आस्ट्रेलिया के अनेक प्रमुख शहरों, जैसे सिडनी, मेलबर्न, ब्रिसबेन, कैनबरा, एडिलेड और पर्थ में ‘मार्च फॉर आस्ट्रेलिया’ नाम से निकाली गईं। रिपोर्ट है कि इन रैलियों में हजारों स्थानीय लोगों ने भाग लिया। रैलियों का उद्देश्य था ‘आप्रवासन के विरुद्ध’ आवाज उठाना, लेकिन इनका जो स्वरूप दिखा वह विशेष रूप से भारतवंशियों को निशाना बनाने की कवायद जैसा महसूस हुआ। आस्ट्रेलिया सरकार ने इन रैलियों की भर्त्सना करते हुए इन्हें समाज को तोड़ने वाले तत्वों की कारिस्तानी बताया है। इन तत्वों को सरकार ने ‘नियो—नाजी’ भी कहा।
लेकिन सरकार के उक्त बयान से उलट इन रैलियों के आयोजकों ने दावा किया कि ‘हमारे देश की सड़कें विदेशी संघर्ष, भरोसे की कमी और सांस्कृतिक क्षरण के तेज होते जाने की गवाह बन रही हैं।’ रैली में बांटे गए पर्चों पर भी लिखा गया था कि ‘पिछले पांच वर्ष में जितने भारतीय आए हैं, उतने यूनानी और इतालवी सौ वर्ष में नहीं आए थे। यह कोई मामूली सांस्कृतिक बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़ी आबादी का यहां बसते जाना है।’
दूसरी ओर ऐसा मानने वाले भी कम नहीं हैं कि रैली निकालने वालों की ऐसी भाषा न केवल भेदभावपूर्ण है, बल्कि यह एक भय और असंतोष की भावना को दर्शाती है, जो कुछ वर्गों में आप्रवासन को लेकर व्याप्त है। यह सोच अक्सर आर्थिक दबाव, संसाधनों की मारामारी तथा सांस्कृतिक पहचान खत्म होने के बेसिरपैर के भय से जुड़ी होती है।
जैसा पहले बताया, आस्ट्रेलिया सरकार ने इन रैलियों की कड़ी आलोचना की। वहां के पर्यावरण मंत्री मरे वॉट ने कहा, ‘हम ऐसी रैलियों का समर्थन नहीं करते जो नफरत फैलाती हैं और समाज को बांटती हैं।’ गृह मामलों के मंत्री टोनी बर्क ने इस प्रयास को ‘आधुनिक आस्ट्रेलिया के विरुद्ध’ बताया और कहा कि माहौल ऐसा बनना चाहिए जहां ‘हर आस्ट्रेलियाई, चाहे वह कहीं भी जन्मा हो, को सुरक्षित महसूस हो।’ एक अन्य मंत्री ऐनी अली ने इन रैलियों को ‘नस्लवाद और जातीय अहम पर आधारित’ बताया और कहा कि ‘ऐसी सोच का आधुनिक आस्ट्रेलिया में कोई स्थान नहीं है।’

उल्लेखनीय है कि आस्ट्रेलिया में भारतवंशियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। साल 2023 की जनगणना के अनुसार, भारतीय मूल के लोग अब देश की कुल जनसंख्या का 3 प्रतिशत से अधिक हैं यानी लगभग 8.45 लाख भारतीय वहां हैं। आज शिक्षा, स्वास्थ्य, आईटी और व्यवसाय जैसे क्षेत्रों में भारतीयों का महत्वपूर्ण योगदान है। इसके बावजूद, उन्हें इन रैलियों में विशेष रूप से निशाना बनाया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि नस्लवादी पूर्वाग्रह आज भी समाज के कुछ हिस्सों में मौजूद है। रैली में भाग लेने वाले कई लोगों ने कहा कि आप्रवासी ‘हमारे संसाधनों जैसे आवास, अस्पताल, सड़कों का उपभोग कर रहे हैं जबकि हमारे बच्चे इनके लिए संघर्ष कर रहे हैं।’
आस्ट्रेलिया एक बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है, जहां आधे से अधिक लोग या तो विदेश में जन्मे हैं या उनके माता-पिता विदेश में जन्मे थे। इस विविधता को न केवल स्वीकार करना, बल्कि उसका सम्मान करना आधुनिक लोकतंत्र की पहचान है। सरकार की प्रतिक्रिया इस बात की पुष्टि करती है कि वह इस विविधता को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।
इन रैलियों ने एक बात तो साबित की है कि आस्ट्रेलिया में एक वोक वर्ग खड़ा किया जा रहा है जो समाज में अब एक दरार पैदा करने की कोशिश कर रहा है। खालिस्तानी उग्रपंथी गुरपतवंत पन्नू और उसके गुर्गे भी उस देश में सक्रिय हैं जो कुछ देशों में भारत विरोधी भाव पैदा करने की असफल कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तान से मिल रहे कथित पैसों और रणनीतिक मदद से उनका एजेंडा ही भारतवंशियों के प्रति नफरत पैदा करना, भारत की मोदी सरकार के विरुद्ध दुष्प्रचार करना और खालिस्तान की अलगावादी सोच को आगे बढ़ाना रहा है। बहुत संभव है आस्ट्रेलिया में ऐसी विभेदकारी रैलियां निकालने वालों के पीछे ऐसी ताकतें छिपी हों। आस्ट्रेलिया की सरकार को ऐसे सभी प्रयासों को गंभीरता से पहचानकर उन्हें शुरू में ही दबाना होगा।
वहां भारतवंशियों और अन्य आप्रवासियों को निशाना बनाना न केवल अनैतिक है, बल्कि यह उस मूल भावना के खिलाफ है जिस पर आधुनिक आस्ट्रेलिया खड़ा है। सरकार की स्पष्ट प्रतिक्रिया और समाज के प्रगतिशील वर्गों की इसके विरुद्ध सक्रियता इस बात का संकेत है कि नफरत और विभाजन की राजनीति को व्यापक समर्थन नहीं मिलेगा।
















