तीन महीने में 800,000 लोगों का जीनोसाइड। जी हां 800,000! सोचिए क्या बीती होगी, उन लोगों पर जिनके पूरे परिवार को ही खत्म कर दिया गया हो। पूरे का पूरा गांव और शहर एक झटके में तबाह कर दिया गया हो। हम बात कर रहे हैं भारत से 5,902 किलोमीटर दूर स्थित अफ्रीका के एक छोटे से देश रवांडा की, जहां 31 साल पहले वर्ष 1994 को ये जीनोसाइड हुआ। अब उसी पर एक छोटे से नाटक का मंचन हो रहा है।
इस नाटक को इसी माह जुलाई में फ्रांस में होने वाले प्रतिष्ठित एविग्नन फेस्टिवल में किन्यारवांडा भाषा में प्रदर्शित किया जाएगा। स्क्रीन पर इसका अनुवाद भी होगा।
एसोसिएटेड फ्रांस प्रेस की रिपोर्ट के हवाले से बोरोन न्यूज लिखता है कि रवांडा के एक पहाड़ी गांव न्यामाता में, बुरुंडी और रवांडा के अभिनेताओं ने बेस्ट-सेलिंग फ्रांसीसी उपन्यास “स्मॉल कंट्री” पर आधारित एक नाटक प्रस्तुत किया। इस ड्रामा के कई एक्टर्स तो खुद 1994 के उस भयावह नरसंहार से बचे हुए लोग थे। इसमें गैबी नाम के एक व्यक्ति की कहानी को बताया जाता है। जिसका बचपन बुरुंडी के गृहयुद्ध और रवांडा नरसंहार से तबाह हो जाता है। नाटक के मंचन ने उस 31 साल पुराने दर्द को फिर से हरा-भरा कर दिया, कई लोग तो फूट-फूट कर रोने लगे।
क्या हुआ था रवांडा में?
रवांडा में 1994 में तुत्सी अल्पसंख्यकों और हुतू समुदाय के बीच जातीय संघर्ष हुआ। कुछ ही वक्त में ये संघर्ष एक बड़े युद्ध में बदल गया। करीब तीन माह तक चले इस जीनोसाइड में 800,000 तुत्सियों का जीनोसाइड हुआ। इसी समय के दौरान रवांडा के पड़ोसी देश बुरुंडी में भी गृहयुद्ध छिड़ दिया। वो गृह युद्ध भी 12 साल तक चला। 12 साल में देश में 300, 000 से अधिक लोगों का नरसंहार हुआ।
आज भी है उस नरसंहार की टीस
इस फिल्म में गैबी और उसकी मां तक का किरदार निभाने वाले एक्ट्रेस मुजिरामाकेंगा ने कहा कि इस नाटक ने मुझे मेरे निर्वासन और उसके आघात को सहने की शक्ति दी है। नताशा ने कहा, “मैं भी गैबी की तरह निर्वासन का उत्पाद हूं। उसकी कहानी मेरी कहानी है।” बता दें कि इस नाटक का मंचन रवांडा के एक पहाड़ी गांव में फ्रांसीसी नॉवेल “स्मॉल कंट्री” के आधार पर की गई। इस दौरान 100 से अधिक लोग इकट्ठे रहे।

















