केरल में जुम्बा डांस विवाद: आखिर कट्टरपंथी इस्लामिस्ट क्यों कर रहे विरोध?
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केरल में जुम्बा डांस विवाद: आखिर कट्टरपंथी इस्लामिस्ट क्यों कर रहे विरोध?

केरल के स्कूलों में जुम्बा डांस कार्यक्रम को लेकर विवाद। मुस्लिम संगठन इसे नैतिकता के खिलाफ बता रहे हैं, जबकि सरकार इसे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी मानती है।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jun 29, 2025, 11:36 am IST
inविश्लेषण
Zumba dance in kerala

प्रतीकात्मक तस्वीर

केरल के स्कूलों में बच्चों को नशे की आदत से दूर करने के लिए और उन्हें फिट रखने के लिए जुम्बा डांस भी करवाया जा रहा है। मगर इसे लेकर अब कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों की आँखें तन गई हैं। वे इस बात पर आग बबूला हैं कि यह सब स्कूलों में क्यों सिखाया जा रहा है? इससे लड़के और लड़कियां साथ डांस करेंगे और छोटे-छोटे कपड़े पहनने पर लड़कियों को मजबूर किया जाएगा।

कट्टरपंथी मौलवियों की नाराजगी क्यों?

केरल ही नहीं उत्तर प्रदेश के मौलवी भी इस फैसले को लेकर आग बबूला हैं। उन्हें ऐसा लग रहा है कि जैसे फिटनेस नहीं सरकार कुछ और ही स्कूल्स में करवा रही है। केरल सरकार के इस निर्णय पर ऐसा हंगामा मचा है कि जैसे यह डांस मुस्लिम लड़कियों को पूरी तरह से चरित्रहीन कर देगा। कई स्कूलों ने जुम्बा का प्रशिक्षण देना आरंभ कर दिया है।

जुम्बा डांस को मुस्लिम समाज के मूल्यों के खिलाफ बताया जा रहा है और नैतिकता के खिलाफ भी। समस्त केरल जेम-इयाथुल उलमा से संबद्ध समस्त युवजन संगम (एसवाईएस) के नेता अब्दुसमद पुक्कोट्टूर ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि ज़ुम्बा नृत्य समाज के नैतिक मानकों के विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि सरकार ऐसे समय में यह कदम लागू कर रही है, जब फिजिकल एजुकेशन के कई पद स्कूलों में खाली पड़े हुए हैं।

समस्त के नेता नसीर फाइजी ने भी जुमबा डांस की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें डांस करने वालों को छोटे कपड़े पहनने होंगे और एक दूसरे को छूकर डांस करना होगा। और बड़े बच्चों के लिए यह सब गतिविधियां बर्दाश्त नहीं हैं।

जुम्बा प्रैक्टिस को अश्लीलता से जोड़ रहे

उन्होंने फेसबुक पर लिखा कि मौजूदा शारीरिक प्रशिक्षण प्रणाली में सुधार करने के बजाय, (छात्रों पर) अश्लीलता थोपी जा रही है। छात्रों को अपने शरीर को दिखाने और अंतरंग नृत्य में शामिल होने के लिए मजबूर करना उन लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, जिनका नैतिक विवेक ऐसे कृत्य की अनुमति नहीं देता है।

इसके साथ ही मुस्लिम लीग के छात्र संगठन मुस्लिम स्टूडेंट्स फेडरेशन ने भी सरकार की इस पहल पर प्रश्न उठाए हैं और यह कहा है कि यह कदम बिना किसी गहन अध्ययन के एकतरफा ले लिया गया है। onmanorama के अनुसार, एमएसएफ के अध्यक्ष पीके नवस ने कहा, “जब भी छात्रों के लिए कोई भी फैसला लागू किया जाता है तो इसके विषय में चर्चा की जाती है। सरकार को टीके अशरफ जैसे टीचर्स के विचारों को संज्ञान में लेना चाहिए था। बहुत शिकायतें हैं कि बच्चे नशीली दवाइयाँ ले रहे हैं। तो इन मामलों में क्या प्रगति हुई है? सरकार किसी भी मुद्दे पर गंभीरता से काम नहीं कर ही है!”

टीके अशरफ जो कि एक स्कूल टीचर हैं, वे विज़्डम इस्लामिक ऑर्गनाइज़ेशन में वरिष्ठ सदस्य भी हैं।

कट्टरपंथियों का दोगलापन समझिए

यह बहुत हैरानी की बात है कि जब भी डांस की बात आती है तो कट्टरपंथी संगठन डांस नैतिक मूल्यों के खिलाफ है, जैसी बातें करते हैं, परंतु फिल्म इंडस्ट्री में अपने समुदाय के उन आदमियों को लेकर कोई भी फतवा नहीं जारी करते हैं, जो परदे पर डांस करते हैं, गाते हैं, और अभिनय करते हैं।

यहाँ पर भी उनके सारे कदम लड़कियों को ही लेकर हैं। उन्हें डर है कि लड़कियों को छोटे कपड़े पहनाए जाएंगे और उन्हें लड़कों के साथ मिलकर डांस करने पर मजबूर किया जाएगा। क्या लड़के डांस करने से बिगड़ते नहीं है? यह एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है और जिसका उत्तर कट्टरपंथी संगठनों की ओर से आना ही चाहिए। उन सभी उद्योगों में मुस्लिम लड़के क्या कर रहे हैं, जो संगीत और नृत्य से संबंधित हैं?

यह किस प्रकार की कट्टरपंथी सोच है जो अपनी ही बच्चियों को एक स्वास्थ्य से संबंधित डांस करने से रोक रही है?

सरकार ने खारिज की आपत्तियाँ

केरल सरकार की उच्च शिक्षा मंत्री आर बिन्दु ने इस बात को लेकर कड़ी आपत्ति व्यक्ति की है कि जुमबा डांस नैतिकता के खिलाफ है। उन्होनें सरकार के कदम का बचाव करते हुए कहा कि यह मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए है।

उन्होनें कहा कि हम 21वीं शताब्दी में हैं और यह 2025 चल रहा है। हम मध्यकाल या उन्नीसवीं शताब्दी में नहीं हैं। और उन्होनें लोगों से एक प्रगतिशील सोच रखने की अपील की।

उन्होनें कहा कि जब एक ओर आज महिलाएं अंतरिक्ष में जा रही हैं तो दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो उन्हें पीछे कर रहे हैं। महिलाओं के पास भी अपना स्थान होना चाहिए।

केरल सरकार के सामने शिक्षा मंत्री वी. शिवनकुट्टी ने कहा कि ऐसी आपत्तियाँ समाज में ऐसा जहर घोलती हैं जो नशे से भी अधिक खतरनाक है।

सरकार कट्टरपंथियों के आगे झुकेगी या जारी रखेगी?

जिस प्रकार से ये आपत्तियाँ आ रही हैं, अब उसे देखकर यह प्रश्न अवश्य उभरता है कि क्या केरल सरकार इसे जारी रखेगी या फिर कट्टरपंथियों के दबाव में आकर इसे रोक देगी? जैसे कि संकेत मिलने लगे हैं कि यह अनिवार्य नहीं है। और फिर केरल में अक्टूबर में स्थानीय निकाय चुनावों के साथ ही अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव हैं। तो ऐसे में मुस्लिम संगठनों के विरोध का खतरा शायद मुख्यमंत्री न लें और यह भी हो सकता है कि वे यह कदम वापस ले लें।

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के अपने विचार हैं। आवश्यक नहीं कि पाञ्चजन्य उनसे संबंधित हो।)

 

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