आवारा कुत्तों के केस में सुप्रीम कोर्ट की ‘पीठ बदली’, पूर्व SC जज बोले- यह परंपरा न्यायपालिका के लिए खतरनाक
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आवारा कुत्तों के केस में सुप्रीम कोर्ट की ‘पीठ बदली’, पूर्व SC जज बोले- यह परंपरा न्यायपालिका के लिए खतरनाक

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय एस. ओका ने अपने रिटायरमेंट के बाद दिए गए पहले इंटरव्यू में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चिंता जताई है।

Written byMahak SinghMahak Singh
Aug 25, 2025, 10:23 am IST
inभारत

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय एस. ओका ने अपने रिटायरमेंट के बाद दिए गए पहले इंटरव्यू में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट में चल रहे एक मामले का जिक्र किया, जो दिल्ली और आसपास के इलाकों में आवारा कुत्तों से जुड़ा है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ द्वारा दिए गए आदेश पर भारी विरोध के बाद, उसे दूसरी पीठ को सौंप दिया गया। जस्टिस ओका का मानना है कि यह परंपरा न्यायिक प्रक्रिया के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

क्या है पूरा मामला- 11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में आवारा कुत्तों को पकड़कर उन्हें शेल्टर होम (आश्रय स्थल) में भेजने का आदेश दिया। इस आदेश के बाद पशु प्रेमियों, मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसकी जमकर आलोचना की।

उनका कहना था कि यह आदेश जानवरों के अधिकारों के खिलाफ है। इस आलोचना के तुरंत बाद, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस भूषण आर. गवई ने प्रशासनिक स्तर पर हस्तक्षेप करते हुए इस मामले को जस्टिस पारदीवाला की पीठ से हटाकर एक बड़ी पीठ को सौंप दिया। इस बड़ी पीठ ने 22 अगस्त को पुराने आदेश को “बहुत कठोर” बताते हुए उसमें बदलाव किया। नए आदेश में कहा गया कि आवारा कुत्तों को पकड़ने के बाद उनका नसबंदी और टीकाकरण किया जाए, और फिर उन्हें उसी जगह पर छोड़ दिया जाए जहाँ से उन्हें पकड़ा गया था।

जस्टिस ओका की आपत्ति- जस्टिस अभय ओका ने इस पूरी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि अगर किसी आदेश को बदलना हो, तो वह केवल उसी पीठ द्वारा दोबारा सुनवाई करके या समीक्षा याचिका के जरिए किया जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश को यह अधिकार नहीं है कि वे किसी पीठ को पत्र लिखकर उसके आदेश में बदलाव करें या मामला किसी दूसरी पीठ को सौंप दें। उनका कहना है कि इस तरह का प्रशासनिक हस्तक्षेप न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करता है। अगर किसी पीठ के आदेश पर असहमति है, तो उस पर कानूनी प्रक्रिया के तहत काम होना चाहिए, न कि सार्वजनिक आलोचना के दबाव में आकर पीठ को बदला जाए। जस्टिस ओका ने सुझाव दिया कि अगर मामला बड़ी पीठ को सौंपना ही था, तो जस्टिस पारदीवाला की मौजूदा पीठ में एक और जज जोड़कर बड़ी पीठ बनाई जा सकती थी। इससे न्यायिक प्रक्रिया में निरंतरता बनी रहती और पहले से जुड़ी पीठ को अचानक हटाने की जरूरत नहीं पड़ती। उन्होंने इसे सैद्धांतिक रूप से गलत बताया।

Topics: Justice Avhay S Okastray dog caseSupreme CourtJustice BR GavaiJustice Abhyay S Oka
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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