मैं सुभाष चंद्र बोस ईश्वर को साक्षी मानकर पवित्र शपथ लेता हूं कि अंतिम सांस तक स्वतंत्रता का पावन युद्ध लड़ता रहूंगा
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मैं सुभाष चंद्र बोस ईश्वर को साक्षी मानकर पवित्र शपथ लेता हूं कि अंतिम सांस तक स्वतंत्रता का पावन युद्ध लड़ता रहूंगा

21 अक्टूबर यानी आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अंतरिम सरकार की 81वीं वर्षगांठ है, अखंड भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेताजी सुभाष चंद्र बोस और अंतरिम सरकार के बारे में जानें

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Oct 21, 2024, 08:28 am IST
inभारत
नेताजी सुभाष चंद्र बोस

नेताजी सुभाष चंद्र बोस

स्वाधीनता के अमृत काल के आलोक में अब समय आ गया है कि 21 अक्टूबर 1943 को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में स्थापित भारत की प्रथम स्वतंत्र अंतरिम (अस्थाई) सरकार के विषय में विस्तार से लिखा जाए और पाठ्यक्रमों में सम्मिलित कर विसंगतियों को दूर किया जाए। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में स्थापित की गई अंतरिम सरकार की 81वीं वर्षगांठ पर वर्तमान और भविष्य पीढ़ी को यह जानना आवश्यक होगा कि भारत की प्रथम स्वतंत्र सरकार कौन सी थी और प्रथम प्रधानमंत्री कौन था? क्योंकि ब्रिटिश सरकार के निर्देशन और उसके प्रावधानानुसार अंतरिम सरकार के उपरांत सन् 1947 को भी एक सरकार बनी थी और प्रधानमंत्री का दायित्व पंडित जवाहर लाल नेहरू को दिया गया था, परंतु दोनों बार क्रमशः नेहरू को सन् 1946 में क्राऊन के अधीन तत्कालीन गवर्नर जनरल एवं वायसराय विस्काऊंट वैबेल ने शपथ दिलाई और दूसरी बार भी 15 अगस्त सन 1947 को भी क्राऊन की कृतज्ञता में गवर्नर जनरल माउंटबेटन ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई।

ऐसे में प्रथम सरकार और प्रथम प्रधानमंत्री किसे माना जाए, यह अत्यंत विचारणीय और जटिल प्रश्न है? उपर्युक्त तर्कों के आलोक में देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में स्थापित अंतरिम सरकार भारत की अंग्रेजों के प्रभाव से मुक्त प्रथम स्वतंत्र सरकार थी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे। यद्यपि इसके पूर्व पहली अंतरिम सरकार की घोषणा काबुल में सन् 1915 में को राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने भी की थी और वे स्वयं राष्ट्रपति भी बने थे परंतु वह पूर्ण रूप से मूर्त रूप नहीं ले सकी, लेनिन ने भी धोखा दिया। जबकि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अंतरिम सरकार ने पूर्णता के साथ मूर्त रूप लिया।

5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने सुप्रीम कमाण्डर के रूप में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी ने सेना को सम्बोधित करते हुए दिल्ली चलो! का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर बर्मा सहित आज़ाद हिन्द फ़ौज रंगून (यांगून) से होती हुई थलमार्ग से भारत की ओर बढ़ती हुई 18 मार्च 1944 को कोहिमा और इम्फ़ाल के भारतीय मैदानी क्षेत्रों में पहुंच गई, जहां ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से जमकर मोर्चा लिया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपने अनुयायियों को “जय हिन्द” का अमर नारा दिया और 21 अक्टूबर 1943 में सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की अंतरिम (अस्थायी) सरकार आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना की। उनके अनुयायी प्रेम से उन्हें नेताजी कहते थे।

अपनी इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा सेनाध्यक्ष तीनों का पद नेताजी ने अकेले ही संभाला। इसके साथ ही अन्य दायित्व जैसे वित्त विभाग एस.सी चटर्जी को, प्रचार विभाग एस.ए. अय्यर को तथा महिला संगठन लक्ष्मी स्वामीनाथन को सौंपा गया। वस्तुतः नेताजी सुभाषचंद्र बोस का मानना था कि भारतीय इस बात की प्रतीक्षा क्यों करें कि जब अंग्रेज भारत को स्वतंत्रता देंगे, तब हम हमारी सरकार बनाकर देश की गतिविधियों का संचालन करें। इसी तर्क के साथ नेताजी ने पहले ही सरकार गठित कर शपथ ले ली थी। नेताजी का मानना था कि जब तक राज्य-सत्ता की शक्ति हस्तगत नहीं की जाएगी, तब तक भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्र करवा पाना सरल नहीं होगा। यही कारण था कि उन्होंने पृथक सेना के गठन के साथ-साथ पृथक मंत्रिपरिषद भी बनाया था। उनके मंत्रिपरिषद में 18 मंत्री थे और इन सबको पृथक – पृथक विभागों का दायित्व सौंपा गया था।

यह शपथ समारोह सिंगापुर में हुआ था, जिसमें नेताजी ने कहा था, ‘यह शपथ उन शहीदों के नाम पर है, जिन्होंने हमें वीरता और बलिदान की अमर धरोहर दी। ईश्वर को साक्षी मानकर मैं सुभाषचंद्र बोस पवित्र शपथ लेता हूं कि अपने भारत व मेरे अड़तीस करोड़ देशवासियों (तब भारत की जनसंख्या) की स्वाधीनता के लिए अपनी अंतिम सांस तक स्वतंत्रता का पावन युद्ध लड़ता रहूंगा।”

नेताजी के बाद अन्य सदस्यों ने भी अंतिम सांस तक भारत को स्वाधीन करने के संकल्प की शपथ ली व अंत में हाथों में बंदूक उठाकर भारत मां का जयकारा लगाया। उनकी इस सरकार को जर्मनी, जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड सहित 11 देशों ने मान्यता दे दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। नेताजी उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा गया। 30 दिसम्बर 1943 को इन द्वीपों पर स्वतन्त्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया। इसके बाद नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर एवं रंगून में आज़ाद हिन्द फ़ौज का मुख्यालय बनाया। 4 फ़रवरी 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया।21 मार्च 1944 को दिल्ली चलो के नारे के साथ आज़ाद हिंद फौज का हिन्दुस्तान की धरती पर आगमन हुआ।

22 सितम्बर 1944 को शहीदी दिवस मनाते हुये सुभाषचन्द्र बोस ने अपने सैनिकों से मार्मिक शब्दों में कहा “हमारी मातृभूमि स्वतन्त्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा। यह स्वतन्त्रता की देवी की माँग है।”

Topics: नेताजीसुभाष चंद्र बोसभारत के पहले प्रधानमंत्रीतुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगानेताजी का नाराभारत की पहली सरकार
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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