100 वर्ष की संघ यात्रा : नए क्षितिज’। इस अवसर पर मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के साथ सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले, क्षेत्र संघचालक श्री पवन जिंदल और प्रांत संघचालक डाॅ. अनिल अग्रवाल उपस्थित थे। व्याख्यानमाला में पहले दिन एवं दूसरे दिन सरसंघचालक ने व्याख्यान दिया तथा तीसरे दिन ‘जिज्ञासा समाधान सत्र’ का आयोजन किया गया। यहां व्याख्यानमाला के संपादित अंश दिए जा रहे हैं-
प्रश्न-
क्या आरक्षण जातिवाद को बढ़ाता है या यह समरसता में बाधक है? इस विषय पर संघ का क्या विचार है?
परिवारों को संस्कार कैसे दिए जाएं? नागरिक कर्तव्यों का बोध कैसे बढ़ाया जा सकता है? भारतीय समाज का जागरण कैसे किया जा सकता है? धार्मिक स्थलों, कुंभ मेले और पर्यटन स्थलों में पर्यावरण और सेवा के प्रति संकल्प का मन कैसे विकसित किया जा सकता है?
भारत में राष्ट्रीय भाषा को लेकर विवाद होता है। क्या एक भाषा ही राष्ट्रभाषा होनी चाहिए ?
उत्तर-
1-आरक्षण जैसे विषय तभी समझ में आते हैं, जब मन में संवेदना हो। जातिगत आरक्षण पर हमारा प्रस्ताव है। पहली बार जब प्रस्ताव आया तो कुछ मतभेद हुए। तब सरसंघचालक बालासाहब जी थे। उस समय उन्होंने एक सत्र सुना और फिर उन्होंने कहा कि देखो हजार वर्ष से इस जातिगत भेद का दंश जिन्होंने झेला है, उनके परिवार में अपना जन्म हुआ है, ऐसी कल्पना करके सोचो और अगले सत्र में बोलो। इसके बाद अगले सत्र में आरक्षण के समर्थन का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया। यह संवेदना का प्रश्न है। अन्याय हुआ है, तो परिमार्जन होना चाहिए। यह एक तर्क है। दूसरा तर्क है कि अन्याय जिन्होंने किया वे तो चले गए। आज हम इसको मानते नहीं। हमको क्यों तकलीफ? दोनों तर्कों में दम है। इसका हल पं. दीनदयाल उपाध्याय जी ने बताया है कि खड्डे में कोई गिरा है और उसको ऊपर निकालना है तो जो खड्डे में गिरा है वह हाथ ऊपर करेगा। अपने पंजों पर खड़ा रहकर ऊंचा होने का प्रयास करेगा और ऊपर जो है वह नीचे झुककर उसको हाथ देगा, तभी वह बाहर निकल पाएगा। इसकी आवश्यकता है। ऐसे ही अगर हजार वर्ष तक हमारे लोगों ने कुछ झेला है, तो उनको ऊपर लाने के लिए अगर 200 वर्ष हमने झेला तो क्या फर्क पड़ेगा? अपने लोगों के लिए कुछ छोड़ना ही होता है। यही धर्म है।
कुंभ मेले के समय एक आह्वान पर्यावरण गतिविधि ने किया— थाली थैला। तो उसको बहुत बड़ा प्रतिसाद सारे देश से मिला और वह भी सब अखाड़ों ने उसको स्वीकार कर लिया। अब ऐसा क्यों हुआ?
2. जिन्होंने आह्वान किया उनकी विश्वसनीयता थी। समस्या उसका उपाय देने वाला था, उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया। ऐसे व्यावहारिक उपाय लेकर अपने—अपने स्थान पर जो मेले, पर्व, त्योहार वगैरह सब होते हैं, उसमें हस्तक्षेप करना चाहिए। अभी महाराष्ट्र में गणेश उत्सव बड़े पैमाने पर चला। विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता और कुछ अन्य लोग उनको एकत्रित करके कुछ राष्ट्र, देश, संस्कृति, संस्कार इसके बारे में कार्यक्रम करने को कहते हैं। ऐसे ही प्रयास होने चाहिए।
3. भारत की सब भाषाएं राष्ट्रीय हैं। जिनका उद्गम भारत में हुआ है, वे सभी राष्ट्र भाषाएं हैं। एक को राष्ट्रीय और बाकी को कुछ और कहना उचित नहीं। इस राष्ट्र के घटक जो-जो भाषा बोलते हैं, वह सब राष्ट्रभाषा है। हां, एक व्यवहारिक भाषा होनी चाहिए, जो आपसी संवाद में काम आए। वह विदेशी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि हमारे भाव विदेशी भाषा में प्रकट नहीं होते। शब्द भिन्न हो सकते हैं, पर भाव सब भाषाओं में एक ही है। जैसे तिरुक्कुरल, तुकाराम महाराज के अभंग, रामचरितमानस की चौपाइयां, सबमें आचरण का उपदेश और समान आदर्श हैं। सब भाषाओं में रामायण व महाभारत हैं, संतों के नीति-वचन भी समान हैं। इसलिए भाषा को लेकर विवाद निरर्थक है। मातृभाषा का ज्ञान आवश्यक है, जिस प्रदेश में रहते हैं उसकी, एक व्यवहार की भाषा सबको सीखनी चाहिए। और चाहे तो और भाषाएं सीखें। कम से कम तीन भाषाएं आनी चाहिए। सब भाषाएं हमारी हैं, ऐसा व्यवहार करना चाहिए।


















