अमेरिका ने तालिबान सरकार में विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी को इस्लामाबाद जोन से रोककर न सिर्फ जिन्ना के देश के माथे पर पसीने उभारे हैं बल्कि तालिबान नेताओं को भी वाशिंगटन की इस रणनीतिक चाल की पैठ में जाने को मजबूर कर दिया है। अमेरिका के इस कदम ने नि:संदेह पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंधों पर उसकी नीति को लेकर विशेषज्ञों को भी सोच में डाला है। क्या इसके पीछे अमेरिका की भू-राजनीतिक, रणनीतिक और सुरक्षा पहलुओं को लेकर चिंता है। तालिबान के विदेश मंत्री अमीर ख़ान मुत्तकी को गत 4 अगस्त को इस्लामाबाद जाने से रोकना अमेरिका की उस नीति का हिस्सा है, जिसमें वह तालिबान को अंतरराष्ट्रीय वैधता देने से बचता है। अमेरिका नहीं चाहता कि तालिबान को किसी भी रूप में कूटनीतिक मान्यता मिले, खासकर तब जब अफगानिस्तान में मानवाधिकारों, महिलाओं की स्थिति और आतंकवाद को लेकर गंभीर चिंताएं बनी हुई हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने मुत्तकी के विदेश दौरों पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। मुत्तकी को विदेश जाने से पहले सुरक्षा परिषद की एक समिति से इसकी आज्ञा लेनी होती है तभी वह दूसरे देश की यात्रा कर सकते हैं। यह देखते हुए अमेरिका ने मुत्तकी के दौरे पर प्रतिबंध लगाया। माना जा रहा है कि उनके इस्लामाबाद जाने से यह संकेत जाता कि जिन्ना का देश तालिबान को अब फिर से समर्थन दे रहा है, जो अमेरिका की नीति के खिलाफ है। एक आकलन यह है कि अमेरिका चाहता है, तालिबान पहले अपने शासन में सुधार लाए, महिलाओं को अधिकार दे और आतंकवादी गुटों से दूरी बनाए। पाकिस्तान को लेकर यह छुपा सत्य है कि वह तालिबान को कूटनीतिक, रणनीतिक और सैन्य समर्थन देता आ रहा था और काबुल की कुर्सी तालिबान ने उसी के बूते कब्जाई थी।
हालांकि पाकिस्तान इन आरोपों से इनकार करता रहा है, लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि पाकिस्तान की सैन्य खुफिया एजेंसी आईएसआई ने तालिबान को प्रशिक्षण और शरण दी थी और काबुल कब्जाने में मदद की थी। यह जरूर है कि अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद जिन्ना के देश की सेना ने वहां सरकार के गठन में दखल रखा था लेकिन जब यह दखल हद से बाहर होने लगा तो तालिबान ने पाकिस्तानी सेना और नेताओं को उसकी हद ‘समझा’ दी। जिन्ना के देश ने भी फिर उसे खुलेआम समर्थन देना बंद कर दिया, लेकिन उनके साथ संपर्क बनाए रखा।
पाकिस्तान की रणनीति यह रही है कि अफगानिस्तान में एक ऐसा शासन हो जो भारत के प्रभाव में न जाए। लेकिन अमेरिका क्यों नहीं चाहता तालिबान-पाकिस्तान संबंध मजबूत हों? अमेरिका की चिंता यह है कि अगर पाकिस्तान और तालिबान के बीच संबंध मजबूत होते हैं, तो अफगानिस्तान फिर से आतंकवादियों का सुरक्षित अड्डा बन सकता है। और कि अमेरिका की दक्षिण एशिया नीति कमजोर हो सकती है, खासकर भारत के साथ उसके रणनीतिक संबंधों के संदर्भ में। इससे चीन और रूस जैसे देशों का क्षेत्र में प्रभाव बढ़ने के आसार बन सकते हैं।
अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तान तालिबान पर दबाव बनाए ताकि वे अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का पालन करें। इसके लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक सहायता भी दी है, लेकिन साथ ही चेतावनी भी दी है कि तालिबान से अत्यधिक निकटता अमेरिका—पाकिस्तान संबंधों को नुकसान पहुंचा सकती है। भारत तालिबान को मान्यता नहीं देता और अफगानिस्तान में कट्टरपंथी शासन को लेकर चिंतित है।
सब जानते हैं कि चीन ने पाकिस्तान के साथ अपने संबंध मजबूत किए हैं और सीपीईसी के माध्यम से वहां अकूत पैसा और संसाधन झोंके हैं। चीन अफगानिस्तान में भी निवेश की योजना बनाता आ रहा है। उधर अमेरिका पाकिस्तान—अफगानिस्तान के प्रभाव को संतुलित करना चाहता है, इसलिए वह पाकिस्तान को नियंत्रित करने की कोशिश करता है।
यहां यह भी ध्यान रहे कि अमेरिका और पाकिस्तान के संबंध “साझा मूल्यों” पर नहीं बल्कि “आपसी हितों” पर आधारित हैं। जब अमेरिका को पाकिस्तान की जरूरत होती है—जैसे अफगानिस्तान में सैन्य अभियानों में मदद आदि में तो वह सहयोग करता है। लेकिन जब तालिबान जैसे मुद्दों पर मतभेद होते हैं, तो संबंधों में तनाव आ जाता है। अमेरिका नहीं चाहता कि पाकिस्तान तालिबान को खुला समर्थन दे, क्योंकि इससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ सकती है और आतंकवाद के फिर से पनपने का रास्ता खुल सकता है। पाकिस्तान अपनी रणनीतिक स्थिति का लाभ उठाकर अमेरिका से सहयोग मांगता रहा है, लेकिन तालिबान के साथ उसके संबंध अमेरिका की नीति के खिलाफ जाते हैं। यही कारण है कि अमेरिका ने तालिबान नेता मुत्तकी की इस्लामाबाद यात्रा को रोका और पाकिस्तान पर दबाव बनाया है कि वह तालिबान से दूरी बनाकर चले।

















