बिहार में कांग्रेस पार्टी एक परजीवी पार्टी बनकर रह गई है। बिहार में कांग्रेस पार्टी अन्य दलों के जनाधार पर अपनी राजनीति कर रही है। किसी भी दल के जनाधार का आकलन तब किया जाता है जब वह दल अपने बूते चुनाव लड़ती है। 2000 में बिहार के विभाजन के बाद कांग्रेस पार्टी सिर्फ एक बार 2010 में अपने बूते चुनाव लड़ी थी। इसके अलावा सभी चुनावों में कांग्रेस पार्टी राजद की पिछलग्गू बनकर ही अपनी राजनीति करती रही है। 2010 के विधानसभा चुनाव के अलावा कांग्रेस पार्टी ने 2009 का लोकसभा चुनाव भी अपने बूते ही लड़ा था। उस चुनाव में कांग्रेस पार्टी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन में लड़ी थी।
बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन
| वर्ष | विधानसभा | सीट लड़े | जीत | % जीत | गठबंधन |
|---|---|---|---|---|---|
| 2005 | 13वीं विधानसभा | 84 | 10 | 11.9% | गठबंधन |
| 2005 | 14वीं विधानसभा | 51 | 9 | 17.65% | गठबंधन |
| 2010 | 15वीं विधानसभा | 243 | 4 | 1.65% | अकेले |
| 2015 | 16वीं विधानसभा | 41 | 27 | 65.85% | गठबंधन |
| 2020 | 17वीं विधानसभा | 70 | 19 | 27.14% | गठबंधन |
कांग्रेस पार्टी का बिहार की राजनीति की ताकत का आकलन करने के लिए इन दोनों चुनावों में कांग्रेस पार्टी के प्रदर्शन पर गौर करने की जरूरत है। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने खुद 37 सीटों पर चुनाव लड़ा। एक सीट कटिहार एनसीपी को दी और एक सीट पर निर्दलीय को समर्थन दिया। 2009 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन के बावजूद भी वाल्मीकि नगर सीट पर एनसीपी और कांग्रेस पार्टी में दोस्ताना संघर्ष हुआ था और एनसीपी के उम्मीदवार दिलीप वर्मा कांग्रेस के मोहम्मद शमीम अख्तर से लगभग 12,000 मतों से आगे थे।
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2004 के लोकसभा चुनाव में जहाँ कांग्रेस पार्टी राजद, लोजपा, माकपा और एनसीपी के साथ गठबंधन में तीन सीटें जीती थी, वहीं 2009 में अपने बूते लड़कर दो सीट — सासाराम और मुस्लिम बहुल किशनगंज — में जीत दर्ज कर सकी थी।
2010 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस पार्टी ने अपने बूते सभी 243 सीटों पर लड़ा। कांग्रेस पार्टी महज 4 सीटें ही जीत सकी थी और 19 सीटों पर दूसरे पायदान पर थी। कुल मिलाकर कांग्रेस पार्टी कुल 23 सीटों पर सीधे लड़ाई में थी। आश्चर्यजनक तौर पर कांग्रेस पार्टी केवल 27 सीटों पर ही अपनी जमानत बचा सकी थी। यही कांग्रेस पार्टी की बिहार की राजनीति में असल ताकत है।
अन्य दलों की मुसीबत का फायदा उठाती कांग्रेस
कांग्रेस पार्टी को अन्य दलों की मुसीबत का पूरा फायदा उठाने में महारत हासिल है। 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने अपनी इस कला का पूरा लाभ उठाया। उस समय राजद और जेडीयू दोनों अपने राजनीतिक जीवन के सबसे मुश्किल चुनाव लड़ रहे थे और कांग्रेस ने उनकी इस दुविधा का भरपूर फायदा उठाया। कांग्रेस पार्टी ने दोनों दलों पर दबाव की राजनीति के तहत 41 विधानसभा की सीटें खुद के लिए आवंटित करवा लीं। जिस पार्टी ने अपने बूते 2010 में महज 27 सीटों पर ही अपनी जमानत बचाई, उसे 41 सीटों का आवंटन मिलना अपने आप में काफी आश्चर्यजनक था।
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कांग्रेस पार्टी ने 2020 के विधानसभा चुनाव में भी राजद पर दबाव बनाकर फिर से 70 सीटें आवंटित करवा लीं। कांग्रेस पार्टी 70 सीटों में महज 19 सीटें ही जीत सकी। राजद के कई नेताओं में यह मलाल खुलकर सामने आता है कि अगर वे कांग्रेस पार्टी को कम सीटें देते तो उनकी सरकार बन सकती थी।
2020 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के दलों का प्रदर्शन
| पार्टी | लड़ी गई सीटें | जीती गई सीटें | जीत प्रतिशत (%) |
|---|---|---|---|
| राष्ट्रीय जनता दल (राजद) | 144 | 75 | 52.08% |
| कांग्रेस | 70 | 19 | 27.14% |
| भाकपा-माले | 19 | 12 | 63.15% |
| भाकपा | 6 | 2 | 33.33% |
| माकपा | 4 | 2 | 50% |
| **कुल** | 243 | 110 | — |
आगामी विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी ने राजद पर फिर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। कांग्रेस पार्टी ने पहले कन्हैया कुमार को बिहार की राजनीति में राजद नेता तेजस्वी यादव के खिलाफ उतारने का प्रयास किया, मगर यह कदम असफल रहा। अब कांग्रेस पार्टी ऐसी स्थिति बनाना चाहती है जिसमें राजद उसे खुद से ज्यादा सीटें दे।
बिहार में लालू यादव के बिठा रहे तालमेल
मगर इस बार राजद कांग्रेस से ज्यादा ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के साथ गठबंधन के लिए लालायित है। राजद, कांग्रेस को सिर्फ मुस्लिम मतों के लिए अपने पाले में बनाए रखना चाहती है। असदुद्दीन ओवैसी के बिहार के 2020 के चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बाद अब लालू यादव और राजद ओवैसी को काफी गंभीरता से ले रहे हैं। ओवैसी ने कई मंचों पर सार्वजनिक तौर पर कहा है कि बिहार में लालू यादव के माध्यम से महागठबंधन से उनकी सीटों के तालमेल की बात चल रही है।
अंततः कांग्रेस पार्टी के बुरे प्रदर्शन और दबाव की राजनीति का असर यह भी हो सकता है कि महागठबंधन के दल कांग्रेस से दूरी बनाते दिखें।













