क्या अरब से जमीन भी लेकर भारत आए थे ! वक्फ बोर्ड जहां चाहे ठोक देता है दावा
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क्या अरब से जमीन भी लेकर भारत आए थे ! वक्फ बोर्ड जहां चाहे ठोक देता है दावा

दिन-प्रतिदिन जहां चाहे वहां वक्‍फ बोर्ड अपना दावा ठोक देता है ! वह तो गनीमत है कि देश में न्‍यायव्‍यवस्‍था है और आम नागरिक भी जागरूक है, अन्‍यथा तो पूरा भारत ही वक्‍फ की प्रॉपर्टी घोषित हो चुका होता!

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Oct 17, 2024, 06:05 pm IST
in मत अभिमत
चित्र प्रतीकात्मक

चित्र प्रतीकात्मक

भारत में जब मुस्लिम आक्रांता आए तो वे अपने साथ जमीन भी लेकर आए थे ! इतनी जमीन लेकर आए थे कि इस्‍लामवादियों के दावे खत्‍म होने का नाम ही नहीं ले रहे और दिन-प्रतिदिन जहां चाहे वहां वक्‍फ बोर्ड अपना दावा ठोक देता है ! वह तो गनीमत है कि देश में न्‍यायव्‍यवस्‍था है और आम नागरिक भी जागरूक है, अन्‍यथा तो पूरा भारत ही वक्‍फ की प्रॉपर्टी घोषित हो चुका होता!

दरअसल, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के प्रमुख और असम के जमीयत उलेमा प्रमुख मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने जो कहा है उससे तो यही लग रहा है कि भारत की अधिकांश जमीन मुसलमान अपने साथ अरब से लेकर आए थे ! वे कह रहे हैं कि नई संसद वक्फ बोर्ड की जमीन पर बनी है, यह प्रॉपर्टी हमारे बाप-दादा की है। इतना ही नहीं नई संसद भवन के आस-पास के इलाके, वसंत विहार से लेकर एयरपोर्ट तक सब कुछ वक्‍फ की संपत्ति पर बना हुआ है। आप देखेंगे कि किस तरह से इन दिनों पूरे देश में एक वर्गविशेष द्वारा वक्‍फ बोर्ड की हिमायत हो रही है। कहने को वक्फ बिल पर बनाई गई जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी (जेपीसी) की बैठक हो रही है, लेकिन विपक्ष बार-बार वॉकआउट कर रहा है । जगदंबिका पाल जो इस जेपीसी कमेटी के चेयरपर्सन हैं, उन्‍हीं को कटघरे में खड़े किए जाने के प्रयास हो रहे हैं। कांग्रेस सदस्य गौरव गोगोई, सैयद नसीर हुसैन, इमरान मसूद, डीएमके पार्टी के नेता ए. राजा और एमएम अब्दुल्ला, इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी लगातार इस तरह का माहौल बनाने का प्रयास करते हैं कि आखिरकार बैठक अपने निष्‍कर्ष तक पहुंच ही नहीं पा रही।

केरल विधानसभा ने इस बिल के खिलाफ सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार पर इसे वापस लेने का नैतिक दबाव बनाया जा रहा है। कट्टरपंथी इस्लामी संगठन जमीयत उलेमा ए हिंद के चीफ मौलाना अरशद मदनी और इनके संगठन के अन्‍य कई नेता लगातार वक्फ अधिनियम में संशोधन के खिलाफ जहर उगल रहे हैं। अरशद मदनी झूठ फैला रहे हैं कि वक्फ बोर्ड के नियमों में संशोधन विधेयक का इस्तेमाल करके केंद्र सरकार वक्फ की संपत्तियों को हड़पना चाहती है। उन्‍हें भारत में फासीवाद बढ़ता दिखाई दे रहा है। इनकी तरह ही असदुद्दीन ओवैसी भी उन नेताओं में शामिल हैं जो मुस्‍लिम समाज को लगातार वक्‍फ के नाम पर डर दिखा रहे हैं। यानी कि एक ऐसा माहौल देश भर में तैयार करने का प्रयास हो रहा है कि वक्‍फ बोर्ड को लेकर केंद्र की मोदी सरकार जो संशोधन करने जा रही है, वह अनुचित है।

अब ये मौलाना बदरुद्दीन अजमल तो वक्‍फ बिल का विरोध करते-करते इतने आगे निकल गए हैं कि उन्‍होंने 80 प्रतिशत देश की राजधानी के हिस्‍से को ही वक्‍फ की संपत्‍त‍ि बता दिया! बदरुद्दीन कह रहे हैं, भाजपा की केंद्र सरकार ने जैसे अनुच्छेद-370 को खत्म कर दिया, ट्रिपल तलाक को खत्म कर दिया, उसी तरह वक्फ को नुकसान पहुंचाना चाहती है। बीजेपी का लक्ष्य इस्लाम मानने वाले को तकलीफ पहुंचाना है। वे केंद्र सरकार को धमकी दे रहे हैं, कह रहे हैं कि इस मर्तबा उन्होंने (मोदी सरकार ने) सबसे खतरनाक काम किया है। हमारे बाप-दादा और पुरखों ने करोड़ों रुपये की संपत्तियां पूरे देश में गली-गली में दी हैं। सरकार इसको हड़पना चाहती है, ये सरकार चाहती है कि पूरे हिंदुस्तान से मुस्लिमों का नामो-निशान खत्म हो जाए। फिर कह रहे हैं कि यह 18-20 प्रतिशत मुस्लिम ऐसी चीज नहीं हैं, जिसको आप निकालकर खा लेंगे।

यानी कि ये सभी वक्‍फ बोर्ड संशोधन का विरोध करनेवाले यही चाहते हैं कि कट्टरपंथी मुसलमान अपनी मनमानी करता रहे, कोई कानून नहीं मानें, नियमों से नहीं चले, उसकी अपनी मर्जी में आए वह करे और आप यदि कानून बनाकर रोकेंगे तो अच्‍छा नहीं होगा? आप सोचिए, यदि यह वक्‍फ बोर्ड सही काम कर रहा होता तो सरकार को संशोधन लाने की जरूरत ही क्‍यों पड़ती? अभी कुछ दिन पहले ही यह खबर आई, केरल के एक गांव को लेकर । राजधानी कोच्चि की हलचल से दूर मुनंबम उपनगर में मछुआरों के इस खूबसूरत गांव चेराई जो अपने बीच रिसॉर्ट्स के साथ पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण का केंद्र है, इस 100 साल पुराने गांव पर वक्फ बोर्ड ने अपना दावा ठोक दिया। अब इस गांव के लोग पलायन के डर में जी रहे हैं। गांव के लगभग 610 परिवारों ने आरोप लगाया है कि उनकी जमीन और संपत्तियों पर वक्‍फ बोर्ड कब्‍जा जमाना चाहता है। कानूनी विवाद में फंसने के कारण गांव वाले 2022 से ही न तो अपनी जमीन पर लोन ले सकते हैं, और न ही इसे बेच सकते हैं ।

एक खबर दिल्‍ली से आई वक्फ बोर्ड द्वारा यहां के छह प्रमुख मंदिरों पर अपना होने का दावा ठोक दिया गया। आश्‍चर्य तो इस बात का है कि कुछ मंदिर वक्फ बोर्ड के अस्तित्व में आने से पहले से मौजूद हैं। लेकिन वक्‍फ बोर्ड कह रहा है कि नहीं ये हिन्‍दुओं की नहीं, हमारी जमीन है। दिल्ली वक्फ बोर्ड राजधानी में मंदिर और हिंदू प्रॉपर्टी तक ही नहीं रुकता, वह डीडीए के दफ्तर, डीटीसी बस अड्डा यहां तक की एमसीडी के कूड़ाघर को अपनी प्रॉपर्टी बता रहा है। मध्‍य प्रदेश की राजधानी भोपाल में कई, बिहार की राजधानी पटना से 30 किलोमीटर दूर स्थित गोविंदपुर गांव की भी कहानी केरल के गांव चेराई की तरह ही है। वक्फ बोर्ड ने पूरा गांव अपना बताकर वहां के निवासियों को नोटिस जारी किया है । गोविंदपुर, जो है और जिसकी जनसंख्या लगभग 5,000 है, 90 प्रतिशत हिंदू आबादी वाला गांव है। वक्फ बोर्ड ने जमीन खाली करने की चेतावनी दी है।

आर्केलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) की टीम ने जेपीसी में अपनी आपत्‍त‍ियां दर्ज कराई हैं। एएसआई ने यहां बताया कि कई संपत्तियां जो पहले भारत सरकार ने संरक्षित की थीं, उन पर वक्फ ने बिना किसी सबूत के दावा कर दिया है। वक्फ अधिनियम 1995, वक्फ बोर्ड को दान के नाम पर किसी भी संपत्ति या भवन को वक्फ संपत्ति घोषित करने का अधिकार देता है। जिसका कि गलत फायदा उठाया गया है। इस अधिकार का उपयोग करते हुए, वक्फ बोर्ड ने संरक्षित स्मारकों को वक्फ संपत्ति घोषित करने के लिए अधिसूचनाएं जारी की हैं, जिसके कारण प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम 1958 के तहत दिए गए अधिकारों के साथ टकराव हुआ। वक्फ बोर्ड एएसआई को इन संरक्षित स्मारकों पर नियमित संरक्षण और रखरखाव कार्य करने से रोकता है। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां वक्फ अधिकारियों ने संरक्षित मॉन्यूमेंट्स के ओरिजनल स्ट्रक्चर में बदलाव किए हैं, जिससे स्ट्रक्चर की पहचान प्रभावित हुई है। ऐसा भी एएसआई के साथ हुआ है कि वक्फ के सदस्‍यों ने कई बार एएसआई के कर्मचारियों को संरक्षित मॉन्यूमेंट्स में नहीं जाने दिया । कई बार, कई जगह वक्फ बोर्ड मॉन्यूमेंट्स पर मालिकाना हक जताने लगते हैं।

अभी बीते अगस्त माह में ही मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें बुरहानपुर किले को वक्फ का मालिकाना हक बताया गया था। हाई कोर्ट सुनवाई के दौरान जस्टिस गुरपाल सिंह अहलूवालिया ने वकील को कड़ी फटकार तक लगाई और कहा, “फिर तो आप कहेंगे ताजमहल, लाल किला और पूरा भारत वक्फ बोर्ड का है।” जज की यह टिप्पणी तब आई जब वकील वक्फ बोर्ड के अंतर्गत प्रॉपर्टी को लाने के संबंध में स्पष्ट जवाब देने में असमर्थ रहे। वक्फ बोर्ड मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को लेकर अपना सख्त रुख अपनाया है। न्‍यायालय से कर्नाटक सरकार को फटकार लगी है। वक्फ बोर्ड की इंदौर में करारी हार हुई है। करबला मैदान की 6.70 एकड़ जमीन को वक्फ संपत्ति बताए जाने का दावा जिला कोर्ट ने खारिज कर दिया। साथ ही कोर्ट ने इंदौर नगर निगम को इस बेशकीमती भूमि का मालिक घोषित कर दिया है। इससे पहले एक निर्णय भोपाल में आया और वक्‍फ बोर्ड को साफ बता दिया गया कि शासकीय भूमि पर कब्‍जा स्‍वीकार्य नहीं किया जाएगा। इसलिए वक्फ बोर्ड शासकीय भूमि से अपने अवैध कब्जे को शीघ्र हटाए। अब यहां वक्फ बोर्ड को हमीदिया रोड स्थित इसराणी मार्केट से किए गए अपने निर्माण को हटाना होगा ।

वस्‍तुत: वक्‍फ संपत्‍त‍ि एवं कब्‍जे से जुड़ा जो बड़ा मामला बीते सालों में सबसे ज्‍यादा चर्चाओं में रहा वह तमिलनाडु प्रदेश के त्रिचि जिले के गांव में डेढ़ हजार हिन्‍दू आबादी से जुड़ा है, उसमें कुल सात-आठ घर मुस्लिमों के हैं और पड़ोस में ही एक भगवान शंकर जी का मंदिर है जो डेढ़ हजार साल पुराना है। वक्फ बोर्ड ने उस गांव की पूरी संपत्ति पर अपना दावा ठोक दिया और सबको खाली करने का नोटिस कलेक्टर के यहां से पहुंचा दिया गया। ऐसा ही एक मामला महाराष्ट्र के सोलापुर जिले का बहुत चर्चाओं में रहा है, जहां एक बस्ती में 250 के करीब हिन्‍दू अनुसूचित जाति वर्ग के लोग निवासरत हैं, उनके पास एक नोटिस उनकी जमीन को खाली करने का आया कि वो जहां रह रहे हैं वो वक्फ बोर्ड की जमीन है। ऐसे ही सूरत में सरकारी इमारतें, बेंगलुरु में तथाकथित ईदगाह मैदान, हरियाणा में जठलाना गाँव, हैदराबाद का पाँच सितारा होटल जैसी अनेक संपत्‍त‍ियां हैं जिन पर वक्‍फ आज अपना दावा ठोक रहा है ।

आप विचार करें, आठवीं शताब्दी तक इस्लाम पश्चिम में साइबेरिया से लेकर पूर्व में सिंधु नदी तक फैला था। उसके बाद वह भारत में प्रवेश करता है और अपने हिंसात्‍मक प्रयोगों से कई भव्‍य-दिव्‍य मंदिरों को नष्‍ट कर देता है, लेकिन इसके बाद भी कई मंदिर बहुत ही स्‍वाभि‍मान के साथ खड़े रहते हैं, अब वक्‍फ बोर्ड भला, इस्‍लाम के भारत प्रवेश के पूर्व के मंदिर जो विधिवत देवस्‍थान की पूजा अर्चना कर रहे हैं और जो पुरातन गांव हैं उन पर अपना दावा कैसे ठोक सकता है? लेकिन नहीं, वह कहीं रुकने को तैयार नहीं, वह दावा ठोक रहा है! और सरकारें नियमों में बंधी हैं, वह कुछ नहीं कर पा रहीं। दरअसल, वक्‍फ बोर्ड में अधिनियम की धारा 40 में प्रावधान है कि अगर वक्फ बोर्ड किसी संपत्ति को वक्फ संपत्ति समझता है तो उस पर दावा कर सकता है। धारा 40 वक्फ बोर्ड को अधिकार देता है कि संपत्ति पर नोटिस देकर और फिर जांच करके वक्फ की प्रॉपर्टी तय कर सकता है कि वो वक्फ की जमीन है। यहां इस धारा के कारण ही सबसे ज्‍यादा समस्‍याएं पैदा हुई हैं। अब सरकार इसमें संशोधन करना चाहती है तो ये घोर मजहबी मानसिकता के लोग इसे स्‍वीकार्य ही नहीं कर रहे हैं।

निश्‍चित ही ऐसे अनेक तथ्‍य हैं जोकि आज वक्‍फ बोर्ड को कठघरे में खड़ा करते हैं। कहना होगा कि वक्फ का कानून आज जिस स्थिति में है, वह सार्वजनिक शांति, सांप्रदायिक सद्भाव के लिए किसी बड़े खतरे से कम नहीं है। वास्‍तव में यह वक्‍फ बोर्ड कानून वर्तमान में जैसा है, उसमें वह निजी संपत्ति के अधिकारों का उल्लंघन करता है और संभावित रूप से आतंक से पोषि‍त राजनीति को प्रोत्साहित करता हुआ दिखता है। इसलिए जो दूसरों की जमीन को हड़पने के लिए इस्‍लामिक प्रेक्‍ट‍िस वक्‍फ बोर्ड के माध्‍यम से चल रही है। जो लोग इस प्रकार का कृत्‍य कर रहे हैं, वास्‍तव में उन्‍हें ये तुरंत बंद कर देनी चाहिए। इस्‍लामवादियों को भी यह समझना होगा कि इस्‍लाम अरब से जमीन लेकर भारत नहीं आया था! वक्‍फ बोर्ड के नाम पर देश की आम जनता को परेशान करना बंद किया जाए।

Topics: वक्फ बोर्डहिंदूइस्लामवादीअरबमुस्लिम आक्रांतामुस्लिमभारत
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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