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भारत-यूके मुक्त व्यापार संधि : नए युग की साझेदारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में 24 जुलाई, 2025 को लंदन में भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौते (सीईटीए) पर हस्ताक्षर हुए। इसे यूरोप के किसी विकसित देश के साथ भारत का पहला मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) माना जा सकता है।

Written byडॉ. अश्वनी महाजनडॉ. अश्वनी महाजन
Aug 7, 2025, 02:04 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझाैते के बाद हाथ एक-दूसरे को बधाई देते प्रधानमंत्री और ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारर्मर। साथ में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल

द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझाैते के बाद हाथ एक-दूसरे को बधाई देते प्रधानमंत्री और ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारर्मर। साथ में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में 24 जुलाई, 2025 को लंदन में भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौते (सीईटीए) पर हस्ताक्षर हुए। इसे यूरोप के किसी विकसित देश के साथ भारत का पहला मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) माना जा सकता है। समझौते के तहत भारत के 99% विनिर्मित उत्पाद अब शून्य शुल्क पर यूके को निर्यात किए जा सकेंगे। इससे भारत को प्रतिस्पर्धियों (जिन पर उच्च शुल्क या कम से कम गैर-शून्य शुल्क जारी रहेंगे) की तुलना में ब्रिटिश बाजार में बढ़त मिलेगी और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।

सरकार का अनुमान है कि 2030 तक भारत-यूके व्यापार 56 अरब डॉलर से दोगुना हो सकता है। यह समझौता खासकर खेल-सामान, हस्तशिल्प और श्रम-प्रधान उद्योगों के लिए फायदेमंद होगा। केंद्रीय वाणिजरू मंत्री पीयूष गोयल ने भी अपने लेख में लिखा है कि कपड़ा, चमड़ा और फुटवियर क्षेत्रों में भारत के यूके के तीन शीर्ष आपूर्तिकर्ता बनने की संभावना है, जिससे महिला कारीगरों, शिल्पकारों और छोटे उद्यमियों को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में स्थान मिलेगा। साथ ही, रत्न-आभूषण, इंजीनियरिंग उत्पाद, रसायन और स्मार्टफोन के निर्यात में भी तेजी आने की उम्मीद है।

कृषि और ग्रामीण लाभ

वाणिज्य मंत्री के अनुसार, समझौते के तहत 95 प्रतिशत कृषि उत्पादों पर शुल्क समाप्त कर दिया गया है, जिससे अगले तीन वर्ष में कृषि निर्यात में 20 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है। साथ ही, डेयरी, सेब और खाद्य तेलों पर टैरिफ में कोई छूट न देने से किसानों और घरेलू बाजार की सुरक्षा सुनिश्चित होगी। समुद्री उत्पादों पर टैरिफ 20 प्रतिशत था, जिसे शून्य कर दिया गया है। इससे मछुआरों को बड़ा लाभ होगा। आईटी और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में भारतीय पेशेवरों को ब्रिटेन में अवसर मिलेंगे। भारत ने संविदा सेवा प्रदाताओं, व्यावसायिक यात्रियों, योग प्रशिक्षकों, संगीतकारों और रसोइयों सहित कुशल पेशेवरों के लिए अनुकूल आवागमन सुनिश्चित किए हैं।

डॉ. अश्वनी महाजन
राष्ट्रीय सह संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच

यहां समझना होगा कि वर्तमान सीईटीए से 45 प्रतिशत विनिर्माण निर्यात (6.5 अरब डॉलर) को अधिक लाभ हुआ है, क्योंकि समझौते से पहले ही 8.0 अरब डॉलर के निर्यात को शून्य शुल्क पहुंच प्राप्त थी। इनमें पेट्रोलियम, दवाइयां, हीरे और विमान के पुर्जे शामिल हैं। वर्तमान में ब्रिटेन के 8.6 अरब डॉलर के निर्यात पर भारत द्वारा मध्यम से उच्च शुल्क लागू है। भारत इनमें से 90 प्रतिशत वस्तुओं पर शुल्क हटाने पर सहमत हो गया है। सैल्मन, भेड़ का मांस, विमान के पुर्जे, मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक्स (कुल का 65 प्रतिशत) जैसे उत्पादों को शून्य शुल्क से तत्काल राहत मिलेगी, जबकि अन्य 26 प्रतिशत उत्पादों पर अगले 10 वर्ष में चरणबद्ध तरीके से शुल्क घटाए जाएंगे। इनमें चॉकलेट, शीतल पेय, सौंदर्य प्रसाधन और ऑटो पार्ट्स शामिल हैं।

सरकारी खरीद में ऐतिहासिक प्रगति

पहली बार भारत ने किसी विकसित देश को अपनी सरकारी खरीद प्रणाली में इस स्तर तक शामिल किया है। इससे पहले संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ इस बाबत सीमित अनुमति का समझौता हुआ था। लगभग 40,000 उच्च मूल्य के केंद्रीय अनुबंध अब ब्रिटिश कंपनियों के लिए खुले होंगे। इनमें  परिवहन, हरित ऊर्जा और बुनियादी ढांचा शामिल है। ये कंपनियां भारत के ‘जेम’ पोर्टल पर बोली लगा सकेंगी और राष्ट्रीय दर्जा प्राप्त करेंगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल 20 प्रतिशत घरेलू सामग्री वाले ब्रिटिश मूल के सामान सार्वजनिक खरीद आदेश के तहत द्वितीय श्रेणी के स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के रूप में वर्गीकृत किए जाएंगे। यह श्रेणी पहले 20-50 प्रतिशत स्थानीय सामग्री वाली भारतीय कंपनियों के लिए आरक्षित थी। हालांकि, स्वास्थ्य, कृषि, एमएसएमई और छोटे अनुबंधों को इससे बाहर रखा गया है। भारतीय कंपनियों को भी ब्रिटेन में सरकारी खरीद में भागीदारी का अवसर मिलेगा, यद्यपि उन्हें ब्रिटिश नियामकीय बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।

सेवा क्षेत्र की सीमाएं और संभावनाएं

भारत ने दूरसंचार, वित्तीय सेवा, लेखा और पर्यावरण सेवाएं ब्रिटिश कंपनियों के लिए खोली हैं। वकालत को छोड़कर लेखा जैसी सेवाओं में उनकी योग्यताओं को मान्यता दी जाएगी, लेकिन लेकिन सेवाओं के क्षेत्र में ब्रिटिश प्रस्ताव कहीं अधिक सीमित हैं। ब्रिटेन ने आईटी और परामर्श में भारतीय निवेश की अनुमति तो दी है, पर पेशेवरों के लिए वीजा प्रक्रियाएं अब भी जटिल बनी हुई हैं। यह भारत के एफटीए के बावजूद कई आसियान देशों द्वारा लगाए गए वीजा प्रतिबंधों की याद दिलाता है। भारत ने आसियान देशों के साथ जब यह समझौता किया था तो कई आसियान देशों ने वीसा नियमों को और कड़ा कर दिया था। योग शिक्षकों और शास्त्रीय संगीतकारों जैसी विशिष्ट भूमिकाओं के लिए 1800 वीजा जरूर दिए गए हैं, लेकिन यूके ने अध्ययन के बाद कार्य वीजा को बहाल नहीं किया है और सख्त अंक आधारित आव्रजन नियमों को बरकरार रखा है। 75,000 से अधिक भारतीय कामगारों के लिए एक लाभ यह है कि अब उन्हें ब्रिटेन में सामाजिक सुरक्षा के लिए भुगतान नहीं करना पड़ेगा, बशर्ते उन्हें भारत में भुगतान किया जाए।

इस खबर को भी पढ़ें-

टैरिफ की चुनाैती, मांगे नई रणनीति

दृष्टिकोण में बदलाव और आत्मविश्वास

अभी तक भारत सरकारी खरीद को खोलने के मामले में सुरक्षात्मक रहा है। एकमात्र एफटीए जहां भारत ने सरकारी खरीद तक सीमित पहुंच दी थी, वह यूएई था, जहां कोई बड़ा खतरा नहीं था। लेकिन उस समय कई हलकों में आशंका जताई गई थी कि यह भविष्य के समझौतों के लिए उदाहरण न बन जाए। वर्तमान बदलाव भारत के वैश्विक आत्मविश्वास को दर्शाता है। ब्रिटेन के साथ हुए समझौते के बाद भविष्य में यूरोपीय संघ और अमेरिका जैसे देशों के साथ एफटीए में और भी व्यापक रियायतें संभव हो सकती हैं। घरेलू उद्योग की सुरक्षा के लिए वैश्विक स्तर पर औद्योगिक नीति में सरकारी खरीद एक प्रमुख साधन रहा है, जिसे इस मुक्त व्यापार समझौते में छोड़ा गया है। व्यापार समझौतों में पारस्परिक लाभ की अपेक्षा स्वाभाविक होती है। ब्रिटेन ने भारत को निर्यात और बाजार पहुंच में कई रियायतें दी हैं और बदले में भारत ने भी शुल्क व नियमों में ढील दी है। भारत को सेवा क्षेत्र में भी कुछ लाभ जरूर मिलेंगे। लेकिन इसके बदले में भारत के द्वारा दी गई रियायतों का क्या असर होगा, यह आने वाले समय में पता लगेगा।

यह समझौता न केवल ब्रेक्जिट के बाद ब्रिटेन के लिए नए बाजारों में प्रवेश का द्वार है, बल्कि यह भारत के बढ़ते वैश्विक आत्मविश्वास और व्यापारिक समझ की पुष्टि भी करता है। भारत अब विकसित देशों के साथ भी समानता के आधार पर व्यापारिक समझौते करने को तैयार है। यह एक नई आर्थिक दृष्टि की शुरुआत है।

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