
हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित अनेकानेक पौराणिक प्रसंग सतयुगीन तीर्थ नैमिषारण्य की आध्यात्मिक महत्ता को प्रतिपादित करते हैं। स्कंद पुराण के अनुसार बिहार के ‘गया’ और बद्रीनाथ के ‘ब्रह्म कपाल’ के बाद नैमिषारण्य धाम पितरों के श्राद्ध-तर्पण के लिए तीसरा सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ माना गया है। पौराणिक कथानक है कि सतयुग में गयासुर नाम का असुर भगवान विष्णु का परम भक्त था। दैत्यकुल में जन्म लेने के बावजूद उसमें कोई आसुरी प्रवृति नहीं थी। एक बार उसकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उससे वरदान मांगने को कहा। इस पर गयासुर ने वरदान मांगा कि आने वाले समय में पितरों की मुक्ति में उसका विशेष योगदान हो।
तब भगवान श्रीहरि ने अपने सुदर्शन चक्र से उसके शरीर के तीन भाग कर दिये। उसके चरण गया जी में गिरे, सिर बद्रीनाथ में और नाभि नैमिषारण्य में। कहा जाता है कि तभी से यह तीनों तीर्थ पितृ तर्पण के लिए विशेष रूप से विख्यात हो गये। शास्त्रीय मान्यता है कि गया में पितरों का श्राद्ध-तर्पण करने से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त हो जाता है। वहीं बद्रीनाथ धाम के “ब्रह्मकपाल” के बारे में कहावत है, ‘’जो जाए बदरी, वो ना आए ओदरी’’ यानि जो व्यक्ति अपने पितरों का श्राद्ध तर्पण ब्रह्मकपाल” में करता है,उन्हें पुनः माता के उदर यानी गर्भ में फिर नहीं आना पड़ता। जबकि नैमिषारण्य में श्राद्ध तर्पण करने से पितर तृप्त और संतुष्ट होकर अपनी संतति पर आशीर्वादों की वर्षा करते हैं। यही वजह है कि ‘नाभि गया’ के नाम से प्रसिद्ध इस प्राचीन तीर्थस्थल पर पितृ पक्ष में देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पितरों का श्राद्ध तर्पण करने आते हैं। ज्ञात हो कि श्रीलंका, नेपाल, भूटान और बंगाल जैसे देशों के हिन्दू धर्मावलम्बी भी अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्धकर्म और पिंडदान करने नैमिष तीर्थ में आते हैं। पौराणिक मान्यता है कि नैमिषारण्य में 33 करोड़ देवी-देवता और 88 हजार ऋषि विराजमान रहते हैं। यहां पितरों को श्रद्धा अर्पित करने वालों को देवता और ऋषिगण आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
धर्मग्रंथों में इस सतयुगीन तीर्थ को धरती की नाभि अर्थात केंद्र माना गया है। पौराणिक आख्यान के अनुसार यह वही पुण्यभूमि है जहाँ सतयुग में 88 हजार ऋषियों ने तपस्या की थी। यह वही सतयुगीन तीर्थ है जहाँ सृष्टि के संचालक श्रीहरि विष्णु के सुदर्शन चक्र की धुरी (नेमि) गिरने से चक्र सरोवर निर्मित हुआ था; जिसमें पाताल गंगा की जलधारा प्रस्फुटित हुई थी। श्रीमद्भागवत महापुराण में उल्लेख आता है कि श्रीहरि के सुदर्शन चक्र की नेमि धरती के केंद्र की जिस पवित्र भूमि पर गिरी थी, तब वह क्षेत्र सघन अरण्य (वन) से आच्छादित था; तभी से सुदर्शन चक्र की दिव्य ऊर्जा से अनुप्राणित 84 कोस की भूमि नैमिषारण्य नाम से लोकविख्यात हो गयी। इस सतयुगीन तीर्थ की महिमा से पुराण ग्रंथ भरे पड़े हैं। सतयुग में मनु-शतरूपा ने यहाँ हजारों वर्षों की कठोर तपस्या से जगतपालक भगवान विष्णु को प्रसन्न कर त्रेतायुग में उन्हें पुत्र रूप में प्राप्त किया था। प्रभु श्रीराम ने इस पुण्यधरा पर अश्वमेध यज्ञ कर देवसंस्कृति दिग्विजय की महापताका लहरायी थी। द्वापर में महर्षि वेदव्यास ने यहीं पर चारों वेदों का विस्तार कर 18 पुराणों की रचना की थी। बाल योगी शुकदेवजी ने यहीं पर राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत की कथा सुनाकर उनके मोक्ष का मार्ग प्रशस्त किया था। रावण वध के कारण ब्रह्म हत्या का पाप लगने पर भगवान राम ने नैमिषारण्य की चौरासी कोसी परिक्रमा कर हत्या हरण तीर्थ में स्नान कर से ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पायी थी। महाभारत युद्ध के उपरांत धर्मराज युधिष्ठिर ने भी इस तीर्थ की चौरासी कोसी परिक्रमा कर यहां हजारों वर्ष तक कठोर तपस्या की थी। स्वयं महादेव शिव ने इस तीर्थ को ‘धर्मारण्य’ के रूप में प्रसिद्ध होने का वरदान दिया था। इस तीर्थ की एक अमरगाथा अजेय दैत्य वृतासुर के विनाश के लिए जीते जी अपनी अस्थियों का दान कर देने वाले महर्षि दधीच से भी जुड़ी है। सत्यनारायण भगवान की कथा भी पहली बार यहीं कही गयी थी।