भारतीय मनोरंजन जगत के सितारे अक्सर सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन जब उनकी लोकप्रियता मौत का सबब बन जाती है, तो सवाल उठता है कि कानून सबके लिए बराबर है या नहीं? हाल की दो घटनाएं इस असमानता की पोल खोलती है। एक तरफ तेलुगु सुपरस्टार अल्लू अर्जुन को एक मौत पर गिरफ्तार किया गया, वहीं दूसरी ओर तमिल अभिनेता जोसेफ विजय (थलापति विजय) 41 मौतों के बावजूद बेदाग हैं। यह ‘दो कानून’ की कहानी नहीं तो और क्या है?
अल्लू अर्जुन को किया गया गिरफ्तार
दिसंबर 2024 में हैदराबाद के संध्या थिएटर में ‘पुष्पा 2’ प्रीमियर के दौरान अल्लू अर्जुन के आगमन पर भगदड़ मच गई। 39 वर्षीय रेवती की मौत हो गई, जबकि उनका नौ वर्षीय बेटा गंभीर रूप से घायल हुआ। पुलिस ने तुरंत एफआईआर दर्ज की, जिसमें अल्लू अर्जुन, उनकी सिक्योरिटी टीम और थिएटर मैनेजमेंट पर गैर-इरादतन हत्या का आरोप लगाया। 13 दिसंबर को अल्लू को गिरफ्तार कर लिया गया। चंचलगुड़ा जेल में एक रात बिताने के बाद तेलंगाना हाईकोर्ट ने उन्हें 50,000 रुपये के बॉन्ड पर अंतरिम जमानत दी। अदालत ने कहा, “एक्टर होने के नाते उन्हें सितारों जैसा व्यवहार नहीं मिल सकता।” परिवार ने तो यहां तक कहा कि अल्लू दोषी नहीं हैं। फिर भी, राजनीतिक दबाव में पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की, जो तेलंगाना की कांग्रेस सरकार की छवि मजबूत करने का हथकंडा लगता है।
तमिलनाडु में 41 की मौत, पर कोई केस नहीं
अब मुड़िए तमिलनाडु की ओर, जहां सितंबर 2025 में करूर में तमिलागा वेट्री कझगम (टीवीके) की रैली में भयानक भगदड़ हुई। अभिनेता-पॉलिटिशियन जोसेफ विजय के देरी से पहुंचने और अनियोजित रोड शो के कारण 50,000 से अधिक लोग इकट्ठा हो गए। परिणामस्वरूप 41 मौतें—18 महिलाएं, 13 पुरुष, 5 लड़कियां और 5 लड़के। 50 से ज्यादा घायल। एफआईआर में टीवीके के सेकेंड-टियर लीडर्स जैसे बेसी आनंद और मथिवलागन का नाम है, लेकिन विजय का नाम तक नहीं!
DMK सरकार ने साधी चुप्पी
पुलिस ने कहा कि पार्टी ने चेतावनियों को नजरअंदाज किया, लेकिन विजय को बचाने के लिए डीएमके सरकार ने चुप्पी साध ली। सीएम एमके स्टालिन ने वीडियो संदेश में कहा, “ऐसी घटनाएं दोबारा न हों,” लेकिन विजय को दोषमुक्त कर दिया। उल्टा, विजय ने स्टालिन सरकार पर ‘बदले की कार्रवाई’ का आरोप लगाया, कहा “सच्चाई सामने आएगी।” क्या यह राजनीतिक सौदेबाजी है? डीएमके अपनी विपक्षी पार्टी टीवीके को कमजोर नहीं करना चाहती, इसलिए विजय को ‘आंख दिखाने’ की छूट?
लोकतंत्र के लिए खतरा है दोहरा मापदंड
यह दोहरा मापदंड लोकतंत्र के लिए खतरा है। अल्लू की गिरफ्तारी ने साबित किया कि कानून अमीरों पर भी लागू होता है, लेकिन विजय केस में राजनीति हावी हो गई। स्टालिन सरकार की नरमी से सवाल उठता है—क्या मौतों की संख्या मायने नहीं रखती? न्यायपालिका और सरकार को एक समान नीति बनानी चाहिए। सेलिब्रिटी इवेंट्स पर सख्त गाइडलाइंस जरूरी हैं—क्राउड मैनेजमेंट, पूर्व सूचना और जिम्मेदारी। तमिलनाडु सरकार ने जस्टिस अरुणा जगदीशन जांच का ऐलान किया, लेकिन क्या यह सिर्फ दिखावा है?
अंत में, रेवती और करूर के 41 मृतकों की आत्माएं चीख रही हैं: न्याय सबके लिए बराबर हो। अगर नहीं, तो ‘रूल ऑफ लॉ’ महज नारा बन जाएगा। राजनीति से ऊपर उठकर, हमें इन हादसों से सीखना होगा।
















