रक्षाबंधन आते ही एक ऐसी कहानी दोहराई जाने लगती है, जो हिन्दू स्त्रियों का और हिन्दू पर्व का सबसे बड़ा अपमान है। जो पर्व भविष्य पुराण के उत्तर पर्व के 137वें अध्याय में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर संवाद के रूप में सामने आया है। रक्षाभाव के इस सबसे बड़े पर्व को भी तुष्टीकरण की भेंट चढ़ा दिया गया। जो पर्व स्त्रियों के तपोबल का प्रतीक था, उसे महिलाओं की निर्बलता का प्रतीक बना दिया गया।
भविष्य पुराण में इसका उल्लेख आता है कि कैसे श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को समझा रहे हैं कि रक्षासूत्र का कितना महत्व होता है। जब वृत्तासुर के वध के लिए दधीचि ने अपनी अस्थियां प्रदान कर दी थीं और उनकी अस्थियों से निर्मित वज्र से जब वृत्तासुर के साथ युद्ध करने के लिए इन्द्र जा रहे थे, तो उनकी रक्षा के लिए उनकी पत्नी ने रक्षासूत्र बांधा था। वह रक्षासूत्र उन्होंने अपने तपोबल की शक्ति के साथ बांधा था।
जबकि विमर्श क्या बनाया गया और अभी तक बनाया जाता है कि बहनें अपने भाई को राखी इसलिए बांधती हैं, कि जिससे वह उनकी रक्षा करें अर्थात यह प्रमाणित करने का प्रयास किया जाता है कि महिलाएं निर्बल हैं और वे अपनी रक्षा का भार भाइयों पर डालती हैं। जबकि भविष्य पुराण के अनुसार रक्षासूत्र इसलिए बांधा जाता है, जिससे वह रक्षासूत्र उसकी रक्षा करे, जिसकी कलाई पर बांधा जा रहा है।
जो कलाई पर रक्षासूत्र बांधता है, वह अपने तमाम तपोबल के साथ उस रक्षासूत्र को बांधता है। जब वृत्तासुर की मृत्यु के बाद दैत्यराज बलि गुरु शुक्राचार्य के पास गए और उन्हें बताया कि कैसे देवता विजयी हुए तो शुक्राचार्य ने कहा कि उन्हें विषाद नहीं करना चाहिए। इस समय वर्ष भर के लिए तुम देवराज इन्द्र के साथ संधि कर लो, क्योंकि इन्द्र पत्नी शची ने इन्द्र को रक्षासूत्र बांधकर अजेय बना दिया है। उसीके प्रभाव से दानवेंद्र तुम इन्द्र से परास्त हुए हो।
अर्थात जो रक्षासूत्र बांधता है, वह इस भाव के साथ रक्षासूत्र बांधता है, उसके लिए स्वयं की रक्षा के लिए याचना का भाव नहीं अपितु जिसकी कलाई में रक्षासूत्र बांधा जा रहा है उसकी रक्षा का भाव होता है। मगर हुमायूँ और रानी कर्णावती की कहानी के माध्यम से एक तो इस पर्व की ऐतिहासिकता को मुगल काल से ही आरंभ होने तक सीमित किया गया और साथ ही यह भी प्रमाणित करने का कुप्रयास किया गया कि हिन्दू धर्म में महिलाएं (बहनें) दरअसल अपने भाइयों पर बोझ होती हैं और वे अपनी निर्बलता के लिए भाई को राखी बांधती हैं कि वह उनकी रक्षा करें।
साल-दर-साल यह झूठ हमें विभिन्न माध्यमों से परोसा जाता है, जिसमें रानी कर्णावती को बदनाम करने वाली यह कहानी भी सम्मिलित है।
क्या है यह कहानी और क्या है सच?
हिंदुओं पर आक्रमण करने वाला बाबर केवल भारत पर चार वर्ष के लगभग ही रुक सका था और पानीपत के प्रथम युद्ध के चौथे वर्ष 1530 में उसकी मौत हो गई थी। उसकी मौत के बाद जहां दिल्ली की गद्दी पर हुमायूँ बैठा तो वहीं गुजरात में बहादुर शाह का शासन था। उस समय चित्तौड़ में राणा सांगा के बेटे विक्रमादित्य को सिंहासन पर बैठाकर रानी कर्णावती शासन कर रही थी। बहादुरशाह और हुमायूँ दोनों की ही नजर चित्तौड़ पर थी। बहादुर शाह, राणा सांगा और राणा रतन सिंह के रहते चित्तौड़ पर देखने की हिम्मत नहीं कर सका था। मगर विक्रमादित्य के शासन के प्रति उसे आशा थी कि वह चित्तौड़ जीत लेगा। उसने चित्तौड़ पर हमला करने का विचार किया और आगे बढ़ा।
ऐसा कहा जाता है कि राणा सांगा की पत्नी रानी कर्णावती ने बहादुर शाह के हमले से रक्षा के लिए हुमायूँ को पत्र भेजा था। परंतु हिस्ट्री ऑफ मेडिवल इंडिया (पृष्ठ 213) में इतिहासकार सतीश चंद्र लिखते हैं कि “कुछ ऐतिहासिक किवदंतियों के अनुसार राणा सांगा की विधवा रानी कर्णावती ने हुमायूँ की मदद की चाह में हुमायूँ को राखी भेजी थी, और हुमायूँ ने उसका उत्तर भी दिया था। परंतु किसी भी समकालीन इतिहासकार ने इस कहानी का उल्लेख नहीं किया है, और यह सच भी नहीं हो सकता है।“
एसके बनर्जी की हुमायूँ बादशाह पर एक पुस्तक है, जिसमें यह विस्तार से लिखा है कि रानी कर्णावती की सहायता के लिए हुमायूँ नहीं आया था और राखी तो रानी ने भेजी ही नहीं थी। वे इस पुस्तक के पृष्ठ 87 पर लिखते हैं कि रानी कर्णावती ने हुमायूँ से सहायता के लिए अपील की थी, मगर इसके अतिरिक्त कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आई थी, कि हुमायूँ ग्वालियर तक आ गया था और वह दो महीने तक वहाँ टिका रहा था। यह चित्तौड़ की पहली घेराबंदी की बात थी। इसमें रानी को बहादुरशाह के साथ एक अपमानजनक संधि करनी पड़ी थी। यह संधि 24 मार्च 1533 को हुई थी।
उसके बाद वर्ष 1535 में बहादुरशाह ने फिर से चित्तौड़ पर हमला कर दिया। कर्णावती ने राजपूत राजाओं से सहायता मांगी और सभी राजपूत सहायता के लिए एक साथ आए। मगर इस बार जब रानी ने देखा कि विजय की आशा नहीं है तो राजपूत पुरुषों ने साका और रानियों ने जौहर कर लिया। यह जौहर 8 मार्च 1535 को हुआ था।
इसी पुस्तक में हुमायूँ और बहादुरशाह का पत्राचार भी सम्मिलित है। इस लंबे पत्राचार में चित्तौड़ को लेकर भी बात है और एक और महत्वपूर्ण तथ्य पृष्ठ 108 पर अंकित है। जिसमें बहादुरशाह के चौथे पत्र के हवाले से लिखा गया है कि “चूंकि हम ईमान और इंसाफ लाने वाले हैं, तो पैगंबर के अल्फ़ाज़ों में ‘अपने भाई की मदद करो, फिर चाहे वह जुल्मी हो या जुल्म सहने वाला!।“ हालांकि यह कहा और किसी संदर्भ में गया है। परंतु यह हो उसी दौरान रहा था।
जब 1534 में हुमायूँ कालपी पहुंचा था तो वहाँ का शासक आलम खान, मुगलों के प्रति आत्मसमर्पण करने के स्थान पर बहादुरशाह के पास चला गया था। बहादुरशाह और हुमायूँ दोनों को ही एक दूसरे से खतरा था। हुमायूँ के लिए बहादुरशाह और बहादुरशाह के लिए
हुमायूँ सबसे बड़ी चुनौती थे। ये सारे पत्राचार चित्तौड़ के युद्ध से पहले के हैं। जिनमें चित्तौड़ का भी उल्लेख है। एक पत्र में बहादुरशाह ने हुमायूँ से कहा था कि वह चित्तौड़ शहर का दुश्मन है, और वह काफिरों को अपनी ताकत से नष्ट करने जा रहा है, जो भी रास्ते में आएगा, वह उसे मिटा देगा।
इसके आगे एसके बनर्जी पृष्ठ 111 पर लिखते हैं कि मिरात-ए-सिकंदरी ने तजकिराह-ए-बुखारा में एक और बात कही है। यह हुमायूँ ने कहा था।

इसका अर्थ है
“मेरे दिल का दर्द अब यह सोच कर खून में बदल गया है, कि हमारे एक होने के बावजूद हम दो है।
मैने कभी भी आपको रोते हुए याद नहीं किया है, मैने कभी सोचा नहीं था कि मैं इतना रोऊँगा,”
यह पत्राचार बहुत बड़ा है, परन्तु चित्तौड़ के साथ ही यह पत्राचार समाप्त होता है। चित्तौड़ एक हिन्दू राज्य था, जिसे पराजित करना जितना जरूरी बहादुरशाह के लिए था, उतना ही जरूरी हुमायूँ के लिए था, क्योंकि काफिरों के राज्य पर हमला करना और नेस्तनाबूत करना ही उनके मजहब की सेवा थी और उस सेवा में कोई मुस्लिम कैसे दीवार बन सकता था।बनर्जी इसी पुस्तक में लिखते हैं कि मुस्लिम शासकों की नीति हिन्दू राजाओं और मुस्लिम राजाओं के प्रति अलग थी। मुस्लिम राजा को एक ‘काफिर’ राज्य के साथ स्थाई संधि बनाए रखने की अनुमति नहीं थी। यही कारण था कि वर्ष 1533 में राणा के साथ संधि के बाद भी बहादुर शाह के पास एक काफिर राज्य को अपने नियंत्रण में लेने के अतिरिक्त चित्तौड़ को नष्ट करने का कोई और कारण था ही नहीं।
सारंगपुर में एक महीने तक रहा हुमायूँ
इसी पुस्तक के अगले अध्याय (पृष्ठ 118) में लिखा है कि हुमायूँ और बहादुरशाह के बीच जब पत्राचार समाप्त हुआ, तब तक हुमायूँ सारंगपुर पहुँच गया था और वहाँ पर वह एक महीने से अधिक रहा। हुमायूँ जब पूर्वी मालवा की ओर बढ़ रहा था तो बहादुरशाह को चिंता हुई कि वह उस पर हमला न कर दे। मगर उसके वजीर सदर खान को उस मुस्लिम रिवाज पर यकीन था कि एक काफिर की मदद में कभी भी एक मुस्लिम शासक दूसरे मुस्लिम शासक पर हमला नहीं करेगा और फिर उसने बहादुरशाह को यकीन दिलाया कि हुमायूँ उस पर तब हमला नहीं करेगा जब वह गैर-मुस्लिम के साथ युद्ध कर रहा है। और वही हुआ।

जौहर पूरी तरह सच, हुमायूं का न आना भी सच, परंतु…
चित्तौड़ में रानी कर्णावती ने हजारों रानियों के साथ जौहर कर लिया था। जौहर पूरी तरह से सच है, हुमायूँ का न आना सच है, मगर वह कहानी सच नहीं है कि हुमायूँ जब तक आया तब तक रानी ने जौहर कर लिया था और राखी का मान रखते हुए हुमायूँ ने बहादुरशाह पर हमला किया। हुमायूँ ने बहादुरशाह पर इसलिए बाद में हमला किया था, क्योंकि बहादुरशाह तब तक थक चुका था और जब तक बहादुरशाह चित्तौड़ पर हमले में व्यस्त था, तब तक हुमायूँ को अपनी ताकत बढ़ाने का मौका मिल गया था।

















