रामचरितमानस का स्वर्णमृग प्रसंग, केवल लीला नहीं, चेतावनी है!
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रामचरितमानस का स्वर्णमृग प्रसंग, केवल लीला नहीं, चेतावनी है!

रामचरितमानस का स्वर्णमृग प्रसंग केवल लीला नहीं, बल्कि कलियुग में बहन-बेटियों को मोह, आकर्षण और बहुरूपियों के जाल से सावधान करने का गहरा संदेश है। जानिए इस प्रसंग का आध्यात्मिक रहस्य और समकालीन सन्दर्भ।

Written byरमेश शर्मारमेश शर्मा
Aug 7, 2025, 09:56 pm IST
in भारत, धर्म-संस्कृति
स्वर्णमृग प्रसंग में सीता और राम का आधुनिक चेतावनी संदेश

स्वर्णमृग प्रसंग में माता सीता और प्रभु राम का आधुनिक चेतावनी संदेश

रामचरित मानस में वर्णित स्वर्णमृग प्रसंग कोई लीला नहीं है। बल्कि इस प्रसंग में रामजी और माता सीता ने कलियुग की उन बहन बेटियों को बहुरूपियों से सावधान किया है जो अपना नाम और पहचान बदलकर मोहक जाल फेकते हैं और जब लड़कियाँ मोहित हो जातीं हैं तब उन पर विवाह और मतान्तरण का वैसा ही दबाव बनाते हैं ऐसा रावण ने लंका ले जाकर माता सीता पर बनाया था।

पुराण कथाएँ केवल सुनने के लिए नहीं होतीं

भारत की पुराण कथाएँ केवल सुनने, सुनाने और कीर्तन करने भर केलिये नहीं होती। इनमें जीवन को उन्नत बनाने और संभावित आपदाओं से बचने का संदेश होता है। वह अवतार कथा हो अथवा किसी ऋषि मनीषी की दृष्टि का सैद्धांतिक वर्णन। सबमें भविष्य की दीवार पर उभरने वाली घटनाओं और उसके परिणामों का पूर्वाभास होता है। ताकि समाज सचेत रहे। रामचरितमानस और महाभारत के लगभग सभी कथानक ऐसे हैं जिनमें वर्तमान समय में घट रही घटनाओं की मानों भविष्यवाणी की गई है।

रामायण की कथाओं में छिपे आधुनिक संकेत

यह दोनों ग्रंथ ऐसे है, जिनमें सभ्य समाज और सत्पुरुषों के सामने आने वाली समस्याओं और दुष्टों के कुचक्र का चित्रण है। प्रत्येक प्रसंग में समाज जीवन को उन्नत बनाने के सूत्र हैं। रामचरितमानस में ऐसा ही एक प्रसंग स्वर्णमृग के आने, माता सीता के मोहित होने और वेष बदलकर रावण द्वारा माता सीता के हरण का है। यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण में भी है और रामचरितमानस में भी। हाँ प्रस्तुतीकरण में थोड़ा अंतर तो है लेकिन मूल कथानक बिल्कुल एकसा है।

राम और सीता की चेतावनी : आकर्षण के जाल से सावधान

लगता है रामजी और माता सीता ने वर्तमान समय में घटने वाली घटनाओं को देख लिया था। और मोह अथवा आकर्षण के अतिरेक की लीला करके बहन बेटियों को सावधान किया है कि यदि आसक्ति के अतिरेक में विवेक शून्य हो गया तो बहुत बड़ी मुसीबत आ सकती है, अस्तित्व पर भी प्रश्नचिन्ह लग सकता है।

स्वर्णमृग प्रसंग : मुसीबत का संकेत

माता सीता जीवन में स्वर्णमृग आता है। वे स्वर्णमृग पर मोहित हो जातीं हैं। और उनके जीवन पर मानों मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ता है। इस प्रसंग के यथार्थ और संदेश दोनों को समझने की आवश्यकता है।

अरण्यकाण्ड में स्वर्णमृग लीला

यह लीला प्रसंग रामचरित मानस के अरण्यकाण्ड में है। जिसमें राक्षसराज रावण और मारीच भी अपनी अपनी भूमिका में है। कथा के अनुसार शूर्पणखा राक्षसराज रावण को माता सीता के रूप सौन्दर्य का वर्णन करती है और रावण उनके अपहरण की योजना बनाता है। इसके लिये वह मारीच का सहयोग लेता है। मारीच “स्वर्णमृग” का रूप बनाकर सीताजी के सामने आकर कुछ ऐसी उछलकूद करता है जिसे देखकर माता सीता मोहित हो जातीं हैं।

स्वर्णमृग की लीला और सीताहरण

वे रामजी से स्वर्णमृग की छाल प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त करतीं हैं। रामजी उस मायावी स्वर्णमृग के पीछे दौड़ते हैं। स्वर्णमृग अपनी योजनानुसार रामजी और लक्ष्मणजी दोनों को सीताजी से दूर कर ले जाता है। तब रावण वेष बदलकर वहाँ पहुँचता है। पहले कयी प्रकार की बातें करता है फिर माता सीता का अपहरण करके लंका ले जाता है। लंका लाकर उनपर विवाह करने का दबाव बनाता है।

अशोक वाटिका में रावण का प्रलोभन

दबाव बनाने का वर्णन सुन्दर काँड में है। रावण मंदोदरी के साथ अशोक वाटिका में आता है। विवाह प्रस्ताव रखकर कयी प्रकार के प्रलोभन देता है, जब सीताजी नहीं मानती तो धमकी भी देता है।

सीताहरण प्रसंग का आध्यात्मिक रहस्य

आज की परिस्थिति में इस लीला का संदेश समझने से पहले इस प्रसंग का रहस्य जानें। सीताहरण के इस कथानक में लक्ष्मण, रावण और मारीच की अपनी अपनी भूमिकाएँ हैं। हम सब जानते हैं कि भगवान नारायण केलिये दुष्टों का संहार करना कोई कठिन काम नहीं हैं। उनकी भृकुटि चढ़ जाने से ही प्रलय हो सकती है। नारायण का सुदर्शन उनकी इच्छा की गति से शत्रुनाश कर सकता है।

नारायण की लीला का उद्देश्य

भगवान नारायण जहाँ भी हैं, वहीं से दुष्टों का नाश कर सकते हैं फिर वे धरती पर आते हैं। सामान्य मनुष्य की भाँति जीवन जीते हैं। उनके आसपास शोक, संताप, प्रसन्नता, दुःख, सुख आदि सब प्रकार की घटनाएँ घटतीं हैं और वे उनके अनुरूप अपने भाव भी प्रकट करते हैं। यह केवल इसलिये कि मनुष्य सीख सके और यह समझ सके कि किस परिस्थिति का सामना कैसे करना है।

जय और विजय की भूमिका : रावण और कुंभकर्ण

अवतारों का संघर्ष जिन दुष्टों से होता है, वे भी कोई साधारण नहीं होते। वे सब भी नारायण से ही संबंधित होते हैं। जैसे रामायण काल में रावण-कुंभकर्ण। ये दोनों कोई और नहीं, नारायण के पार्षद जय और विजय हैं। ये जय और विजय दोनों जन्म-मृत्यु निद्रा-आहार से परे हैं।

प्रकृति की भूमिका में दुष्ट प्रवृत्तियाँ

यदि नारायण रामजी का रूप लेकर संसार को मर्यादित जीवन सिखाने समझाने धरती पर आये तो जय विजय भी रामजी की लीला में सहयोग करने केलिये रावण और कुंभकर्ण के रूप में धरती पर आये। प्रकृति ने उन्हें दुष्टता की भूमिका निभाने का दायित्व सौंपा था। ताकि मनुष्य को दुष्टों का आचरण, उनकी प्रवृत्ति को पहचान सके। प्रगति केलिये जितना महत्वपूर्ण व्यक्ति का पुरुषार्थ और परिश्रम होता है उतना ही महत्वपूर्ण दुष्टों को पहचान कर उनसे सावधान रहना भी है।

रामचरितमानस में स्वर्णमृग प्रसंग का यथार्थ

स्वर्णमृग प्रसंग केवल एक लीला है इसके रहस्य को बाबा तुलसी ने स्वयं रामचरित मानस में स्पष्ट किया है। आगे घटने वाला है, यह रामजी और माता सीता दोनों जानते थे। स्वर्णमृग आने से पहले रामजी और माता सीता के बीच एक मंत्रणा होती है। इस मंत्रणा का आभास लक्ष्मणजी को भी नहीं हो पाया। बाबा तुलसी ने लिखते हैं: **लछमनहुँ यह भेद न जाना, जो कछु रचित रचा भगवाना।**

रावण के मनोभाव और मारीच की भूमिका

अर्थात आने वाले समय का घटनाक्रम दोनों जानते थे और अपनी भूमिका निश्चित करके माता सीता ने अग्नि में प्रवेश कर लिया। बाबा तुलसी ने रावण के मनोभावों का संकेत भी दिया है। रावण के मनोभाव माता सीता के अपहरण की योजना बनाते समय भी मिले और अपहरण के समय भी। शूर्पणखा से सारा विवरण सुनने के बाद रावण सोचता है: **सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा।। तौ मैं जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ।।**

मारीच की रामभक्ति

इस चौपाई में बहुत स्पष्ट है कि रावण समझ गया था कि प्रभु का अवतार हो चुका है तब उसने भव सागर से मुक्ति केलिये बैर करने का रास्ता अपनाया। उसने मारीच को अपनी योजना में सहभागी बनाया। मारीच के मन में रामजी के दर्शन की उमंग थी: **अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा।। मन अति हरष जनाव न तेहि। आज देखऊँ परम स्नेही।।**

रावण द्वारा सीता का अपहरण और चरण वंदना

जब रावण माता सीता का अपहरण करता है तब अपहरण से पूर्व उनके चरणों को प्रणाम करता है। **मन महुँ चरन बंदि सुख माना।** अर्थात रावण ने माता सीता के चरणों को प्रणाम करके सुख माना। फिर रथ पर बिठाया। यदि रावण अपहरण के पूर्व मन ही मन माता सीता के चरणों को प्रणाम करता है तो यह स्पष्ट है कि वह अपनी स्वामिनी को जानता है। और प्रकृति के निर्धारण के अनुरूप रावण ने अपनी भूमिका का यथेष्ट निर्वाहन किया।

लंका में सीता को प्रलोभन और धमकी

माता सीता का हरण करके रावण लंका आया। उन्हें अशोक वाटिका में रखा। अशोक वाटिका में रावण ने माता सीता के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। पहले अनेक प्रकार के प्रलोभन दिये। फिर धमकाया भी। जान से मारने की धमकी भी दी।

प्रसंग का जन सामान्य को संदेश

अब प्रश्न उठता है कि जब रामजी और माता सीता सब जानते थे, रावण को भी अवतार का अनुमान हो गया , अपहरण के पहले माता सीता के चरणों को प्रणाम करता हो तो फिर लीला क्यों की ? इस प्रश्न का समाधान लीला के घटनाक्रम में ही स्पष्ट है। इस प्रसंग में स्वर्णमृग अपना मोहक रूप दिखाता है, सीताजी मोहित हो जाती हैं, रावण वेष बदलकर आता है अपहरण करके विवाह के लिये पहले प्रलोभन देता है फिर धमकी भी देता है।

समकालीन घटनाओं से साम्यता

इस प्रसंग के घटनाक्रम को वर्तमान समय में घट रहीं घटनाओं से मिलान करके देखें। आज ऐसी घटनाओं की मानों बाढ़ आ गई है। पहले लड़के अपना नाम और पहचान बदलकर लड़कियों से संपर्क बनाते हैं। अपने बनावटी व्यवहार और मीठी बातों से प्रभावित कर लेते हैं। लड़कियाँ इन छद्मवेषी चेहरों से इतनी सम्मोहित हो जाती हैं कि उन्हें अपने घर परिवार की परवाह भी नहीं करतीं। उनका विवेक शून्य हो जाता है। वे उस बहरूपिये की मीठी बातों में आकर घर से चल देतीं हैं । लड़कियों को पूरी तरह अपने जाल में फँसाकर ये बहुरूपिये मतान्तरण का दबाव बनाते हैं और अनेक प्रकार की धमकी देते हैं। कुछ लड़कियाँ लुट पिट कर पुलिस से संपर्क कर लेतीं हैं अनेक समर्पण करके अपनी संस्कृति, परंपरा से दूर होकर खो जातीं हैं।

रावण और आसुरी शक्तियों की पहचान

रावण आसुरी शक्तियों का प्रतीक है। आसुरी शक्तियों की एक पहचान होती है। वे माँस भक्षी होते हैं, हिंसक होती हैं, गाय की हत्या करना, उनका स्वभाव होता है। वे यज्ञ हवन पूजन पाठ के विरोधी होते हैं। देव लोक से लेकर धरती तक सबको अपने ही मत में ढालना चाहते हैं। असुर देवों और मनुष्यों की भूमि ही नहीं पूरे देश हड़पना चाहते हैं। रावण को ही देखिये। लंका रावण की नहीं थी। रावण ने कुबेर से छीनी थी और अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया था। सभी लंका निवासियों को असुर संस्कृति में रूपांतरित कर लिया था। रामजी ने अपने पुरुषार्थ, पराक्रम, रणकौशल और एक अच्छी टीम बनाकर लंका को रावण से मुक्त कराई थी।

लीला का उद्देश्य : कलियुग की चेतावनी

रामजी और माता सीता जानते थे कि कलियुग में क्या घटने वाला है। नाम रूप बदलकर कैसे षड्यंत्र होंगे। यदि सावधानी नहीं वरती तो भोली भाली लड़कियों का जीवन नर्क बन जायेगा। इसीलिए उन्होंने सतर्क किया। जिस प्रकार माँ अपने नन्हें शिशु को तोतली आवाज में बोलना सिखाती है वैसे इस लीला के माध्यम से समाज को समझाया गया है कि जो आकर्षण दिख रहा है, उसे देखकर एकदम मोहित न हो जायें, जो शब्द सुनाई दे रहे हैं उन्हें सुनकर एकदम आकर्षित न हो जायें। भावनाओं के अतिरेक में विवेक शून्य न हो जायें। दृश्य और शब्द दोनों का विश्लेषण करें फि आगे बढ़ें। मीठी भाषा बोलने वाला और शिष्ट व्यवहार करने वाला हर व्यक्ति भला नहीं होता।

कलियुग में निशाचरी माया अपेक्षाकृत अधिक व्याप्ति है। निशाचरों की माया जानी नहीं जा सकती। इसलिये रामचरितमानस के इस प्रसंग में रामजी और माता सीता ने लीला करके बहन बेटियों को सावधान किया है। सावधानी बहुत आवश्यक है। यदि सावधानी घटी तो फिर समाचार पत्र में सुर्खी बनी

Topics: सीताहरणरामायण का सन्देशकलियुग में स्वर्णमृगबहन बेटियों की सुरक्षावाल्मीकि रामायणधर्म और समाजमतांतरणराम और सीताअध्यात्मपुराण कथाएँसनातन संस्कृतिस्वर्णमृग लीलारामचरितमानसआधुनिक सन्दर्भतुलसीदासस्त्री सुरक्षास्वर्णमृग प्रसंगहिन्दू चेतना
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