भारत के पड़ोस में बसे जिन्ना के देश की हाल की हरकतें इस बात के पर्याप्त संकेत दे रही हैं कि वह विस्तारवादी चालाक चीन की मदद से परमाणु संयंत्र को हलचल में ला रहा है। कहूटा स्थित जिन्ना के देश के इस संयत्र में गत कुछ दिनों से बड़े पैमाने पर परमाणु ईंधन जमा किए जाने की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय, और विशेष रूप से भारत की चिंता बढ़ा दी है। सैटेलाइट तस्वीरों और विशेषज्ञों के विश्लेषणों के अनुसार, यह हलचल दिखाती है कि यह सब न्यूनतम परमाणु प्रतिरोध लायक जरूरी मात्रा से कहीं बढ़कर है। सवाल है कि भारत से हाल में आपरेशन सिंदूर में पिटे जिहादियों के पोषक जिन्ना के देश की बदनाम फौज के मन में आखिर चल क्या रहा है? पाकिस्तान की रणनीति क्या है? उसकी ऐसी हरकतों के क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव क्या होंगे? भारत की दृष्टि से यह उठापटक किस तरह का संकेत दे रही है?
कहूटा से प्राप्त ताजा सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि कहूटा रिसर्च लैबोरेटरी (KRL) में यूरेनियम संवर्धन की गतिविधियां तेज हो गई हैं। संयंत्र में नई इमारतों बनी हैं और अन्य उपकरण जमाये गये हैं, जो ईंधन संवर्धन और हथियार-ग्रेड सामग्री के उत्पादन की ओर इशारा करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की यह गतिविधि अपने लिए नए परमाणु वारहेड्स बनाने की तैयारी के रूप में देखी जा सकती है।
फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान के पास पहले से ही लगभग 170 परमाणु वारहेड्स हैं। कुछ अनुमान बताते हैं कि जिन्ना के देश के परमाणु अस्त्रों की यह संख्या इस साल यानी 2025 में 220–250 तक पहुंच सकती है। जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान ने टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन्स पर भी ध्यान केंद्रित किया हुआ है, जो सीमित युद्धों में उपयोग के लिए डिजाइन किए जाते हैं।

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ और उपप्रधानमंत्री इशाक डार जैसे नेताओं ने हाल ही में भारत को परमाणु हमले की धमकियां देने जैसे बयान भी दिए हैं। इन बयानों का उद्देश्य भारत को गीदड़भभकी देकर दबाव में लाना और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित करना हो सकता है। परमाणु अस्त्रों के संदर्भ में भारत की “नो फर्स्ट यूज” नीति के विपरीत, पाकिस्तान की रणनीति अस्पष्ट “फर्स्ट यूज़” पर आधारित दिखती है, यह बात क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ाने वाली ही है।
इसमें संदेह नहीं है कि आपरेशन सिंदर में भारत की सैन्य और तकनीकी बढ़त से सकपकाया जिन्ना का देश परमाणु हथियारों को एक रणनीतिक उपकरण मानता है। उसे संभवत: यह भी लगता होगा कि परमाणु हथियारों की मौजूदगी पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कुछ हद तक सुरक्षा कवच प्रदान कर सकती है। जिन्ना के देश की इस कवायद का एक मकसद देश में जारी आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और आतंकवाद से जनता का ध्यान हटाना भी हो सकता है।
अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के बयानों से साफ होता है कि वे पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंतित हैं, विशेषकर जब ये खबरें आ रही हों कि पाकिस्तान अमेरिका तक मार करने वाली अंतरमहाद्विपीय बैलिस्टिक मिसाइल विकसित कर रहा है। इस्राएल के रक्षा विशेषज्ञों ने भी आशंका जताई है कि पाकिस्तान के परमाणु ठिकाने जिहादी ताकतों के हाथ लग सकते हैं।
इधर भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मई 2025 में पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को आईएईए की निगरानी में लाने की मांग की है। इन सब संदर्भों में विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को अपनी परमाणु त्रयी की मजबूती बनाए रखनी होगी यानी भूमि, वायु और समुद्र से परमाणु हमले का जवाब देने की क्षमता को पुख्ता रखना होगा। इसके अलावा सैटेलाइट निगरानी, खुफिया नेटवर्क और कूटनीतिक दबाव के माध्यम से पाकिस्तान और उसके आका चीन की गतिविधियों पर सतत नजर रखनी होगी। भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की परमाणु ब्लैकमेलिंग रणनीति को उजागर करते रहना होगा।
पाकिस्तान के कहूटा में परमाणु ईंधन का जमावड़ा केवल तकनीकी गतिविधि नहीं हो सकती, यह एक रणनीतिक संकेत जरूर हो सकता है। यह कदम पाकिस्तान की परमाणु नीति में आक्रामक रुख, क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित करने की मंशा और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चुनौती देने की सोच को दर्शाता है। भारत और विश्व को इस पर संयमित लेकिन सतर्क निगाह रखनी ही होगी।

















