एक राजा था जिसका मंत्रिमण्डल केवल औपचारिकता के लिये था क्योंकि सारे निर्णय वह खुद लेता था। एक बार उसने मंत्रिमंडल के सामने प्रजा पर भारी कर लगाने की योजना रखी। मंत्रियों को यह प्रस्ताव बहुत अन्यायपूर्ण लगा। उन्होंने उससे अपनी स्पष्ट असहमति जता दी। इस पर राजा क्रोधित हो गया।
उसने मंत्रिमंडल को खत्म करने का निर्णय लिया और सभी मंत्रियों को राज्य छोड़ देने का आदेश दे दिया। मंत्रियों को इस तानाशाही आदेश से आघात पहुंचा। वे यह समझ नहीं पा रहे थे कि इस स्थिति का सामना कैसे किया जाये। तभी उन्हें सुंदर नाम के सेवक का स्मरण हुआ। वह राजा का प्रिय था। उसने कई अवसरों पर राजा के क्रोध को शांत किया था।
मंत्रियों ने सुंदर को पूरी स्थिति की जानकारी दी व उससे प्रार्थना की कि वह ऐसा कुछ करे कि जिससे राजा अपने निर्णय को बदलें। सुंदर ने यह चुनौती स्वीकार कर ली। एक दिन वह राजा के पास जाकर उनके नाखून काटने लगा।सुंदर ने राजा के नखों पर गुलाब जल छिड़का और उन्हें धीर-धीरे काटना शुरू कर किया। उसने कहा, ‘महाराज, शरीर में इन नखों की क्या आवश्यकता है ?

वे यूं ही बढ़ते रहते है और उन्हें बार-बार काटना पड़ता है। इनमें रोगों के कीटाणु भी रहते हैं जो हमारे शरीर में इसलिए प्रवेश करते हैं कि उन्हें फेंक दिया जाए।’ राजा ने मुस्कराते हुए कहा, ‘वह तो ठीक है, लेकिन उन्हें उखाड़कर मत फेंक देना। ये हमारे हाथ -पैंरों की शोभा बढ़ाते हैं। चाहे इनका उपयोग न हो, पर ये आभूषणतुल्य हैं।’
इस पर सुंदर ने कहा, ‘महाराज हानिकारक होते हुए भी ये हाथ-पैरों की शोभा हैं। ठीक इसी प्रकार आपका मंत्रिमंडल राज्य की शोभा हैं। मंत्री भले ही आपके किसी कार्य का विरोध करें, परन्तु आपके राज्य की शोभा उन्हीं से है।’
राजा उसकी ओर गंभीरता से देखने लगा। सुंदर ने फिर कहा, ‘ राज्य की व्यवस्था में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। उनके बिना राज्य बिना नखों के हाथ जैसा कुरूप हो जायेगा।’ राजा ने मन ही मन अपनी गलती स्वीकार की।











