क्या इसे मुनीर की दो महीने में दो बार अमेरिका यात्रा पर जाने का असर माना जाए जो अमेरिका ने आतंकवाद से लड़ने में जिन्ना के देश की तारीफ की है? या इसे इस्लामाबाद की चालाकी माना जाए कि वह खुद को आतंक पीड़ित बताकर बार बार अमेरिका को झांसा देता है और उससे मदद पाता, सैन्य और आर्थिक दोनों तरह की? दो दिन पहले जिन्ना के देश की राजधानी इस्लामाबाद में संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के विशेष सचिव नबील मुनीर और अमेरिका के इस्लामाबाद में अमेरिकी विदेश विभाग में आतंकवाद रोधी कार्यवाहक समन्वयक ग्रेगरी डी लोगेरफो के बीच हुई बैठक में जो हुआ उसे एक आश्चर्यजनक घटनाक्रम बताया जाए या अमेरिका की नासमझी? दोनों देशों ने शुरुआत में आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई करने में एक दूसरे की तारीफ करने के बाद आगे इस मुसीबत से मिलकर लड़ने की योजना बनाई है! जिहाद की नर्सरी के नाम से दुनिया भर में बदनाम पाकिस्तान क्या एक बार फिर ‘अमेरिका का आतंक के विरुद्ध लड़ाई में सहयोगी’ का दर्जा पा रहा है? क्या सच में दोनों देश मिलकर टीटीपी और बीएलए के विरुद्ध साझा सैन्य अभियान छेड़ने वाले हैं? ऐसे कई सवाल आज विशेषज्ञों में बहस का विषय बने हैं।
साल 2025 में पाकिस्तान के सेना प्रमुख ‘फील्ड मार्शल’ असीम मुनीर की कम अंतराल पर गत दिनों दो बार हुई अमेरिका यात्रा को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक अहम मोड़ माना जा रहा है। बताया गया कि इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने आतंकवाद के विरुद्ध सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। यहां हमें अमेरिका की प्राथमिकताओं और रणनीतिक संदर्भ पर गौर करना होगा।
अमेरिका की वैश्विक रणनीति में पाकिस्तान की भूमिका भले ही 2011 के एबटाबाद ऑपरेशन के बाद कम हो गई हो, लेकिन अफगानिस्तान से सैनिक वापसी और वहां चीन की बढ़ती मौजूदगी के कारण अमेरिका फिर से पाकिस्तान को एक ‘क्षेत्रीय संतुलनकर्ता’ के रूप में देख रहा है। अमेरिका को अफगानिस्तान में स्थिरता चाहिए, और उसके लिए पाकिस्तान की सीमाओं पर नियंत्रण और आतंकी समूहों के खिलाफ कार्रवाई उसे जरूरी लगती है।
इसी संदर्भ में, मुनीर की यात्रा से एक संकेत गया है कि पाकिस्तान अमेरिका के साथ अपने संबंधों को फिर से स्थिर और प्रासंगिक बनाना चाहता है, खासकर ऐसे समय में जब पाकिस्तान आंतरिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और बढ़ते आतंकवाद से जूझ रहा है।
पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चिंता TTP और BLA जैसे संगठनों की बढ़ती गतिविधियां हैं। TTP की हमले अब पहले से अधिक संगठित और घातक हो गए हैं। वहीं, BLA ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के तहत चल रही परियोजनाओं पर हमले तेज कर दिए हैं, जिससे पाकिस्तान की अनेक योजनाएं प्रभावित हो रही हैं।
असीम मुनीर की गत अमेरिका यात्रा के दौरान इन दोनों संगठनों के खिलाफ खुफिया साझेदारी, ड्रोन तकनीक के उपयोग और सीमा पार अभियानों पर चर्चा हुई। अगर यह समझौते धरातल पर उतरते हैं, तो पाकिस्तान इन आतंकवादी संजालों को कमजोर करने में कामयाब हो सकता है।
अब बात जिन्ना के देश के अमेरिका के सहयोगी देश के तौर पर उभरने की! ‘मेजर नॉन-नाटो’ सहयोगी के रूप में पाकिस्तान को पहले ही अमेरिका से सुरक्षा और हथियारों में कई तरह की छूट मिलती रही है। हालांकि 2018 में ट्रंप प्रशासन द्वारा पाकिस्तान की सैन्य सहायता में कटौती के बाद ये लेन—देन ठंडा पड़ गया था।
लेकिन आज बदली हुई क्षेत्रीय राजनीति, विशेषकर अफगानिस्तान में तालिबान सरकार की स्थिरता पर मंडराते खतरे और चीन की आर्थिक सक्रियता ने संभवत: अमेरिका को पाकिस्तान के साथ फिर से जुड़ने पर मजबूर कर दिया है। अमेरिका को पाकिस्तान के माध्यम से अफगानिस्तान पर नजर रखने के लिए भू-रणनीतिक सहयोग की ज़रूरत इसका एक पहलू है।
पाकिस्तान की ओर से भी संकेत हैं कि वह अमेरिका को एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में देख रहा है, विशेषकर चीन और खाड़ी देशों की आर्थिक मदद की सीमाओं को देखते हुए।
लेकिन क्या TTP और BLA के विरुद्ध ‘साझा अभियान’ संभव है? इस दृष्टि से सबसे बड़ी चुनौती है, अमेरिका की प्रत्यक्ष सैन्य भागीदारी को लेकर आनाकानी और पाकिस्तान की संप्रभुता को लेकर संवेदनशीलता। ऐसे में संभव है कि यह अभियान खुफिया साझेदारी, ड्रोन निगरानी और लॉजिस्टिक सहायता तक सीमित रहे।
अगर अमेरिका पाकिस्तान को उन्नत निगरानी उपकरण, ड्रोन तकनीक और साइबर जानकारियां उपलब्ध कराता है, तो पाकिस्तान घरेलू सुरक्षा अभियानों में असरदार साबित हो सकता है। लेकिन इसके लिए अमेरिका को भी भरोसा चाहिए होगा कि पाकिस्तान इन संसाधनों का उपयोग केवल आतंकवाद के विरुद्ध ही करेगा, न कि घरेलू असंतोष या राजनीतिक विरोधियों को कुचलने के लिए।
इसमें संदेह नहीं है कि भारत के लिए यह ‘साझेदारी’ चिंता का विषय हो सकती है, क्योंकि पाकिस्तान को अमेरिका से एक बार फिर सैन्य और खुफिया समर्थन मिलने का अर्थ है एलओसी और आतंकवाद को लेकर भारत की स्थिति पर असर। इसके अलावा, BLA को आतंकवादी संगठन घोषित करने में अमेरिका की जल्दबाजी से भारत को कूटनीतिक नुकसान होने के कयास लगाए गए हैं, क्योंकि भारत बलूच आंदोलन को मानवाधिकार और स्वायत्तता के दृष्टिकोण से देखता आ रहा है।
यहां ध्यान रहे कि, इतिहास दिखाता है कि अमेरिका-पाकिस्तान संबंध अक्सर स्वार्थ आधारित होते हैं। एक बार जब रणनीतिक जरूरतें पूरी हो जाती हैं, तो सहयोग फीका पड़ जाता है। इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह नई साझेदारी पिछली गलतियों से सबक लेकर स्थायी और प्रभावी बन पाएगी या फिर यह एक बार फिर जिन्ना के देश की धूर्तता और दोगलेपन को उजागर करने वाली घटना साबित होगी।

















