मध्यप्रदेश के छिंदवाडा के परसिया ब्लॉक बड़कुही ब्लॉक में रहने वाली आठ साल की सुजीता धारते अब इस दुनिया में नहीं है, सुजीता की नागपुर के एक अस्पताल में मृत्यु हो गई थी, खांसी की दवाई पीने की वजह से सुजीता की किडनी फेल हो गई थी, सुजीता के चाचा आकाश धारते ने बताया की बेटी को बचाने के लिए उनके भाई और परिवार ने अपना सबकुछ बेच दिया, जबसे बेटी की तबीयत खराब हुई थी, तभी से पूरा परिवार उसके इलाज के लिए मारा मारा फिर रहा था। गरीब परिवार से आने वाली सुजीता को बचाने के लिए मां के गहने और पिता का तिपहिया तो बिका ही, ऊपर से पड़ोसियों और रिश्तेदारों का कर्ज भी हो गया। आकाश के मुताबिक, बेटी को बचाने के लिए बड़े से बड़ा अस्पताल और नामी डॉक्टर तक पहुंचने की कोशिश की, नागपुर के मशहूर लता मंगेश्कर अस्पताल सुजीता ने आखिरी सांस ली।
खांसी की दवाई से 24 बच्चों की मौत
परसिया में ही रहने वाले रिंकु चौरसिया के मुताबिक, इलाके में पिछले दो महीने से खांसी का प्रकोप बहुत बढ़ गया है और खांसी भी ऐसी की एक महीने से ऊपर रह रही है, इसका असर पूरे परिवार पर होने लगा और ख़ासकर बच्चों में खांसी के साथ बुखार भी आ रहा था, इसलिए बच्चों की खांसी और बुखार को लेकर लोग यहां के डॉक्टर प्रवीण सोनी से इलाज करा रहे थे, जिन्होंने सभी लोगों को यह कोल्ड्रिफ कफ सिरप लिखा था। जिसको पीने के बाद पिछले 20 दिनों में करीब 24 बच्चों की मौत अभी तक हो चुकी है। अब सवाल यह उठता है कि डॉक्टर सोनी ने यह कफ सिरप बच्चों को भी लिख दिया, जबकि इस कफ सिरप में डायथिलीन ग्लाइकॉल नामक जहर ने दोनों बच्चों के दिमाग को गंभीर नुकसान पहुंचाया था। डायथिलीन ग्लाइकॉल की तय सीमा 0.1% है, लेकिन कोल्ड्रिफ़ सिरप में इसकी मात्रा 48.6% थी, जो तय सीमा से लगभग 500% ज़्यादा थी।
बच्चों की खांसी की दवाई से मौत ने देशभर में गहरी चिंता, शोक और गुस्से का माहौल बना दिया है । यह त्रासदी सिर्फ हजारों परिवारों के लिए पीड़ा नहीं बनी, बल्कि भारत की दवा नियमों, क्वालिटी कंट्रोल और बाल स्वास्थ्य सुरक्षा नीति की खामियों को भी उजागर किया है। इससे पहले भी कई बार खांसी की दवा में प्रतिबंधित डायथिलीन ग्लाइकॉन की मात्रा अधिक होने की बात आती रही है। कई दूसरे देशों ने तो भारत से खांसी की दवाई तक मंगाना बंद कर दिया है। लेकिन भारत में इस डायथिलीन ग्लाइकॉन से युक्त खांसी की दवा आसानी से उपलब्ध हो जाती है।
सिरप पर सख्त कार्रवाई
जांच और सरकारी कार्रवाई में तेज़ी लाते हुए राज्य और केंद्र सरकार ने कोल्ड्रिफ सिरप तथा उसकी निर्माता कंपनी के अन्य उत्पादों पर प्रतिबंध लगाया। छिंदवाड़ा में यह खांसी की दवा तमिलनाडु के श्रीसन फार्मा से आई थी, निर्मित सिरप की गुणवत्ता काफी निम्न स्तर की थी और जांच में फेल रही, जिसपर दवा का लाइसेंस रद्द करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। देश के अन्य राज्यों जैसे पंजाब, उत्तर प्रदेश व तेलंगाना ने भी एहतियात के तौर पर बच्चों के सिरप पर रोक लगा दी गई है। इसके साथ ही,केंद्र ने दो साल से कम उम्र के बच्चों को कोई भी कफ सिरप न देने का सख्त निर्देश जारी किया।
दरअसल भारत में कम कीमत पर दवा उत्पादन और बिक्री की छूट के कारण कई छोटी कंपनियां क्वालिटी मानकों की अनदेखी कर रही हैं , दूसरी ओर राज्यों में दवाओं के नियंत्रण को लेकर भी रवैया बहुत सख्त नहीं है। स्टाफ की कमी के कारण भी बहुत बार दवाओं की क्वालिटी पर नियंत्रण करना मुश्किल होता है। जिसकी वजह से मिलावटी या घटिया सिरप बाजार में आ जाते हैं। कई बार सिरप के सैंपल सफेद दिखते हैं, लेकिन विशेष बैचों में जहरीले तत्व मिल सकते हैं, जैसा कि मध्य प्रदेश की घटना में हुआ।
खांसी के सिरप में घातक रसायन: बच्चों की जान खतरे में
बड़ी बात यह है कि डाईएथिलीन ग्लाइकॉल का दवा निर्माण में इस्तेमाल पूरी दुनिया में प्रतिबंधित है, बावजूद इसके भारत, गाम्बिया, उज्बेकिस्तान में खांसी की दवाओं में यह तत्व मिलाया जाते हैं। पिछले तीन सालों में इस जहरीले तत्व के कारण लगभग 300 बच्चों की मौत इस सिरप में उसी केमिकल की वजह से हो चुकी है । विशेषज्ञों की राय के मुताबिक छोटे बच्चों को खांसी-जुकाम में सिरप की जरूरत बहुत कम होती है । अक्सर खांसी प्राकृतिक तरीके से कुछ दिनों में खुद ही ठीक हो जाती है । जबकि बच्चों को सिरप तभी दें जब डॉक्टर की सलाह हो और मात्रा उम्र एवं वजन के अनुसार तय करें, हालांकि बहुत से डॉक्टर्स इस तरह की सलाह को अनदेखा करके इस तरह की दवाएं लिखते हैं और देते भी हैं।
कई परिवारों का कहना है,हल्की खांसी में भी छिंदवाडा में यह सिरप गया था। जबकि जिन लोगों और विभाग का इस धांधली को रोकने का अधिकार है, वो दवा कंपनियों के हिसाब से काम करते हैं। इस तरह की त्रादसियों को रोकने के लिए क्वालिटी टेस्टिंग, फॉर्मूलेशन मॉनिटरिंग और ओवरटूकाउंटर के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए और कठोर कदम उठाने होंगे । एमएसयू नेटवर्क की तरह निगरानी तंत्र का विस्तार, चिकित्सकों व फार्मेसियों हेतु प्रशिक्षण, और पब्लिक हेल्थ एडवाइजरी अनिवार्य हैं । उपसंहारयह त्रासदी आने वाले समय में भारत के औषधि क्षेत्र पर गंभीर सवाल खड़े करती है । बच्चों की जान की सुरक्षा सर्वोपरि है; प्रशासन, कंपनियों और समाज को सतर्क रहकर निर्णायक कदम उठाने होंगे ताकि ऐसी घटनाएं दोबारा न हो।















