आद्य सरसंघचालक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार की मृत्यु के पश्चात् उनकी ही इच्छानुसार श्रीमाधव सदाशिव गोलवलकर सरसंघचालक हुए। सरसंघचालक बनने के पूर्व से ही उन्हें गुरुजी कहते थे। विक्रम संवत् 1962 के फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन गुरुजी का जन्म हुआ। ईसाई दिनांक के अनुसार 19 फरवरी, 1906 को। गुरुजी के पिताजी का नाम सदाशिव और माता का नाम लक्ष्मीबाई था। गुरुजी की प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पिताजी की नौकरी में स्थानांतरण होते रहने के कारण अनेक स्थानों पर हुई। नागपुर के हिस्लाप कॉलेज से उन्होंने इण्टर साइन्स को परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई काशी के हिन्दू विश्वविद्यायल में हुई। वहां से उन्होंने प्राणिशास्त्र में एम.एससी. की उपाधि प्राप्त की। यह वर्ष सन् 1928 का था। सन् 1930 में वे उसी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राणिशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में नियुक्त हुए। तब से उन्हें, गुरुजी, यह नाम प्राप्त हुआ। काशी में रहते हुए उनका संघ से घनिष्ठ परिचय हुआ। काशी में हो उनका डॉक्टर हेडगेवार जी से परिचय हुआ। प्राध्यापक रूप में दो वर्ष कार्य करने पर वे नागपुर लौटे और वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण की, किन्तु वकालत कभी नहीं की। इस समय उनका आकर्षण अध्यात्म की ओर बढ़ा। नागपुर के रामकृष्ण आश्रम में उनका जाना बढ़ता गया। डॉक्टर हेडगेवार जी से भी घनिष्ठता बढ़ रही थी; किन्तु अन्त में आध्यात्मिक प्रेरणा का प्रभाव
अधिक हुआ और वे बंगाल के सारगाछी आश्रम में पहुंचे।
स्वामी विवेकानन्द के गुरु भाई स्वामी अखण्डानन्द इस आश्रम के प्रमुख थे। गुरुजी ने उनसे सन्यास की दीक्षा ली। स्वामी अखण्डानन्द की मृत्यु के पश्चात् गुरुजी नागपुर लौटे। डॉक्टर जी ने अब गुरुजी से अधिक सम्पर्क बनाया। सन् 1938 के नागपुर संघ शिक्षा वर्ग के सर्वाधिकारी रूप में उनकी नियुक्ति हुई। सन् 1930 में उन्हें संघ का सरकार्यवाह बनाया और डॉक्टर जी की मृत्यु के पश्चात् 21 जून, 1940 के दिन वे सरसंघचालक हुए।
करीब 33 वर्ष गुरुजी सरसंघचालक रहे। उनके इस कार्यकाल में सबसे कठिन वर्ष सन् 1948 था। महात्मा गान्धी की हत्या के बहाने संघ पर लगाए गए प्रतिबंध का वह वर्ष था, किन्तु गुरुजी के
दृढ़ और कुशल नेतृत्व से संघ उस अग्नि परीक्षा से सकुशल बाहर निकला। इन तैतीस वर्षों में संघ का बहुत विस्तार हुआ। जब जिलों में संघ फैला। संघ कार्य का स्वाभाविक प्रभाव समाज जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी दिखने लगा। विद्यार्थी परिषद्, भारतीय जनसंघ, भारतीय मजदूर संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना इसी काल में हुई। विश्व-विभाग को भी इसी काल में निश्चित रूप मिला।
श्री गुरुजी को सन् 1971 से कैन्सर ने घेरा। मुम्बई में उनकी चिकित्सा भी हुई। शल्य क्रिया के पश्चात् कुछ समय विश्राम कर उन्होंने पुनः देशव्यापी प्रवास आरम्भ किया; किन्तु सन् 1973 मार्च मास की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक से उनका स्वास्थ्य अधिक बिगड़ने लगा। 5 जून, 1973 को नागपुर में उनका देहावसान हुआ।

















