आज भारत सहित पूरे विश्व में घर-परिवार एवं समाज की संरचना बदलती जा रही है। संयुक्त परिवार नाम की अवधारणा अब लगभग विलुप्त होने की कगार पर है। एकल परिवार का चलन अब पूरे विश्व में फैल चुका है। एकल परिवार की भी यदि बात की जाये तो उसमें माता-पिता एवं सास-ससुर का भी स्थान नहीं के बराबर है। सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न होता जा रहा है। ताऊ-ताई, मौसा-मौसी, फूफा-बुआ जैसे रिश्तों की तासीर जैसे कम हो गई है। एकल परिवार का आशय सीधा-सा अब यह है कि पति-पत्नी और बच्चे। बच्चे भी एक या अधिक से अधिक दो यानी कुल मिलाकर स्थिति अब यही देखने को मिल रही है। ‘हम दो-हमारे दो’ वाली कहावत अब ‘हम दो हमारा एक’ में चरितार्थ होती दिख रही है। ऐसी स्थिति में बच्चों को भी माता-पिता का न तो पूरा प्यार और न ही संस्कार मिल पा रहे हैं। किसकी किराये की कोख से पैदा बच्चों को मां-बाप कितना प्यार या नौकर-नौकरानियों के भरोसे बच्चों को कितना प्यार दे देंगे, इसकी मात्र कल्पना की जा सकती है। निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि छिटकते, सिमटते परिवार, अकेलेपन को जन्म देने के साथ-साथ सहानुभूति, सद्भावना, नैतिकता, दया, करुणा, धर्म जैसे मानव के मूल संस्कारों व गुणों पर भी कुठाराघात कर रहे हैं।
सामाजिक संरक्षकों व दायित्वों की अवहेलना के चलते कोरोना काल में एकल परिवारों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ा, यह सभी को पता है। तन्हाई लोगों को डिप्रेशन (अवसाद) में डाल रही है। वृद्धाश्रम, विधवाश्रम और बाल आश्रमों में लोगों का नजरिया जीवन के प्रति बदल रहा है। इन आश्रमों में जाकर लोगों को चाहे जितनी भी सुख-सुविधाएं मिल जायें किंतु निराशा ही हाथ लगती है। आध्यात्मिक आवश्यकताओं के अनुसार एकल परिवारों की वजह से अब तो लोग अपने परिजनों का अंतिम-संस्कार एवं क्रिया-कर्म भी ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। इसी कारण पितृदोष भी बढ़ता जा रहा है यानी पूर्वजों की कृपा प्राप्त नहीं हो पा रही है। परिवार की किसी परेशानी में मदद करने से पितृ कतराने लगते हैं। आध्यात्मिक भाषा में मूल रूप से इसी को पितृदोष कहा जाता है। सामाजिक सुविधा व सुरक्षा के चलते विश्वभर में आजकल तो विभिन्न प्रकार की सेवा के नाम पर अर्थ इकट्ठाकर, दुरुपयोग कर, बुजुर्गों का पूर्ण रूप से शोषण भी किया जा रहा है जो न केवल अमानवीय बल्कि अवांछनीय भी है। पितरों के प्रति हमारे ऊपर जो ऋण हैं, उसे तो पूरा करना हमारा कर्तव्य है। संयुक्त परिवारों के टूटने से बच्चों एवं युवाओं को इन बातों की नसीहत एवं सीख कौन दे? इसी वजह से तो बच्चों एवं युवाओं में संस्कारहीनता बढ़ती जा रही है। संस्कारों की कमी से समाज में अनेक प्रकार की बुराइयां देखने को मिल रही हैं। ऐसी परिस्थितियों में शताब्दी वर्ष के पिछले दशकों से विशेष कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भी संस्कार प्रदाता, राष्ट्रभक्ति, नैतिकता, अनुशासनात्मक जीवनशैली व सामाजिक सुरक्षा का सबसे बड़ा कवच बनकर उभरा है।
जब भी समाज और राष्ट्र को जरूरत होती है संघ परिवार बिना स्वार्थ के पहुंचता है
सामाजिक सुरक्षा कवच का आशय मेरा इस बात से है कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में, किसी भी प्रकार की स्थिति में जब भी किसी व्यक्ति, परिवार, समाज एवं राष्ट्र को जरूरत होती है, वहां संघ परिवार बिना किसी स्वार्थ के खड़ा मिलता है। सुबह या शाम की एक घंटे की शाखा में बच्चों एवं युवाओं को जो कुछ मिलता है उससे बच्चे एवं युवा समाज में एक श्रेष्ठ नागरिक के रूप में तैयार हो जाते हैं। एक घंटे की शाखा बच्चों को योग, व्यायाम, प्राणायाम, धर्म-अध्यात्म, नैतिक मूल्य, अनुशासन, संस्कार, राष्ट्रभक्ति एवं अन्य सदगुणों से पूर्ण बनाती है। इन सब में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सब निःशुल्क है। इसके बदले किसी को कुछ भी देना नहीं होता है। अपेक्षा सिर्फ इतनी ही रहती है कि बच्चा समाज में श्रेष्ठ नागरिक बनकर उभरे। इन्हीं सब कारणों से एक घंटे की शाखा को व्यक्ति निर्माण की निःशुल्क पाठशाला कहा जाता है। व्यक्ति निर्माण को ही ध्यान में रखकर संघ प्रभात शाखा, सायं शाखा, रात्रि शाखा, मिलन, संघ मंडली आदि शाखाओं का संचालन करता है। एक अनुमान के मुताबिक विश्व में एकत्रीकरण, गोष्ठियों, मिलन इत्यादि शाखाओं के रूप में व्यक्ति, परिवार, समाज एवं राष्ट्र निर्माण में लगी हुई हैं व वैश्विक स्तर पर समाज को सामाजिक सुरक्षा कवच प्रदान करने हेतु अग्रसर है।
सामूहिकता का बोध है सामाजिक सुरक्षा का आधार
सामाजिक सुरक्षा कवच के प्रणेता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में एक विशेष बात यह कही जा सकती है कि 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन अपनी स्थापना काल से लेकर आज तक संघ की कार्यप्रणाली एवं गुणवत्ता में कोई भी कमी आना तो दूर की बात अपितु कार्यप्रणाली एवं गुणवत्ता में अनवरत और अधिक निखार आता जा रहा है। वक्त एवं परिस्थितियों के मुताबिक संघ राष्ट्र एवं समाज के निर्माण एवं विकास हेतु दीपावली वर्ग, शीत शिविर, निवासी वर्ग, बौद्धिक वर्ग, शारीरिक वर्ग, संघ शिक्षण वर्ग, (प्राथमिक वर्ग, प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष, तृतीय वर्ष) का आयोजन करता है। संघ परिवार की सेवा, साधना एवं बलिदान के 100 वर्ष पूरे होने वाले हैं। संघ के लगभग 50 से अधिक संगठन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त हैं तो लगभग 200 से अधिक संगठन क्षेत्रीय प्रभाव रखते हैं। संघ के स्वयंसेवक एवं देशवासी अपनी महान परंपराओं, रीति-रिवाजों, पर्वों एवं गौरवमयी विरासत से जुड़े रहें, इस बात को ध्यान में रखते हुए मकर संक्रांति, महाशिवरात्रि, होली, रामनवमी, नवरात्रि, दशहरा, दीपावली, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, रक्षाबंधन जैसे त्यौहार संघ द्वारा अनिवार्य रूप से मनाए जाते हैं । इसके पीछे का भाव यह है कि लोग अपनी जड़ों से जुड़े रहें, अपनी गौरवमयी विरासत पर गर्व करें और सामूहिक रूप से रहकर समाज में सुरक्षा कवच के रूप में अपनी पहचान बनाएं। सुरक्षा कवच का सीधा-सा अभिप्राय यह है कि लोगों की सुरक्षा में सदैव तत्पर रहना। संयुक्त परिवारों के विघटन के बाद संघ की शाखाओं, संघ शिक्षण वर्गों एवं संघ के विभिन्न कार्यक्रमों में जाकर ही सामूहिकता का बोध होता है। सामूहिकता का बोध ही सामाजिक सुरक्षा का आधार बनता है और इसी से अन्य लोगों के लिए कुछ करने का मन में भाव उत्पन्न होता है। सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि ये सब संघ परिवार के महान कार्य हैं।
समाज के सभी क्षेत्रों में कार्य कर रहा संघ
भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ, सेवा भारती, सहकार भारती, राष्ट्र सेविका समिति, भारतीय विद्यार्थी परिषद, विश्व हिन्दू परिषद, स्वयंसेवक संघ, स्वदेशी जागरण मंच, सरस्वती शिशु मंदिर, विद्याभारती, बनवासी कल्याण आश्रम, बजंरग दल, लघु उद्योग भारती, भारतीय विचार केंद्र, राष्ट्रीय सिख संगत, हिन्दू जागरण मंच, विवेकानंद केंद्र जैसे आनुसांगिक एवं अन्य वैचारिक संगठन समाज में लगभग सभी क्षेत्रों में कार्य करते हुए सुरक्षा कवच के रूप में ख्याति प्राप्त कर रहे हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि आज समाज का कोई ऐसा कोना एवं क्षेत्र नहीं है जहां संघ का कार्य न हो। अपनी स्थापना काल से लेकर आज तक एक भी स्वयंसेवक ऐसा नहीं हुआ जिसने कहीं कोई राष्ट्र विरोधी कार्य किया हो। आज समाज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रामाणिकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रात को दो बजे या एकदम सुबह किसी अन्य संगठन के लोग कहीं जाकर ‘भारत माता की जय’ एवं ‘वंदे मातरम्’ के नारे लगाने लगें तो लोग प्रसन्न होते हुए यही कहते हैं कि संघ परिवार वाले आ गये। संघ के लिए समाज में इससे बड़ी उपलब्धि एवं प्रामाणिकता और क्या हो सकती है? संघ की इसी खूबी के कारण लोग अपने लिए संघ को सुरक्षा कवच के रूप में देखते हैं। विश्वसनीयता व निर्भरता का समाज के विश्वास का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश-विदेश में कभी भी, कहीं भी, किन्हीं परिस्थितियों और आपातकालीन सेवाओं के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लोग अपने लिए खड़ा पाते हैं और अनायास ही समाज के सभी वर्ग चाहे वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हों या न जुड़े हों, कहते मिल जाते हैं कि हमें तो पहले ही पता था कि यहां संघ के लोग आगे आयेंगे और सेवा करेंगे।
इसलिए दी जाती है सामाजिक सुरक्षा कवच की संज्ञा
सामाजिक सुरक्षा कवच की संज्ञा संघ परिवार को इसलिए ही दी जाती है, क्योंकि बाढ़, सूखा, भूस्खलन, महामारी, युद्ध या युद्ध जैसे हालात या अन्य किसी प्रकार की आपदा में संघ परिवार बिना किसी लोभ-लालच एवं स्वार्थ के राष्ट्र एवं समाज की सेवा में लग जाता है। सेवा कार्यों में संघ किसी भी धर्म, पंथ, जाति एवं अन्य बातों का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखता। अपने स्थापना काल से संघ सदैव उस समय राष्ट्र एवं समाज के साथ खड़ा मिला है, जब उसे जरूरत पड़ी है। अभी हाल ही में उत्तराखंड के धराली में आई भीषण आपदा में संघ परिवार निरंतर सेवा कार्यों में लगा हुआ है। आज समाज में सभी को ऐसा लगता है कि जब हमें जरूरत पड़ेगी तो संघ हमारे साथ खड़ा मिलेगा। देशवासियों में यदि संघ परिवार के प्रति इस प्रकार का भाव है तो यही भाव सामाजिक सुरक्षा कवच की नींव भी है। इसी धारणा को और अधिक मजबूत करने के लिए समाज को संघ परिवार के और भी करीब आना चाहिए। संघ समाज एवं राष्ट्र से कुछ चाहता नहीं है बल्कि उसके अंदर सदैव यह भाव रहता है कि ‘देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें।’ राष्ट्र के प्रति स्वयंसेवकों के मन में सदैव यही भाव रहता है कि ‘तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें या न रहें।’ शाखाओं में प्रतिदिन गायी जाने वाली इस प्रकार की लाइनें संघ परिवार के लिए आक्सीजन का कार्य करती हैं। यही आक्सीजन राष्ट्र एवं समाज के लिए सुरक्षा कवच बन जाती है।
विरोधियों ने भी की संघ की प्रशंसा
सामाजिक सुरक्षा कवच बनकर हर समय खड़े मिलने का कारण यह है कि डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार, माधव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरु जी) मधुकर दत्तात्रेय देवरस, प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया), के. सी सुदर्शन एवं 2009 से लेकर अब तक डॉ. मोहनराव मधुकरराव भागवत जैसे राष्ट्र ऋषियों ने यदि राष्ट्र एवं समाज निर्माण में अपना जीवन नहीं लगाया होता तो क्या संयुक्त परिवारों के विघटन के दौर में राष्ट्र एवं समाज अपने अस्तित्व एवं अस्मिता के साथ खड़ा हो पाता? वास्तव में देखा जाये तो राष्ट्र यदि अपनी महान परंपराओं एवं गौरवमयी विरासतों के साथ खड़ा है तो निश्चित रूप से इसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही है। देश विभाजन से लेकर अब तक जितनी भी आपदायें आई हैं, उसमें संघ के सेवा कार्यों की प्रशंसा करने के लिए संघ के विरोधी भी बाध्य हुए हैं। गलत इरादों एवं संघ को कमजोर करने की दृष्टि से संघ पर जब-जब प्रतिबंध लगा है, तब-तब संघ और मजबूत होकर उभरा है। वर्तमान परिस्थितियों में सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में जहां अधिकांश लोगों के मन में कुछ पाने की इच्छा अनवरत बढ़ती जा रही है वहीं संघ के तपे-तपाये स्वयंसेवकों ने जब भी राष्ट्र की बागडोर संभाली है तो राष्ट्र एवं समाज से कुछ प्राप्त करने के बजाय देश का मान-सम्मान एवं गौरव बढ़ाया है। अटल जी जैसे स्वयंसेवक ने आर्थिक प्रतिबंधों से डरे बिना परमाणु परीक्षण की छूट देकर एवं कारगिल विजय में सेना का हौसला बढ़ाकर देश का मान बढ़ाया तो नरेंद्र मोदी जैसे स्वयंसेवक भारत को विश्वगुरु बनने के मार्ग पर ले जाने के लिए अनवरत कार्य कर रहे हैं। यहां मेरे कहने का आशय मात्र यह है कि स्वयंसेवकों के मन में सदैव यही भाव रहता है कि वे किसी भी रूप में मां भारती के काम आ सकें और देश का मान-सम्मान बढ़ा सकें।
बच्चों युवाओं, बुजुर्गों सभी की सहायता
सामाजिक सुरक्षा के दायित्व को आवश्यकता जानकर कोरोना काल में जब देश के लगभग सभी विभिन्न विचारधाराओं वाले राजनीतिक संगठन अपनी जान बचाने के लिए अपने-अपने घरों में थे, उस समय स्वयंसेवक अपनी जान की परवाह न करते हुए समाज एवं राष्ट्र की सेवा में सड़कों पर थे। स्वयंसेवकों के परिश्रम की बदौलत भारतीय आयुर्वेदिक काढ़ा अपने देश में कोरोना जैसी वैश्विक महामारी को रोकने में न सिर्फ कामयाब रहा बल्कि दुनिया के अन्य देशों को भी आयुर्वेदिक दवाइयों, काढ़ा एवं वैक्सीन से मदद की। कुल मिलाकर मेरा कहने का आशय यह है कि आज अगर देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ न होता तो लोगों के मन में अपनी सुरक्षा को लेकर कदम-कदम पर खतरा महसूस होता। एकल परिवारों के दौर में संघ परिवार ने बच्चों एवं युवाओं को शिक्षित, संस्कारित एवं नैतिक मूल्यों से पूर्ण करने का कार्य किया है तो बुजुर्गों के लिए भी सहारा बनकर उभरा है। कोई भी स्वयंसेवी संगठन समाज एवं राष्ट्र को इससे अधिक और क्या दे सकता है? वास्तव में संघ परिवार की यही पूंजी भी है। हम सभी की जिम्मेदारी बनती है कि संघ परिवार के साथ मिलकर सामाजिक सुरक्षा कवच के रूप में, मानव वट-वृक्ष रूपी पूंजी को और अधिक बढ़ाने के लिए ईश्वरीय रूपी कार्य मानकर सहयोग करें।
विश्वसनीयता है संपर्क का माध्यम
सामाजिक सुरक्षा कवच की अवधारणा का स्वरूप समाज में इसलिए स्वीकारा जाता है कि आप कहीं भी, कभी भी, सुख-दुख, देश-विदेश, व्यापार इत्यादि में स्वयंसेवकों के साथ सम्पर्क कर विश्वसनीयता के साथ भागीदारी कर किसी भी प्रकार की समस्या का समाधान पा सकते हैं। इसको लेकर मेरे व्यक्तिगत अनुभव भी रहे हैं। बिना किसी हिचकिचाट के यह कहा जा सकता है कि संघ के संस्कारित, ईमानदार और सद्भावना के साथ स्वयंसेवक विश्व के किसी भी कोने में मिल जायेंगे जो आपको पारिवारिक भावना के साथ सुरक्षा कवच के रूप में नजर आयेंगे। अब तो यह स्थिति लगभग हर क्षेत्र में यानी प्रशासनिक, राजनीतिक, रक्षा, सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि क्षेत्रों में देखने को मिल जाती है और जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कारित स्वयंसेवक आपको अपनेपन और आत्मीयता का बोध अपने आचार-व्यवहार के कारण करा ही देंगे।
एआई के युग में जब आप अकेले होंगे तब भी आपके साथ खड़े होंगे स्वयंसेवक
सामाजिक सुरक्षा कवच की आवश्यकता अब तो आने वाले समय में और अधिक बढ़ने वाली है, जब छद्म बुद्धिमत्ता (artificial intelligence) आने के बाद आने वाले समय में अराजकता, उन्माद, वैश्विक स्तर पर वर्चस्व बनाने हेतु मानवता को ताक पर रखकर अन्य उभरते देशों का शोषण, बेरोजगारी बढ़ने के साथ-साथ विश्व के युवा वर्ग को यह महसूस होने लगेगा कि भविष्य तो हमारा बहुत अंधकारमय है मगर अब उनके मन में यह बात बैठने लगी है और हमें प्रयास कर बैठानी भी होगी कि आप स्वयंसेवक बनकर, अदृश्य विश्व स्तरीय परिवार के साथ सम्पर्क बनाकर सामाजिक सुरक्षा कवच के साथ जी सकेंगे और आपके मन का यह डर कि मैं अकेला हूं, मैं नया हूं, मुझे कोई नहीं जानता, मुझे कोई नहीं पहचानता इत्यादि भाव से मुक्त होकर जीवन व्यतीत किया जा सकता है व कर सकेंगे और संघ के संरक्षण में लोग इसी सोच के साथ कर भी रहे हैं।
सामाजिक सुरक्षा कवच अपनाने हेतु विश्व की युवा पीढ़ी के मन में जब ये भाव स्वतः ही उत्पन्न होने शुरु होंगे कि मैं एक समूह हूं, संगठित हूं, विश्वव्यापी परिवार का सदस्य हूं, सुख-दुख में मेरे साथ सामाजिक सुरक्षा कवच के रूप में विशुद्ध संस्कारों वाला संघ परिवार है और इस पवित्र सोच के साथ हम बढ़ेंगे तो प्राचीन काल से प्रचलित ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की कल्पना को साकार कर विश्व गुरु बनने की ओर अग्रसर अवश्य होंगे। ऐसी समाज में धारणा है और आगे भी शनैः-शनैः बढ़ती रहेगी, ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है।















