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होम भारत

फिल्म विवाद : सच से तिलमिलाई ममता

ममता बनर्जी को सच हमेशा चुभता है। ‘बंगाल फाइल्स’ पर उनका बवाल दरअसल उस विभाजन-कालीन इतिहास से भागने की कोशिश है, जिसे वह दबा देना चाहती हैं।

Written byविष्णु शर्माविष्णु शर्मा
Aug 25, 2025, 11:39 am IST
in भारत, विश्लेषण, पश्चिम बंगाल
विवेक अग्निहोत्री निर्देशित ‘द बंगाल फाइल्स’ फिल्म के ट्रेलर का एक दृश्य, वोट बैंक की राजनीति के लिए ममता बनर्जी कर रहीं फिल्म का विरोध

विवेक अग्निहोत्री निर्देशित ‘द बंगाल फाइल्स’ फिल्म के ट्रेलर का एक दृश्य, वोट बैंक की राजनीति के लिए ममता बनर्जी कर रहीं फिल्म का विरोध

विवेक अग्निहोत्री ने ‘द बंगाल फाइल्स’ के ट्रेलर लांच के लिए जो दिन चुना था, वह ‘ममता दीदी’ को कैसे पचता कि कोई उस तारीख विशेष पर उसी तारीख से जुड़े घावों को कुरेदने आ रहा है। तारीख थी 16 अगस्त, वह दिन जब 1946 में मुस्लिम लीग ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का ऐलान किया था ताकि अंग्रेज, कांग्रेस और हिंदू ये बात मान लें कि पाकिस्तान के अलावा कोई विकल्प नहीं। उस दिन हजारों हिंदुओं को काट डाला गया था, मुस्लिमों की उन्मादी भीड़ ने सैकड़ों हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार के बाद उनकी नग्न लाशों को इमारतों की खिड़कियों से लटका दिया था।

विष्णु शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार व फिल्म समीक्षक

आमतौर पर दिल्ली में रिलीज से पहले सप्ताह में ऐसे कार्यक्रम होते रहते हैं। ऐसे कार्यक्रमों के लिए निर्माता को पुलिस या महानगर पालिका आदि की अनुमति की जरूरत नहीं होती, क्योंकि न तो इतने लोग ही आते हैं और न ही वहां आम लोगों को जाने की अनुमति होती है। लेकिन कोलकाता पुलिस ने न केवल बिजली के तार काट दिए, बल्कि अनुमति के कागज भी मांगे।

दो थानों की पुलिस ऐसे जमा हुई मानो किसी गैंगस्टर से लड़ने जा रहे हों। एक पुलिस अधिकारी ने मंच पर आकर कार्यक्रम को रोक दिया और सादी वर्दी में आए एक पुलिस वाला उस लैपटॉप को वहां से उठा ले गया, जिससे ट्रेलर चलाया जा रहा था। विवेक ने रोका तो उनसे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की अनुमति मांगी गई। विवेक के खिलाफ एक एफआईआर भी दर्ज करवा दी गई। हालांकि बाद में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 26 अगस्त तक के लिए उस एफआईआर पर रोक लगा दी।

जैसे ही विवेक अग्निहोत्री कोलकाता पहुंचे तो वहां जाकर पता चला कि राजनीतिक दबाव में उस ट्रेलर लांच में सहयोगी थिएटर समूह ने अपने हाथ फिल्म से खींच लिए हैं, तब विवेक ने इस फाइव स्टार होटल का रुख किया। हालांकि टीएमसी के नेता धमकाने की बात से साफ मुकर रहे हैं।

‘जग्गा जासूस’ और ‘कल्कि’ जैसी बड़ी हिंदी फिल्मों से चर्चा में आए मशहूर बंगाली कलाकार शाश्वत चटर्जी कह रहे हैं कि उनको तो फिल्म का नाम ‘दिल्ली फाइल्स’ बताया गया था। विवेक अग्निहोत्री का कहना है, शाश्वत वही कह रहे हैं, जो तृणमूल के लोग उनसे कहलवा रहे हैं। उनको ‘दिल्ली फाइल्स: बंगाल चैप्टर’ बताया गया था, बाद में नाम बदला, तब भी उन्हें पता था।

हालांकि गोपाल पाठा का किरदार निभा रहे बंगाली अभिनेता सौरव दास खामोश हैं। अनुपम खेर, मिथुन चक्रवर्ती, दर्शन कुमार आदि उनके साथ हैं। इधर, जिस गोपाल पाठा को विवेक हिंदुओं व कोलकाता के रक्षक के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं, उनके पौत्र सनातन मुखर्जी ने नाराज होकर विवेक के खिलाफ एफआईआर करवा दी है। उनकी परेशानी परिवार से अनुमति न लेने को लेकर है या तृणमूल के डर से या मुस्लिमों के डर से, समझना आसान नहीं। उनका कहना है कि परिवार की दो मीट की दुकानें थीं, लेकिन उनको ‘कसाई’ नहीं कहना चाहिए था।

वोट बैंक की राजनीति

हाल ही में फिल्म निर्माता सुदीप्तो सेन को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है, ममता बनर्जी ने उनकी फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ पर भी पश्चिम बंगाल में प्रतिबंध लगा दिया था। बाद में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर फिल्म से रोक हटानी पड़ी। ऐसे ही मामला था ‘द डायरी ऑफ वेस्ट बंगाल’ का। 2023 में इस फिल्म के निर्देशक सनोज मिश्रा पर बंगाल को बदनाम करने का आरोप लगाया गया। कहा गया इसमें ममता सरकार की रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति पक्षपात की नीति और हिंदू त्योहारों पर प्रतिबंध जैसे मुद्दों को उठाया गया है। सनोज मिश्रा के खिलाफ एफआईआर करके थाने में पूछताछ के लिए बुलाया गया। इतना दबाव निर्माताओं पर पड़ा कि अब किसी को पता नहीं कि ये फिल्म कहां गई।

बंगाली निर्देशक राहुल मुखर्जी पर फेडरेशन ऑफ सिने टेक्नीशियन्स एंड वर्कर्स ऑफ ईस्टर्न इंडिया ने पिछले साल तीन महीने का प्रतिबंध लगा दिया था। वजह थी कि उन्होंने बांग्लादेश में एक ओटीटी फिल्म की शूटिंग बिना सूचना दिए और स्थानीय टेक्नीशियन्स का उपयोग करके की। जाहिर है मामला ममता बनर्जी के दरबार में ही सुलझा। इसी बहाने सरकार ने एक समीक्षा समिति भी गठित कर दी ताकि बाकी निर्माताओं के सीरियल्स या फिल्मों में भी हस्तक्षेप किया जा सके।

सर्वोच्च न्यायालय ने सिखाया था सबक

2019 में बंगाली फिल्मकार अनिक दत्ता ने एक फिल्म बनाई ‘भविष्येर भूत’। रिलीज के अगले दिन ही फिल्म को सिनेमाघरों ने दिखाने से साफ मना कर दिया, पूछने पर बस इतना कहा कि ‘ऊपर से आदेश हैं’। आरोप लगे कि तृणमूल और अन्य कुछ राजनीतिक दलों पर इस फिल्म में निशाना साधा गया है। अनिक दत्ता इस गुंडागर्दी के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय चले गए। मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ की अगुवाई में सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने ममता सरकार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उल्लंघन पर 20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। बावजूद इसके ममता सरकार के डर के चलते बहुत से सिनेमा घर उस फिल्म को चलाने के लिए राजी नहीं हुए। इस साल फिल्मवालों व थिएटर मालिकों पर नकेल कसने के लिए, उनमें फूट डालने के लिए ममता एक नई योजना लेकर आईं। एक नोटिफिकेशन जारी किया गया है कि सभी सिनेमाघरों और मल्टीप्लेक्स में प्राइम टाइम (दोपहर 3 बजे से रात 9 बजे) में कम से कम एक बंगाली फिल्म का शो अनिवार्य होगा। बंगाली फिल्मकार इस ऐलान से खुश होंगे, लेकिन हिंदी सिनेमा के जरिए ज्यादा पैसा, ज्यादा नाम और पहचान कमा रहे कलाकारों और हिंदी फिल्मों से ज्यादा पैसा कमा रहे सिनेमाघरों के मालिकों के लिए तो ये झटका है।

फिल्म जगत का करती हैं इस्तेमाल

न जाने कितने बंगाली फिल्म के सितारों को ममता बनर्जी ने सांसद और विधायक बनाया है। इनमें शताब्दी रॉय, मिमी चक्रवर्ती, नुसरत जहां, मुनमुन सेन, तापस पाल, चिरंजीत, देबाश्री रॉय और गायिका अदिति मुंशी जैसे कई चेहरे शामिल हैं। आए दिन कोई न कोई बंगाली फिल्म जगत का चेहरा तृणमूल कांग्रेस में शामिल होता ही रहता है। पिछले कुछ सालों में सायंतिका बनर्जी, सोहम चक्रवर्ती, निर्देशक राज चक्रवर्ती, जून मलैया, कंचन मलिक और सायोनी घोष जैसे चेहरे तृणमूल कांग्रेस में आए। दूसरी पार्टियों से भी लेने से परहेज नहीं, भाजपा से नाराज होने वाले शत्रुघ्न सिन्हा और बाबुल सुप्रियो के बारे में तो सबको पता है ही। ममता बनर्जी नियमित रूप से बंगाली गीतकारों को अपनी पार्टी की रैलियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बुलाती हैं और वजह सिर्फ एक, अपने वोट बैंक को बनाए रखना।
‘बंगाल फाइल्स’ ममता बनर्जी की दुखती रग क्यों?

‘द बंगाल फाइल्स’ से तृणमूल कांग्रेस के तो केवल कट्टर मतदाता ही नाराज हो सकते हैं, लेकिन कांग्रेस के लिए तो ये विभाजन जैसी विभीषिका हो जाएगी। सारी कहानी तो पंडित नेहरू की महत्वाकांक्षाओं से जुड़ी है, जो सारा ठीकरा किताबों में जिन्ना के मत्थे फोड़ गए थे। सवाल गांधीजी के अहिंसा व्रत के तोड़ने पर भी उठेंगे।

‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की घोषणा के बाद हुए नरसंहार को लेकर ‘टाइम’ पत्रिका ने कम से कम 20,000 हत्याएं होने की बात लिखी थी। माग्रेट बुर्क ह्वाइट ने नरसंहार के कुछ दिन बाद की कुछ तस्वीरें ‘लाइफ’ पत्रिका के लिए ली थीं। टाइम ने 2014 में वे तस्वीरें छापीं। उसकी कवर तस्वीर देखकर ही आप दहल जाएंगे, एक गली का दृश्य है, दूर तक लाशें बिखरी हैं, बीसियों गिद्ध उन लाशों को नोंच रहे हैं, गली के दोनों तरफ के मकानों-दुकानों की छतों पर भी इतने ही गिद्ध बैठे हुए हैं। ये हृदय विदारक है कि कई दिनों से सड़ रही लाशों को गिद्ध तो उठाने आ गए, लेकिन प्रशासन, पुलिस या सेना नहीं आई। 5 दिन के नरसंहार के बाद 21 अगस्त को बंगाल में गर्वनर शासन का ऐलान हुआ, 22 अगस्त को सेना भेजी गई। सफाई कर्मचारियों के फोटो भी इस पत्रिका में छपे हैं कि कैसे उन्हें रूमाल या मास्क नहीं, पूरे गमछे बांधने पड़ रहे थे। दरअसल ये पूरा मामला अंग्रेजी सरकार के केबिनेट मिशन से जुड़ा है। जून में मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनों ने उसकी योजना को हरी झंडी दे दी थी। इस योजना के तहत अखंड भारत में ही बहुत ज्यादा मुस्लिम जनसंख्या वाले इलाकों में उनको कुछ स्वायत्तता देनी थी। यानी केन्द्र का कुछ मामलों में हस्तक्षेप नहीं होना था।

10 जुलाई को नेहरू ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि हमें ये योजना मंजूर नहीं। यानी एक तरह से विभाजन को हरी झंडी दिखा दी। सोचिए, कुछ इलाकों को थोड़ी स्वायत्तता के साथ अगर अखंड भारत मिल जाता तो कल को अंग्रेजों के जाने के बाद संविधान में बदलाव हो सकते थे, नहीं तो विभाजन तो विकल्प था ही। नेहरू की जिद से पहले हो गया। जिन्ना, जो पाकिस्तान मिलने के प्रति बहुत आश्वस्त नहीं था, उसने ये मौका फौरन लपक लिया और कर दिया ऐलान कि अब पाकिस्तान ही लेंगे और ऐलान कर दिया कि 16 अगस्त को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ मनाया जाएगा। दिखावे के लिए उसे सामूहिक हड़ताल के तौर पर घोषित किया गया। दिलचस्प बात ये थी कि उन दिनों केन्द्र में कांग्रेस और मुस्लिम लीग की संयुक्त कार्यवाहक सरकार थी, जिसके मुखिया पंडित नेहरू थे।

तब से तैयारियां शुरू हो गईं। उस वक्त बंगाल का मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहारावर्दी था, जिसकी राजनीति ही मोतीलाल नेहरू द्वारा गठित ‘स्वराज पार्टी’ से हुई थी। जिन्ना ने जब बयान दिया कि, ‘’अब केवल दो विकल्प दिखते हैं या तो विभाजित भारत या फिर बर्बाद भारत’’। सुहारावर्दी ने 16 अगस्त की सार्वजनिक छुट्टी घोषित करवा दी। कांग्रेस के स्थानीय नेता सुहारावर्दी की नीयत और साजिश भांपने में कतई नाकाम रहे और बंगाल विधानमंडल में कांग्रेस के नेता किरण शंकर रॉय ने 14 अगस्त को हिंदू दुकानदारों से आह्वान कर डाला कि 16 को वे अपनी दुकानें खोले रखें, वही भारी पड़ गया।

मुसलमानों ने इकट्ठा होने की जगह चुनी ऑक्टरलोनी स्मारक (आजकल शहीद मीनार), जो 1804 में दिल्ली पर मराठों के आक्रमण नाकाम करने वाले अंग्रेज ऑक्टरलोनी की याद में बनाई गई थी। उस दिन जुमा भी था। सुहारावर्दी की अगुवाई में हजारों की भीड़ वहां जुटी तो निशाने पर वही दुकानदार सबसे पहले आए, जो कांग्रेस नेता किरण शंकर रॉय के आह्वान पर दुकान खोले हुए थे। लूट, बलात्कार और हत्याओं का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि हजारों मारे गए, लाखों शहर छोड़कर भाग गए। तभी सुहारावर्दी को इतिहास में ‘बंगाल का कसाई’ बोला जाता है।

उम्मीद थी तो बस गोपाल पाठा

पहले तो लगा था कि पुलिस मदद करेगी, लेकिन खुद सुहारावर्दी ने जब हथियारबंद मुस्लिमों पर कार्यवाही से रोका तो पुलिस में भी दो फाड़ हो गए थे। ऐसे में उम्मीद की किरण बनकर आए गोपाल चंद्र मुखर्जी यानी गोपाल पाठा। कहा जाता है कि गोपाल के पाठ 800 मरने-मारने वाले हिंदू नौजवानों का जत्था था। गोपाल का सबसे बड़ा योगदान था जिन्ना और सुहारावर्दी के उस सपने को चकनाचूर करना, जिसमें वे कलकत्ता को पाकिस्तान का हिस्सा बनाना चाहते थे। हिंदुओं के बीच डर खत्म कर और हजारों बेघर लोगों को शरण देकर वे महानायक बन गए। सुहारावर्दी ने खुद गोपाल से लड़ाई रोकने की विनय की और गोपाल ने शर्त रखी कि पहले मुस्लिमों से हथियार वापस लेने होंगे। एक साल बाद गांधीजी को बंगाल के दंगों में इन्हीं गोपाल पाठा के स्टेनगनधारी युवकों से सुरक्षा लेनी पड़ी थी, वह भी खुद लिखकर देने के बाद।

http://वोट की रानजीति

Topics: vivekपाञ्चजन्य विशेषद बंगाल फाइल्सThe Bengal Filespartition period historyममता बनर्जीAgnihotriवोट बैंक की राजनीतिविभाजन-कालीन इतिहासGandhijiफिल्म विवादVote Bank Politicsसच से तिलमिलाई ममताMamta Banerjeeअग्निहोत्रीविवेकविष्णु शर्मा
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