सोशल मीडिया ऐसा मंच बन गया है कि यहां पर कोई कुछ भी आकर कह जाता है। सच भी और झूठ भी। प्रमाण देने की भी आवश्यकता नहीं है। जब तक कोई प्रमाण मांगेगा तब तक तो झूठ अपना काम कर चुका होगा। इसी तरह का एक वीडियो राजस्थान का वायरल हुआ। जोकि भारतीय समाज और परंपरा को नुकसान पहुंचाने वाला था और उस पर ठोस कार्रवाई भी नहीं हुई।
राजस्थान को लेकर वीडियो में झूठा दावा
परिवार और परंपराओं को अरसे से निशाना बनाया जा रहा है, परंतु सोशल मीडिया के आने के बाद यह और भी तेज हो गया है, क्योंकि पलक झपकते ही वीडियो वायरल होता है और कंटेन्ट क्रियेटर को व्यूज के अनुसार पैसे मिलते हैं। यही आकर्षण और झूठ बोलने के लिए प्रेरणा का कारक बनता है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें खुद को वकील कहने वाली एक महिला यह दावा कर रही है कि ““राजस्थान में एक परंपरा के तहत शादी के बाद पहले ससुर, फिर देवर और फिर पति का संबंध होता है और जो पहला बच्चा होगा उसे गिरा दिया जाता है।”
महिला का दावा था कि यह राजस्थान में एक रस्म है। उसके बाद वह दावा करती है कि शिक्षा से ही ऐसी परंपराओं से छुटकारा मिल सकता है। विरोध बढ़ने पर महिला ने बाद में माफी मांग ली। उसका कहना है कि अगर मेरी तरफ से किसी को ठेस पहुंची हो तो माफ करें, लेकिन उसने यह भी कहा कि उसे जिस महिला ने यह बात बताई थी तो वह इस दुनिया में नहीं है।
राजस्थान पुलिस ने भ्रामक कहा
इस वीडियो के वायरल होते ही सोशल मीडिया पर हंगामा हो गया। यह पूरी तरह से झूठा दावा है। राजस्थान पुलिस ने भी इसे भ्रामक और झूठा बताया। कई गैर सरकारी संगठनों ने भी इसे पूरी तरह से झूठा बताया।
राजस्थान में स्त्रियों के त्याग और वीरता के इतिहास का अपमान
जब भी राजस्थान की बात होती है, तो हृदय में आदर उत्पन्न होता है। बचपन में श्याम नारायण पांडेय की एक कविता की कुछ पंक्तियाँ जीवंत रूप में आ जाती है। जिसमें वे एक व्यक्ति से प्रश्न कर रहे हैं कि वह पूजा करने के लिए थाल सजाकर कहां जा रहा है? क्योंकि वह जिस ओर जा रहा है, उधर न ही काशी है, न ही गंगासागर है और न ही कोई तीर्थ है, फिर ऐसा क्या है, कि वह जा रहा है। युवक उत्तर देता है कि उसे गंगासागर, रामेश्वर या काशी जाना ही नहीं है, बल्कि उसे तो तीर्थराज चित्तौड़ देखने जाना है।
उसे वह स्थान देखने जाना है, जहां पर अपने दुर्गों को स्वतंत्र रखने की चाह में मतवालों की टोली निकल पड़ती थी। सिर पर साका बांधकर वे निकल पड़ते थे। साका अर्थात शत्रु को या तो मारकर आएंगे या फिर शत्रु को मारकर स्वयं बलिदान हो जाएंगे।
श्यामनारायण पाण्डेय की एक और कविता है, जिसके बिना शायद बचपन पूरा ही नहीं हो सकता है और वह है चेतक की वीरता। जहां इतिहास की पुस्तकों में बाहरी लेखकों के संदर्भों के आधार पर यह पढ़ाया जाता रहा कि भारत एक पराजित भूमि रही, जिस पर कभी हूण, शक, कुषाण आदि ने शासन किया तो वहीं लोक में नायकों की वीरता के किस्से रहे। राजस्थान का लोक तो ऐसे नायकों से भरा हुआ है और जिनमें राणा सांगा, महाराणा प्रताप और उसके बाद भी लंबी सूची है। लोक बताता है कि कैसे राणा का घोडा चेतक भी वीरता की मिसाल था।
यह वही राजस्थान है, जहां पर स्त्रियों ने मात्र जौहर ही नहीं किया, अपितु देश धर्म के लिए अपनी संतान तक बलिदान करने से परहेज नहीं किया। ऐसी ही एक मां थीं पन्ना धाय। उनकी कहानी प्रेरणास्रोत है। यह कहानी भी जौहर और त्याग की कहानी है। जब रानी कर्णावती ने यह देखा कि वे बहादुरशाह को नहीं रोक पाएंगी तो उन्होंने जौहर कर लिया था, परंतु इससे पहले उन्होंने अपने पुत्र राणा उदय सिंह को पन्ना धाय को सौंप दिया था। पन्ना धाय ने जब देखा कि राणा उदय सिंह पर उन्हीं के परिवार से संकट है, तो उन्होंने अपने पुत्र का बलिदान देकर भी राणा की रक्षा की।
यह वही राजस्थान है, जहां पर भक्ति की बात होने पर मीराबाई का नाम उभरकर आता है। यह भी ध्यान रखा जाए कि जब ये स्त्रियां कार्य कर रही थीं, तो परिवार और समाज के पुरुष भी सहयोगी थे। मीराबाई का आदर केवल स्त्रियां ही नहीं अपितु पुरुष भी करते थे।
यह राजस्थान ही है, जहां के राजस्थान के सूर्यवंशी राजपूतों ने 500 वर्ष पूर्व कसम खाई थी कि जब तक प्रभु श्रीराम के मंदिर का निर्माण नहीं होता तब तक वे न ही पगड़ी बांधेंगे और न ही मंडप की छत बनवाएंगे। जब श्रीराम मंदिर में प्राणप्रतिष्ठा हुई तो उन्होंने पगड़ी बांधी।
ऐसा समाज है राजस्थान का, ऐसी महिलाएं और पुरुष हैं राजस्थान के, जो अपने इतिहास को जीते हैं, अपनी समृद्ध परंपराओं को जीते हैं।
एक समृद्ध और बलिदानी समाज की छवि पर कलंक का खंडन क्यों? दंड क्यों नहीं?
राजस्थान का इतिहास त्याग, वीरता और बलिदान का रहा है, फिर चाहे वह जौहर हो, साका हो या फिर पन्ना धाय का बलिदान या फिर मीराबाई की भक्ति। फिर ऐसे में प्रश्न उठता है कि ऐसी समृद्ध विरासत को कलंकित करने वाले ये वीडियो बनाते हैं तो क्या पुलिस को मात्र खंडन करना चाहिए या फिर समाज की छवि को विकृत करने के आरोप में दंड दिया जाना चाहिए?
हालांकि ऐसे कई कार्य साहित्य आदि के माध्यम से पूर्व में भी हुए हैं जिनमें कन्यादान आदि परंपराओं पर प्रहार किया गया परंतु फिर भी वह इस प्रकार अपमानित करने वाले कृत्य नहीं थे। वे साहित्य थे और जिन्हें व्यक्ति का अपना मत कहकर खारिज किया जा सकता था और लोग करते ही हैं। परंतु वायरल वीडियो में जो महिला दावा कर रही है, वह यह कह रही है कि राजस्थान में यह परंपरा है और अभी तक है।
जरा कल्पना करें, जिस भूमि पर पिताओं ने और पतियों ने अपने घरों की स्त्रियों के शील की रक्षा के लिए अपने सिर कटाना उचित समझा, उसी भूमि के पिताओं और पतियों को इस प्रकार लांछित किया जा रहा है? यह लोक के प्रति अपराध है, यह संबंधों के प्रति अपराध है, यह इतिहास के प्रति अपराध है और कानूनन तो अपराध है ही।
क्या पुलिस का यह उत्तरदायित्व नहीं होना चाहिए कि वह स्वत: संज्ञान लेकर इस वीडियो में दिख रही महिला पर कानूनी कार्यवाही करे क्योंकि यह महिला कह रही है कि ऐसा अभी भी होता है, तो उसे पूरे तथ्य देने चाहिए कि यह कहां हो रहा है, किसके बीच हो रहा है और कौन कर रहा है?
एक अत्यंत गौरवशाली राज्य पर इस प्रकार हमला किया जा रहा है और पुलिस मात्र खंडन कर रही है? इससे शर्मनाक कुछ हो ही नहीं सकता कि राज्य के गौरव के लिए, महिलाओं के शील की रक्षा के लिए सिर कटाने वाले पुरुषों को बलात्कारी घोषित किया जा रहा है और सम्पूर्ण प्रशासन मौन है? आखिर केवल खंडन की विवशता क्या है?
चैनल मालिकों का कोई भी उत्तरदायित्व नहीं?
जहां पुलिस से यह अपेक्षा की जा रही है कि वह वायरल वीडियो का संज्ञान लेते हुए सख्त कदम उठाए, वहीं एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी उठता है कि क्या ऐसे चैनल मालिकों की कोई जिम्मेदारी नहीं होती जो ऐसे अपमानित करने वाले कंटेन्ट सुनते हैं और बिना किसी जांच के प्रसारित कर देते हैं? क्या उन्हें तथ्यों की जांच नहीं करनी चाहिए और क्या उन्हें पूरी सच्चाई सामने नहीं लानी चाहिए? क्या उनकी कोई जबावदेही नहीं है? यदि वे तथ्यों की पड़ताल किसी भी कार्यक्रम के प्रसारित होने से पहले नहीं करते हैं तो उनपर भी भारतीय न्याय संहिता के विभिन्न प्रावधानों के अंतर्गत कार्यवाही नहीं होनी चाहिए? अर्थात बीएनएस 353 -गलत सूचनाएँ,अफवाहें या रिपोर्ट बनाना,प्रकाशित करना या प्रसारित करने के लिए बीएनएस 353A – धर्म,धार्मिक भावनाओं,धार्मिक विश्वासों को ठेस पहुँचाने के लिए।
सोशल मीडिया पर केवल खंडन कर देने से क्या इस तरह के वीडियो पर अंकुश लगेगा, यह भी एक बड़ा सवाल है।













