भारत की संसद के उच्च सदन राज्यसभा में उस वक्त नीम खामोशी छा गई जब भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ की साजिश को तार तार किया। उन्होंने बताया कि इस पूरे षड्यंत्र में ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ का जो नक्शा सामने रखा गया है उसमें भारत के अनेक हिस्से शामिल दिखाए गए हैं। बांग्लादेश को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा गया कि यह मुद्दा पूरी गंभीरता से देखा जा रहा है। इस विवाद के पीछे बांग्लादेश का एक अल्पज्ञात इस्लामवादी गुट है जिसका नाम है “सल्तनत-ए-बांग्ला”। इसके द्वारा बनाया यह नक्शा ढाका विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम के दौरान प्रदर्शित किया गया था। इस साजिश को तुर्किए के एक एनजीओ ‘टर्किश यूथ फेडरेशन’ का समर्थन प्राप्त है।
कल सदन में उठे इस विषय पर जयशंकर ने बताया गया कि पता चला है इस विवादास्पद नक्शे में भारत के अनेक राज्यों के हिस्सों को शामिल किया गया है। जैसे नक्शे में पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार, ओडिशा, असम, त्रिपुरा व अन्य पूर्वोत्तर राज्यों के क्षेत्रों को बांग्लादेश का दिखाया गया है जो सच में चिंता की बात है। इसके अलावा म्यांमार का अराकान क्षेत्र को भी नक्शे में ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ में शामिल दिखाया गया है।
विदेश मंत्री जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत सरकार रिपोर्टों से अवगत है और स्थिति पर कड़ी नज़र रख रही है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि बांग्लादेशी सरकार समर्थित फैक्ट चैक प्लेटफार्म ‘बांग्लाफैक्ट’ को ऐसे किसी समूह के अस्तित्व का कोई सबूत नहीं मिला है। इसके बाद जयशंकर का कहना था कि विवादित नक्शा संभवतः ‘बंगाल सल्तनत’ की ऐतिहासिक सीमाओं के संदर्भ में बनाया गया है।

बताया गया कि नक्शे में उस मध्यकालीन बंगाल सल्तनत की ऐतिहासिक सीमाओं को दिखाया गया है, जो 1352 से 1538 ई. तक अस्तित्व में था। ‘सल्तनत-ए-बांग्ला’ इसी विरासत को पुनर्जीवित करने का दावा करता है।
क्या है सल्तनत-ए-बांग्ला
असल में यह समूह एक कट्टरपंथी इस्लामी संगठन है, जिसका नाम अधिक सुनने में नहीं आया है। यह गुट बांग्लादेश में सक्रिय है और युवाओं को ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ की अवधारणा के समर्थन में लामबंद कर रहा है। इसके पीछे तुर्किए के एनजीओ ‘टर्किश यूथ फेडरेशन’ की वैचारिक और वित्तीय सहायता बताई जा रही है।
इस संगठन का मुख्यालय ढाका विश्वविद्यालय के शिक्षक-छात्र केंद्र में बताया गया है, जो अब इसका अस्थायी संचालन केंद्र बन चुका है। इसके उप-समूह ‘बरवाह-ए-बंगाल’ को युवाओं की भर्ती और विचारधारा के प्रचार-प्रसार का जिम्मा सौंपा गया है।
इसमें संदेह नहीं है कि भारत के लिए यह नक्शा केवल एक भौगोलिक विवाद नहीं, बल्कि एक रणनीतिक और वैचारिक चुनौती है। कारण? यह भारत की क्षेत्रीय अखंडता पर सीधा सवाल उठाता है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के, विशेष रूप से मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में, इस इस्लामवादी समूह के साथ कथित संबंधों के कयास लगाए गए हैं। यूनुस की बेटी दीना अफरोज यूनुस पर इस संगठन को फंडिंग देने का आरोप है।
इसके अतिरिक्त, विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश के बढ़ते संबंध, जैसे वीजा नियमों में ढील और समुद्री मार्ग खोलना आदि भारत की सुरक्षा चिंताओं को और गहराते हैं। ‘सल्तनत-ए-बांग्ला’ का उभरना किसी एक इस्लामी गुट का उभरना मात्र नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया में इस्लामी कट्टरपंथ के बढ़ते डैनों की ओर इशारा करता है। यह समूह जमात-ए-इस्लामी और मुस्लिम ब्रदरहुड जैसी विचारधाराओं से प्रेरित प्रतीत होता है, जो राजनीतिक सीमाओं को नकारते हुए एक इस्लामी राज्य का जहर फैलाते हैं।
यह विचारधारा न केवल बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति को प्रभावित कर रही है, बल्कि भारत के लिए भी एक गंभीर चुनौती है इसलिए भारत सरकार ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है और विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से चिंता व्यक्त की है। भारत को इस पर राजनयिक दबाव बनाकर बांग्लादेश सरकार से इस गुट की गतिविधियों पर स्पष्ट रुख सामने रखने की मांग करनी होगी।
संदेह है कि मध्यकालीन बंगाल सल्तनत के नाम पर ‘सल्तनत-ए-बांग्ला’ द्वारा प्रस्तुत नक्शा एक ऐतिहासिक मिथक को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का प्रयास कर सकता है।

















