राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक – आद्य सरसंघचालक डा. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने अपने त्यागपूर्ण जीवन मे यह मिसाल सबके सम्मुख रखी कि सामाजिक कार्यकर्ता कैसा हो। वैसे तो डॉक्टर साहब की धारणा थी कि प्रसिद्धि से परे रहें, किंतु उनके जीवन में स्वाधीनता आंदोलन में उनका योगदान, राष्ट्रीय कांग्रेस में सक्रिय सहभाग, हिंदुत्व की विचारधारा का प्रचार, संघ की संकल्पना एवं स्थापना आदि पर तत्कालीन और बाद के समाचार पत्रों में कई महत्वपूर्ण बातें प्रकाशित हुईं।
नागपुर में हुए कांग्रेस अधिवेशन के पहले ‘राष्ट्रीय मंडल’ की ओर से नागपुर से ‘संकल्प’ नाम से एक हिंदी साप्ताहिक प्रकाशित करने का विचार हुआ। इसके पूर्व ही नागपुर से मराठी में ‘ महाराष्ट्र’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू हो चुका था। महाकौशल के हिंदी भाषी क्षेत्र में डाक्टरजी को ‘संकल्प’ पत्रिका का संगठक नियुक्त किया गया। उस दरम्यान डाक्टरजी ने रायपुर जाने पर श्री ज्ञानरंजन सेन से संकल्प का ग्राहक बनने का अनुरोध किया तो श्री सेन बोले, “मेरे पास अंग्रेजी और बंगला समाचारपत्र आते हैं, अत: हिंदी समाचार पत्र लेने का क्या लाभ? इस पर डॉक्टर साहब का रुख जरा कड़ा हो गया। वे बोले, ‘ आपका संपूर्ण जीवन इस हिंदी भाषी प्रांत में बीत रहा है, फिर यहां की भाषा का समाचार पत्र लेने में इतना बोझ क्यों लग रहा है?’ इस पर श्री ज्ञानरंजनजी ने तुरंत / संकल्प के एक वर्ष के चंदे की राशि डॉक्टर साहब को सौंप दी।
सर्वोदयी नेता आचार्य दादा धर्माधिकारी बताते थे कि उन दिनों याने 1923 के मध्य में डा. हेडगेवार, श्री. विश्वनाथराव केलकर, खरे, श्री वासुदेवराव फडणवीस, श्री गोपालराव ओगले, श्री. बलवंतराव मंडलेकर आदि ने नागपुर में स्वातंत्र्य’ नाम की दैनिक पत्रिका निकालने का संकल्प किया था। एक-दो महीने प्रयास कर सहकारिता के आधार पर ‘स्वातंत्र्य प्रकाशन मंडल’ का गठन किया गया। इस मंडल के गठन के लिये डा. हेडगेवार एवं डा. खरे ने विदर्भ का सघन दौरा भी किया था। उन दिनों शिक्षा के क्षेत्र में प्रांत की जो पिछडी हुई स्थिति थी, उसे देखते हुए एक दैनिक निकालने का विचार अत्यंत साहस का काम था। उस समय विदर्भ सँभाग के मर्यादित पाठकों में ‘प्रजापति’ (अकोला), ‘उदय’ (अमरावती), ‘लोकमत’ (यवतमाल), ‘तरुण भारत’ (वर्धा), मारवाड़ी रणवीर’ एवं ‘ महाराष्ट्र’ (नागपुर) आदि साप्ताहिक पत्रिकाएँ स्थान-स्थान पर अपनी जड़ जमाये बैठे थे। फिर भी डाक्टरजी एवं उनके साथियों ने ‘स्वातंत्र्य’ के प्रकाशन का साहस कर दिखाया। नागपुर के चिटणीस पार्क के पास वेनिगीरी महाराज के बाड़े में ‘स्वातंत्र्य’ दैनिक का कार्यालय खोला गया तथा श्री विश्वनाथराव केलकर के संपादन में पत्र प्रारंभ किया गया।
डॉक्टर हेडगेवार इस प्रकाशक मंडल के प्रवर्तकों में से थे तथा पत्रिका के प्रारंभ से ही ‘स्वातंत्र्य’ के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने में वे प्रमुखता से भाग लेते थे । संपादक श्री विश्वनाथराव केलकर की सहायता हेतु मुंबई के सिद्धहस्त लेखक श्री अच्युतराव कोटकर को लाया गया और उसके बाद श्री गोपालराव ओगले ने कुछ दिनों तक ‘स्वातंत्र्य’ के संपादक का पदभार संभाला। उल्लेखनीय बात यह रही कि डा. हेडगेवार ‘स्वातंत्र्य’ पत्रिका से संबद्ध सभी प्रकार के काम तो करते थे, किंतु उन्होंने वेतन के नाम पर एक पैसा भी नहीं लिया।
1924 के अंत में यह स्पष्ट हो गया था कि ‘स्वातंत्र्य’ दैनिक ज्यादा दिनों तक नहीं चल पायेगा। उस वर्ष के आय-व्यय का हिसाब लगाने पर 10,784 रु. का घाटे का कारोबार बना था। अत: यह निश्चित किया गया कि इस मामले को समेटा जाय। ऐसे मुश्किल एवं चुनौती भरे समय में डॉक्टर साहब पत्रिका के संपादक बने और उन्होंने पत्रिका की ‘इति श्री’ लिखी। बावजूद इसके डाक्टरजी उसके संपादक बने तथा ‘स्वातंत्र्य’ पत्रिका का प्रकाशन नहीं चल पाया, किंतु उसके पीछे लगा एक मानहानि का मुकदमा आगे चलता ही रहा। इस सारी स्थिति पर टिप्पणी करते हुए डा. ना. मा. खरे ने ‘तरुण भारत’ में लिखा था कि ” पैसे के अभाव में तथा लोगों में उस समय दैनिक पत्र पढ़ने की पर्याप्त रुचि के अभाव में ही ‘स्वातंत्र्य’ की पहल सफल नहीं हो पायी”।
डाक्टर जी के जीवन में पत्रकारिता एवं पत्रिकाओं से संबद्ध दूसरा पड़ाव संघ की स्थापना के बाद आया स्पष्ट होता है। रा. स्व. संघ की स्थापना के बाद कुछ ही दिनों में नागपुर का माहौल इतना साहसभरा एवं चेतनायुक्त तथा गतिमान हुआ था कि उस समय हिंदुओं के आत्मविश्वास का किसी को भी अनुभव हो सकता था।
हिंदुओं के इसी आत्मगौरव को प्रकट करते हुए ‘ महाराष्ट्र’ ने 11 सितंबर की अपनी संपादकीय टिप्पणी में लिखा था, यह सत्य है कि मुसलमानों द्वारा एक बार खुराफत करने पर तथा धावा बोल देने पर हिंदुओं ने आधे घंटे के भीतर ही नागपुर के मोहल्ले मोहल्ले में पास- पड़ोस के लोगों को जमाकर मुसलमानों के उन ज्यादतियों का सामना करने की तैयारी कर ली। इसी के कारण शहर के कोष्टीपुरा यानी बुनकरों की बस्ती के लट्ठबाजों की मदद एवं सक्रियता से शहर के महल प्रभाग के निवासी मुसलमानों को मुंहतोड़ जवाब देने में सफल हो गये। अब यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि अब नागपुर का समूचा हिंदू समाज स्वयम् रक्षणम् ‘ हो गया है। यह समाज अब इसके आगे मुसलमानों की गुंडागर्दी से घबराकर भागने वाला नहीं है।”
9 सितंबर 1929 महाराष्ट्र’ में प्रकाशित समाचार के अनुसार “रा. स्व. संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार संघ कार्य के प्रसार के लिये छत्तीसगढ़ विभाग में गये, जहां उन्होंने तीन सप्ताह का प्रवास किया। अब उस विभाग में सभी जिला स्थानों पर संघ की शाखाएं स्थापित हो गयी हैं तथा इस विभाग का काम पूर्ण करके वे अब विदर्भ लौट आये हैं।”
1933 में नागपुर में संघ का शिविर
1933 में दिसंबर के अंतिम सप्ताह में नागपुर में अखिल महाराष्ट्र साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन संपन्न हुआ। उन्हीं दिनों नागपुर में संघ का शिविर भी चल रहा था। डाक्टरजी ने इस अवसर का लाभ उठाकर महाराष्ट्र के सैकड़ों विद्वानों को संघ कार्य पद्धति दिखाने की व्यवस्था की। लोकमान्य तिलक के एक समय के सहयोगी तथा मराठी पत्रिका ‘नवाकाल’ के संपादक श्री कृष्णाजी पंत तथा काका साहब खाडिलकर सम्मेलन के अध्यक्ष थे। डाक्टरजी के नियोजन के अनुसार काका साहब खाडिलकर के साथ सर्वश्री दत्तोपंत पोतदार, वा. म. जोशी, बाबुराव गोखले, धुलिया के शंकरराव देव, सरदार किवे, शाहीर खाडिलकर आदि मान्यवर लोग संघ का शिविर देखने जा पहुंचे।
जब संघ शिवर में पहुंचे काका साहब खाडिलकर
संघ के स्वयंसेवकों के अनुशासित जीवन का शिविर देखने आये सभी मान्यवर दर्शकों के मन पर जो प्रभाव हुआ वह श्री काका साहब खाडिलकर के भाषण में भली – भांति व्यक्त हुआ। स्वयंसेवकों का संचलन देखकर तो वे एकदम बोल उठे कि इस प्रसंग एवं गतिविधि के अनुसार काम करना ही उसका सही और वास्तविक वर्णन हो सकता है।” इसके अलावा शिविर में शामिल स्वयंसेवकों के समक्ष किये अपने भाषण में काका साहब खाडिलकर ने डाक्टर साहब के संगठन कुशलता की विशेष तारीफ करते हुए कहा, “हम साहित्यिक लोग तो वाग्वीर हैं, पर यहां संघ में तो इसकी प्रत्यक्ष साधना – उपासना हो रही है। यह इसी का दृश्य स्वरूप है। सहस्रों व्याख्यान देकर तथा लेख लिख कर हम जो उद्देश्य हासिल नहीं कर सकते, जो भाव लोगों के मन पर अंकित नहीं कर सकते, वह अहम काम संघ के शिविर के प्रत्यक्ष – दृष्य मात्र से संभव हो चुका है। यह वास्तविकता है कि इस वास्तविक एवं प्रत्यक्ष दृष्य स्वरूप से ही संघ के महान तत्वों का बोध हो सकता है।”
डाक्टरजी के बारे में अग्रणी मराठी पत्रिका ‘तरुण भारत’ के संस्थापक-संपादक एवं साहित्यकार श्री. ग.त्र्यं. तथा भाऊसाहब माडखोलकर ने लिखा था कि, “प्रजातंत्र के लिये उनकी (डा. हेडगेवार) वृत्ति इतनी अनुकूल एवं अडिग थी कि उनके सामाजिक – संगठन से संबद्ध आचरण – व्यवहार में साक्षात विरोधियों को भी सौजन्य मिलता रहता था”।
साप्ताहिक सावधान में प्रकाशन
संघ के सामाजिक स्वीकृति एवं विस्तार को लेकर साप्ताहिक ‘सावधान’ के अंक में एक समाचार प्रकाशित हुए जिसका शीर्षक था ” संघ के नागपुर जिला इकाई की छावनी।” उस समाचार के अनुसार रा. स्व. संघ के नागपुर जिले के स्वयंसेवकों की छावनी नागपुर के निकट हिंगणा रोड पर स्थित अंबाझरी स्थित कैंपिंग ग्राऊंड में 24 से 28 दिसंबर तक संपन्न हुई। छावनी में शामिल स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए नागपुर के वयोवृद्ध सामाजिक नेता एवं अधिवक्ता श्री. माधवराव तथा नानासाहब पाध्ये ने कहा था, “इस संघ के जनक एवं प्रेरक डा. हेडगेवार की नीति चतुरता, आदि की जितनी भी सराहना की जाए उतनी कम ही है। डाक्टरजी की इसी तपस्या से मैं बहुत प्रभावित हुआ हूं और यही कारण है कि स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के बावजूद भी मैं यहां उपस्थित हुआ हूं”। इस समाचार में सम्मिलित संघ से संबद्ध आस्था एवं डाक्टरजी के संगठन कुशलता – समर्पण की भावना विशेष रूप से अधोरेखित हो उठती है।
सरकार ने स्वीकार किया योगदान
स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात भी डा. हेडगेवार के समूचे योगदान की बात सरकारी तौर पर स्वीकार की गई है। दिसंबर 1985 में महाराष्ट्र राज्य के स्थापना को 24 वर्ष पूर्ण होने के उपलब्धि में राज्य सरकार की ओर से “महाराष्ट्र एंड इंडियन फ्रीडम स्ट्रगल” नाम से विशेष रूप से एक पुस्तक का प्रकाशन किया गया था। महाराष्ट्र राज्य के तत्कालीन सूचना एवं जन-संपर्क निदेशक श्री. शांताराम सगणे इस पुस्तक के प्रकाशक थे।
महाराष्ट्र सरकार ने योगदान को किया नमन
राज्य सरकार द्वारा “महाराष्ट्र एंड इंडियन फ्रीडम स्ट्रगल’ पुस्तक के चालीसवें पृष्ठ पर डाक्टरजी के जीवन एवं उनके योगदान के बारे में लिखा कि “डा. केशवराव बलिराम हेडगेवार (1889-1940) विदर्भ के महान सपूत थे, जिन्होंने डाक्टरी शिक्षा पाने पर भी डाक्टरी त्याग कर राष्ट्रीयता आंदोलन को अपनाया। डा.हेडगेवार ने विदर्भ के युवाओं को संगठित एवं प्रेरित कर उन्हें लोकमान्य तिलक के होम रूल लीग में शरीक करवाया। आप संपूर्ण स्वराज के पक्के समर्थक थे, जिसके लिये आपने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। 1920 में नागपुर में संपन्न कांग्रेस अधिवेशन की सफलता में हेडगेवार ने जो विशेष प्रयास किये, उन्हें उस समय के सभी समकालीन राष्ट्रीय नेताओं ने सराहा था।”
जंगल सत्याग्रह का विशेष उल्लेख
महाराष्ट्र सरकार के इसी प्रकाशन में स्वाधीनता प्राप्ति आंदोलन के तहत विदर्भ के यवतमाल जिले में विशेष तौर पर छेड़े गये ‘जंगल सत्याग्रह’ का खास जिक्र करते हुए लिखा गया है कि, ” प्रांत के जिन प्रमुख हस्तियों ने जंगल सत्याग्रह कर गिरफ्तारी दी थी उनमें सर्वश्री मोरेश्वर अभ्यंकर, डा. ना. मा. खरे, पूनम चंद रांका, वीर वामनराव जोशी, पी एल देशपांडे, रामराव देशमुख, मा. श्री. अणे, डा. मुंजे, डा. हेडगेवार, पी. वाय. अनुसुयाबाई काले आदि मुख्य रूप से शामिल थे।”













