंकि कुनार नदी काबुल नदी की सहायक नदी है, जो पाकिस्तान में जलालाबाद के पास मिलती है और सिंधु बेसिन का हिस्सा है।
तालिबान के सुप्रीम नेता मौलवी हेब्तुल्लाह अखुंदजादा ने जल और ऊर्जा मंत्रालय को बांध बनाने का आदेश दिया है और घरेलू कंपनियों के साथ अनुबंध भी किए जा रहे हैं। इस कदम के पीछे जो कारण सामने आ रहा है वह है अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हाल के संघर्ष और पाकिस्तान की अक्खड़ता। भारत के सिंधु जल समझौते को निरस्त करने से पाकिस्तान पहले से ही जल संकट में था। अब अफगानिस्तान का उक्त कदम इस संकट को दोगुना करने जा रहा है। भारत ने अफगानिस्तान के शहतूत और सलमा बांध जैसी परियोजनाओं को वित्तीय और तकनीकी सहायता दी है, जो काबुल नदी और उसके सहायक नदियों पर बन रहे हैं।
पाकिस्तान पर “दो मोर्चों पर जल युद्ध” छिड़ने से जिन्ना के देश पर जल संकट का दवाब बढ़ता जाएगा। जैसा पहले बताया, इससे पाकिस्तान में कृषि, उद्योग और सामान्य जीवन प्रभावित होगा। इस जल युद्ध में भारत और तालिबान का गठबंधन पाकिस्तान के खिलाफ एक रणनीतिक चाल की तरह काम कर रहा है, जो पाकिस्तान को जल संसाधनों के मामले में घेर रहा है।
तालिबान का यह कदम न केवल एक रणनीतिक दबाव है, बल्कि यह दक्षिण एशिया में भू-राजनैतिक तनाव को भी बढ़ावा दे सकता है। सिंधु जल समझौते के स्थगित होने और कुनार नदी पर बांध के निर्माण से पाकिस्तान के सामने जल सुरक्षा और कूटनीतिक चुनौतियां और अधिक बढ़ जाने वाली हैं। पाकिस्तान को जल संकट और रणनीतिक अलगाव का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन इससे वह सीधे रास्ते पर आएगा, इसे लेकर संदेह बना हुआ है।
वर्तमान में उसे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप में अपना आका दिख रहा है और उनकी कथित शह पर जिन्ना के देश का फौजी कमांडर जनरल मुनीर बेतुके बयान दे रहा है। लेकिन पाकिस्तान की कुल जमा मंशा अमेरिका से पैसे ऐंठने की है। उसके लिए उसने अपने यहां के प्राकृतिक संसाधनों तक को दांव पर लगा दिया है। चीन पहले से उसे अपने झांसे में लिए हुए है। इसलिए जिन्ना का देश वस्तुस्थिति से अनभिज्ञ रहकर कल्पना लोक में जीने को ही अपना ‘स्वाभिमान’ मान रहा है।

















