नई दिल्ली। देश के सर्वोच्च न्यायालय में इस बात पर बहस हो रही है कि पॉक्सो कानून के तहत सहमति की आयु 18 से 16 वर्ष की जाए। केंद्र सरकार ने बदलाव से साफ इंकार किया है। लेकिन, कथित सेक्युलर इस मुद्दे को हवा दे रहे हैं। वहीं, समाज के बीच भी इस मुद्दे पर चर्चा शुरू हो गई है। नेटवर्क फॉर एक्सेस टू जस्टिस और मल्टीडिसिप्लिनरी आउटरीच फाउंडेशन ने संयुक्त रूप से कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में “Intrusion on Civilization: Lowering the Age of Consent – Analysing Its Impact” विषय पर विचारोत्तेजक चर्चा हुई। इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के सदस्य प्रियांक कानूनगो मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। कार्यक्रम में सेवा न्याय उत्थान फाउंडेशन सहयोगी भागीदार और शांति सुरक्षा और सद्भाव ट्रस्ट शोध भागीदार के रूप में शामिल हुआ।
प्रियांक कानूनगो ने कहा कि यह कोर्ट के बंद कमरों की चर्चा का विषय यह नहीं है, यह लोगों के बीच यह चर्चा करने का विषय है कि हमारे बच्चे 16 साल की उम्र में सेक्सुअल रिलेशनशिप स्थापित करेंगे या फिर पढ़ाई करके अपना करियर बनाएंगे। हमारे बच्चों के स्कूल शिक्षा के केंद्र रहेंगे या फिर उस आयु के बच्चे व्याभिचार की आदत डालेंगे। भारत का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ, इस सभ्यता के विकास में हजारों सालों की लोगों की मेहनत लगी। ये जो कन्सेंट की बात उठी है तो मैं यह कहना चाहूंगा कि महात्मा गांधी ने कहा था यदि कम उम्र में लड़कियां बच्चों को जन्म देंगी तो हम कमजोर पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं। यही बात ग्लोबल स्टडी और वैज्ञानिक भी कहते हैं। गांधी जी कहते हैं कि यदि नाबालिग लड़कियों की शादी हो रही है तो यह उनके लिए स्वराज्य नहीं है। हम भारत में स्वराज्य की स्थापना की लड़ाई लड़ रहे हैं और स्वराज्य की स्थापना तब तक पूरी नहीं होगी जब तक बच्चों की नाबालिग उम्र में शादी नहीं रुकेगी।

प्रियांक कानूनगो ने कहा कि यह विषय केवल सरकार का नहीं,परिवार का है, समाज को जागना होगा। चर्चा के दौरान इस बात पर भी जोर दिया गया कि स्वेच्छा से यौन संबंधों की उम्र घटाने से न केवल समाज बल्कि नाबालिगों के स्वास्थ्य पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा। चर्चा में विभिन्न राज्यों के बाल अधिकार संरक्षण आयोगों (एससीपीसीआर) के पूर्व अध्यक्ष और सदस्य, स्वरूपा चतुर्वेदी और पिंकी आनंद, स्वाति गोयल शर्मा, डॉ निवेदिता शर्मा, सर्वोच्च न्यायालय की वरिष्ठ अधिवक्ता, एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड, कार्यरत अधिवक्ता, सामाजिक कार्यकर्ता, विभिन्न गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि और अल्पसंख्यक समुदाय एवं अनुसूचित जाति के सदस्य शामिल हुए।
नाबालिगों की सुरक्षा सर्वोपरि
वक्ताओं ने भारत में सहमति की आयु कम करने के दूरगामी कानूनी, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों पर विचार-विमर्श किया, विशेष रूप से नाबालिगों के बीच रोमांटिक यौन संबंधों से जुड़े मामलों पर। विचार-विमर्श में नाबालिगों की सुरक्षा, शोषण की रोकथाम, सामाजिक मानदंडों की सुरक्षा और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण पर ऐसे परिवर्तनों के संभावित प्रभावों की जांच की गई। मंच ने बाल संरक्षण कानूनों के प्रति एक सूक्ष्म दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दिया, जो मौजूदा कानून के सुरक्षात्मक उद्देश्य को कमज़ोर किए बिना, व्यापक सामाजिक विचारों के साथ युवाओं के अधिकारों और सुरक्षा को संतुलित करे।
जारी हुई रिपोर्ट
कार्यक्रम के दौरान इस विषय पर एक व्यापक रिपोर्ट भी जारी की गई, जिसमें प्रमुख कानूनी दृष्टिकोण, शोध इनपुट और क्षेत्रीय अंतर्दृष्टि शामिल हैं। चर्चाओं में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 15, किशोरों के बीच रोमांटिक यौन संबंधों से जुड़े मामलों को संबोधित करने के लिए एक व्यवहार्य कानूनी तंत्र प्रदान करती है। यह प्रावधान किशोर न्याय बोर्ड को शोषणकारी परिस्थितियों और गैर-शोषणकारी, सहकर्मी-स्तरीय संबंधों के बीच अंतर करने के लिए प्रारंभिक मूल्यांकन करने का अधिकार देता है, जिससे नाबालिगों को दुर्व्यवहार से बचाया जा सके और साथ ही यह सुनिश्चित किया जा सके कि बच्चे के हितों की रक्षा हो।















