आखिर कैसे छूट गए 'मासूम कशिश' के गुनहगार? मुख्य आरोपी अख्तर को SC से मिली रिहाई, सरकार दायर करेगी पुनर्विचार याचिका
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आखिर कैसे छूट गए ‘मासूम कशिश’ के गुनहगार? मुख्य आरोपी अख्तर को SC से मिली रिहाई, सरकार दायर करेगी पुनर्विचार याचिका

आखिर क्यों और कैसे छूट गए "मिस के" यानी मासूम कशिश के दुर्दांत हत्यारे! कहां रह गई पुलिस जांच में कमी? इस मामले में कौन लापरवाह है?

Written byउत्तराखंड ब्यूरोउत्तराखंड ब्यूरो — edited by Mahak Singh
Sep 24, 2025, 01:17 pm IST
in उत्तराखंड
प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

पिथौरागढ़: आखिर क्यों और कैसे छूट गए “मिस के” यानी मासूम कशिश के दुर्दांत हत्यारे! कहां रह गई पुलिस जांच में कमी? इस मामले में कौन लापरवाह है? जिसने इसकी जांच में गंभीरता नहीं दिखाई। जन आक्रोश को शांत करने के लिए मामले में लीपापोती की। केवल वकील को दोष देने से कुछ नहीं होगा। कमियां पुलिस जांच में रही हैं।

क्या थी “कशिश ” साथ हुई दुर्दांत घटना?

20 नवंबर 2014 को पिथौरागढ़ से शादी में शामिल होने हल्द्वानी आई सात साल की “मिस के” (ये नाम अदालत ने दिया है) की बलात्कार के बाद नृशंस हत्या कर दी गई थी। उसका शरीर गौला नदी किनारे मिला था। लंबे कोर्ट ट्रायल के बाद भी इस मामले में बच्ची के असल दोषी कौन हैं, इसका पता नहीं लग सका। पुलिस ने जो आरोपी पकड़े वे सुबूतों के अभाव और कमजोर पुलिस जांच में बरी हो गए। फांसी की सजा पाए मुख्य आरोपी अख्तर अली को भी सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया। ऐसे में लोगों का गुस्सा बच्ची को न्याय दिलाने के लिए दिख रहा है।

सोशल मीडिया की चर्चा में एडवोकेट मनीषा भंडारी

एडवोकेट मनीषा भंडारी। नैनीताल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत करती हैं। बताया जाता है कि इनकी एक सुनवाई की फीस लाखों में होती है। वह कशिश के गुनहगार अख्तर अली की वकील हैं। नोएडा के 2005 निठारी कांड में 16 से अधिक बच्चों के बलात्कारी और हत्या के आरोपी सुरेन्द्र कोली और मोनिंदर सिंह पांढेर को भी फांसी की सजा सुना दी गई थी। लेकिन मनीषा भंडारी ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट से फांसी की सजा से मुक्त करवाया।

अख्तर अली पर था यह आरोप

कशिश अपने घरवालों के साथ हल्द्वानी में रिश्तेदार के विवाह समारोह में आई थी। आरोप है कि 20 नवंबर 2014 को मुख्य आरोपी अख्तर अली ने उसका अपहरण किया और बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी। अख्तर को पहले ट्रायल कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई, फिर नैनीताल हाईकोर्ट ने भी फांसी की सजा सुनाई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से वह छूटकर बाहर आ गया।

अख्तर की वकील मनीषा भंडारी की सुप्रीम कोर्ट में दलील

  • बचाव पक्ष ने कहा कि पुलिस ने पीड़िता के चचेरे भाई की जांच नहीं की क्योंकि उसी ने पुलिस को सबसे पहले फोन करके पीड़िता के शव के बारे में बताया था
  • सच्चाई यह नहीं है, किसी खच्चर चलाने वाले मुसलमान ने पहले शव देखा था और फिर अन्य लोगों को उसकी जानकारी दी थी और तब मासूम कशिश के चचेरे भाई को पुलिस को फोन किया था
  • पुलिस ने अख्तर अली को पहले ही पकड़ लिया था और छुपा कर रखा हुआ था
  • पुलिस ने जबरदस्ती अख्तर के ब्लड और सीमेन के सैंपल लिए
  • पुलिस ने अख्तर का ब्लड और सीमेन ले जाकर खुद ही पीड़िता के अंडरगारमेंट्स और जैकेट्स पर लगाए
  • वेजाइनल स्वेब DNA जांच के लिए लिया गया था उसमें भी मिलावट कर दी गई, DNA जांच में अख्तर अली को फंसाया गया
  • पुलिस ने एक नाटक रचा और अख्तर को लुधियाना से गिरफ्तारी की झूठी कहानी बनाई जबकि वह हल्द्वानी से भागा ही नहीं था
  • पुलिस ने बहुत लापरवाही की। कहा जा रहा है कि सरकारी वकील ने भी मामले में लापरवाहियां बरतीं, जिसका फायदा आरोपित पक्ष ने उठाया। पीड़िता के पिता एक इंटरव्यू में बता रहे थे कि सरकारी वकील कई बार सुनवाई के दौरान कोर्ट ही नहीं जाती थीं।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अख्तर अली के खिलाफ सभी सबूत परिस्थितिजन्य हैं अर्थात मामले का कोई प्रत्यक्ष गवाह नहीं है। अतः केवल संदेह के आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। इसलिए उसे बाइज्जत बरी किया जाता है।

लोगों का आक्रोश

लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर हैरानी जताई। उनका कहना है कि जहां मासूम को शैतान द्वारा नोचा जा रहा था वहां क्या कोई कैमरा लेकर खड़ा होना चाहिए था। पोस्टमार्टम और DNA रिपोर्ट गवाही दे रही है लेकिन इन्हें ही फर्जी घोषित कर दिया गया। मुख्य आरोपी आजाद है। मतलब यह माना जाए कि 7 वर्ष की कशिश का बलात्कार हुआ ही नहीं था, हमें अब ये मान लेना चाहिए कि वो कभी धरती पर थी ही नहीं। जिसे पहले ही दो अदालतें फांसी की सजा सुना चुकी हैं, वह आखिर में छूट जाता है। एक बार के लिए मान लेते हैं कि सबूत और गवाह संदेहास्पद भी थे लेकिन क्या इतने कमजोर थे कि हाईकोर्ट जैसी संस्था भी उनके आधार पर मृत्युदंड दे दे? सरकार फिर से पुनर्विचार याचिका दायर करेगी।

तीन आरोपी हुए थे नामजद

पुलिस ने कशिश हत्याकांड में तीन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। इनमें से एक आरोपी को पहले ही बरी कर दिया गया था। दूसरे अभियुक्त को पांच साल की सजा और जुर्माना लगा। मुख्य आरोपी अख्तर अली को फांसी की सजा सुनाई गई थी।

Topics: Akhtar AliPithoragarh innocent murder caseUttarakhand NewsSupreme CourtKashish murder caseHaldwani protestPithoragarh Kashish murder caseinnocent Kashish rape case
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