Malegaon Blast case : महाराष्ट्र के मालेगांव बम ब्लास्ट मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत सभी सात आरोपियों को NIA की स्पेशल कोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया है। लेकिन एक सवाल अब भी ज़िंदा है— आखिर रामजी कलसांगरा कहाँ हैं..?
कौन है रामजी कलसांगरा..?
बता दें कि रामचंद्र उर्फ रामजी कलसांगरा लापता होने से पहले इंदौर में एक इलेक्ट्रिकल कॉन्ट्रैक्टर थे। परिवार के अनुसार उन्होंने ने 1992 में अयोध्या में श्री रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के लिए कारसेवा भी की थी। इसके बाद उन पर मालेगाँव ब्लास्ट और समझौता एक्सप्रेस केस का आरोप लगाया गया था।
पत्नी लक्ष्मी कलसांगरा का छलका दर्द
रामजी कलसांगरा की पत्नी लक्ष्मी कलसांगरा पिछले 17 सालों से सुहागन की तरह जीवन बिता रही हैं। उनकी नजरें आज भी अपने घर की दरवाज़े पर ठहरी रहती है कि शायद कभी पति लौट आएँ।
वो कहती हैं कि “एजेंसियों को बताना चाहिए कि मेरे पति ज़िंदा हैं या नहीं।”
वे बताती हैं कि आए दिन एजेंसियों के अफसर जाँच के नाम पर उन्हें परेशान करते, जैसे वह अपराधी हों।
उन्होंने बताया कि तीन बेटों की परवरिश के लिए उन्हें खेतों में काम करना पड़ा और मज़दूरी तक करनी पड़ी।
बेटे देवव्रत की व्यथा
रामजी कलसांगरा के बेटे देवव्रत की आँखों में देखा जाए तो, उसकी आँखों में अब तक इंतज़ार और सवाल भरे हैं। देवव्रत याद करते हैं कि 9 अक्टूबर 2008 को आखिरी बार पिता के साथ दशहरा मनाया था, उसके बाद से वह लापता हो गए।
देवव्रत कहते हैं कि “एजेंसियों ने मेरी माँ को परेशान किया, समाज ने हमें हीन समझा।”
देवव्रत के अनुसार वर्ष 2011 में कुछ अफसर उनके घर आए और पिता की तस्वीरें और सामान ले गए।
एटीएस पर गंभीर आरोप
देवव्रत का आरोप है कि उनके पिता को एटीएस ने अवैध हिरासत में लिया था और वहीं उनके साथ कुछ अनहोनी हुई। देवव्रत स्पष्ट कहते हैं कि, एजेंसियों से मेरा निवेदन है कि “अगर मेरे पिता की मौत हो चुकी है तो हमें उनका शव सौंपा जाए और इस केस की निष्पक्ष जाँच की माँग की है।
परिवार के अन्य सदस्यों की पीड़ा
बता दें कि रामजी कलसांगरा का परिवार इस दुख से अकेला नहीं गुज़रा। देवव्रत के चाचा और रामजी कलसांगरा के भाई शिवनारायण कलसांगरा को भी एटीएस ने हिरासत में लिया था और उनकी गिरफ्तारी 15 दिन बाद दिखाई गई और उन्हें टॉर्चर किया गया। वे 2014 तक जेल में रहे और आखिरकार 2017 में एनआईए ने उन्हें बरी कर दिया।
सनसनीखेज़ खुलासा : मुजावर का हलफनामा
इस बीच एक सनसनीखेज़ खुलासा हुआ। मालेगाँव केस की जाँच टीम में रहे और बाद में सस्पेंड किए गए अधिकारी महबूब मुजावर ने हलफनामा देकर दावा किया कि रामजी कलसांगरा और उनके साथी संदीप डांगे को 2008 में कस्टडी में ही मार दिया गया था।
मुजावर ने कहा कि दोनों के शवों को मुंबई 26/11 हमले के “अज्ञात पीड़ितों” के तौर पर पेश किया गया था। उनका आरोप था कि मारे जाने से पहले दोनों को कालाचौकी एटीएस ऑफिस में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया।
17 साल बाद भी अधूरी कहानी
रामजी कलसांगरा को गायब हुए सत्रह साल बीत गए। अदालत ने बाकी आरोपियों को बरी कर दिया। तथाकथित “हिंदू आतंकवाद” की थ्योरी ढह गई। लेकिन कलसांगरा का परिवार आज भी उसी मोड़ पर खड़ा है— इंतज़ार और अनिश्चितता में। सवाल यह है कि क्या सच कहीं सरकारी फाइलों में दबा पड़ा है या फिर उसे हमेशा के लिए गुमनाम मौत बना दिया गया है।
















