Bangladesh : 1971 में पाकिस्तानी फौज के हथियार डालने की याद में बनी मूर्ति तोड़ दी मजहबी कट्टरपंथियों ने
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Bangladesh : 1971 में पाकिस्तानी फौज के हथियार डालने की याद में बनी मूर्ति तोड़ दी मजहबी कट्टरपंथियों ने

1971 युद्ध की याद में बने शहीद स्मारक में अब तक बहुत सम्मानित मानी जाती रही यह सुविख्यात मूर्ति तोड़ डाली गई। कांग्रेस के लोकसभा सांसद शशि थरूर ने अपनी पोस्ट में इस बारे में तीखे शब्द लिखे हैं।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 12, 2024, 05:38 pm IST
inविश्व
'आत्मसमर्पण का स्मारक' टुकड़े-टुकड़े होने से पहले (ऊपर) और बाद में (नीचे)

'आत्मसमर्पण का स्मारक' टुकड़े-टुकड़े होने से पहले (ऊपर) और बाद में (नीचे)

सोशल मीडिया एक्स पर अपने हैंडल से शशि लिखते हैं, “मुजीबनगर स्थित 1971 के शहीद स्मारक कैंपस में प्रतिमाओं को भारत विरोधी दंगाइयों के नष्ट किए जाने के ऐसे चित्र देखकर दुख हुआ। अनेक जगहों पर भारतीय सांस्कृतिक केंद्र, मंदिरों तथा हिंदू घरों पर अपमानजनक हमलों के बाद ऐसा हुआ…”।


अंतरिम सरकार के नाम पर आज बांग्लादेश में मजहबी उन्मादियों का खुला कट्टरपंथी खेल चल रहा है। ये कट्टरपंथी संभवत: उन्हीं उन्मादी रजाकारों की संतानें हैं जो 1971 में बर्बर पाकिस्तानी सैनिकों के साथ खड़े होकर अपने ही देश वालों पर गोलियां चला रहे थे। तभी तो 1971 में पाकिस्तानी सेना के कमांडर द्वारा भारतीय जनरल के सामने घुटने टेकने की याद दिलाने वाली मूर्ति को तोड़ डाला गया है। ढाका में शहीद स्मारक में मौजूद रही यह मूर्ति टुकड़े—टुकड़े कर दी गई है। इस बात का उल्लेख करते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस घटना पर अपने आहत होने की भी जानकारी दी है।

सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में उन्होंने दुख प्रकट करते हुए लिखा कि यह ‘भारत विरोधी उपद्रवियों का काम’ बताया। दुनिया जानती है कि बांग्लादेश में छात्र आंदोलन की आड़ में बाहरी ताकतों की शह पर जमाते इस्लामी के कट्टरपंथियों ने तख्तापलट कराया। इतना ही नहीं, जमात के मजहबी उन्मादियों ने इस बलवे की चपेट में हिन्दुओं की हत्याएं की, उनके घर—दुकान जलाए और एक पूरा गांव जला दिया।

पूरे देश में छात्र आंदोलन के नाम पर जिहादी सोच के उपद्रवियों द्वारा मनमानी की जा रही है और रोकने वाला कोई नहीं है। लेकिन, देश जिस घटनाक्रम के परिणामस्वरूप बर्बर पाकिस्तान से आजाद हुआ, उसकी स्मृति में बना ‘आत्मसमर्पण का स्मारक’ टुकड़े—टुकड़े कर दिया जाना बहुत कुछ बताता है। 1971 युद्ध की याद में बने शहीद स्मारक में अब तक बहुत सम्मानित मानी जाती रही यह सुविख्यात मूर्ति तोड़ डाली गई। कांग्रेस के लोकसभा सांसद शशि थरूर ने अपनी पोस्ट में इस बारे में तीखे शब्द लिखे हैं।

सांसद शशि थरूर का ट्वीट

सोशल मीडिया एक्स पर अपने हैंडल से शशि लिखते हैं, “मुजीबनगर स्थित 1971 के शहीद स्मारक कैंपस में प्रतिमाओं को भारत विरोधी दंगाइयों के नष्ट किए जाने के ऐसे चित्र देखकर दुख हुआ। अनेक जगहों पर भारतीय सांस्कृतिक केंद्र, मंदिरों तथा हिंदू घरों पर अपमानजनक हमलों के बाद ऐसा हुआ…”। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर जारी हमलों पर भी कांग्रेस सांसद थरूर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं, यह कार्य कुछ ‘आंदोलनकारियों के एजेंडे’ को सामने रखते हैं।

इस पोस्ट के माध्यम से सांसद थरूर ने बांग्लादेश में वर्तमान में कार्य कर रही मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार से अपील की है कि देश में कानून—व्यवस्था बहाल करने के लिए फौरन कदम उठाए जाएं जिससे कि ‘हर मत के तमाम बांग्लादेशियों का हित’ हो सके।

अपने ट्वीट में शशि आगे लिखते हैं,”उथलपुथल की इस घड़ी में भारत बांग्लादेश के साथ खड़ा। है। परन्तु इस जैसी ज्यादतियां, जो अराज​क हैं, इन्हें माफ नहीं किया जा सकता।” इस प्रतिमा, ‘आत्मसमर्पण का दस्तावेज’ को 16 दिसंबर, 1971 की याद में लगाया गया था, जब पाकिस्तानी सेना कमांडर द्वारा भारत की सेना तथा बांग्लादेश की मुक्ति बाहिनी के सामने आत्मसमर्पण के दस्तावेज पर दस्तखत किए जाने को दृश्य दिखाया गया है।

उस समय पाकिस्तानी कमांडर थे मेजर जनरल आमिर अब्दुल्ला खान नियाज़ी, जिन्होंने अपने 93,000 सैनिकों के साथ भारत के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने हथियार डाले थे। जनरल अरोड़ा उस समय भारत की पूर्वी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ थे। पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों का वह आत्मसमर्पण दूसरे विश्व युद्ध के बाद, सैनिकों की संख्या को देखते हुए दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण माना जाता है।

सरकारी नौकरियों में कोटा व्यवस्था के विरुद्ध गत जून के अंत में शुरू हुआ छात्र आंदोलन बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार हिंसक प्रदर्शन बन गया। इस दौरान 400 से ज़्यादा लोग मारे गए और 5 अगस्त को शेख़ हसीना का तख्तापलट हो गया। इस्तीफ़ा देकर वह भारत आ गईं।

हालांकि मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने अल्पसंख्यकों पर हमलों को ‘घृणित’ बताते हुए देशवासियों से सभी हिंदू, बौद्ध तथा ईसाई परिवारों को नुकसान न पहुंचाने की अपील की तो है, लेकिन उनकी इस बात के पीछे बहुत गंभीरता है, इसे लेकर हिन्दुओं में संदेह है। वे भले ही नोबुल पुरस्कार प्राप्त हैं, लेकिन पिछले कई दिनों से हिन्दू विरोधी उपद्रवों को उन्होंने रोकने की कभी कोई अपील नहीं की।

Topics: daccaShashi Tharooryunusअल्पसंख्यक1971 memorialSurrenderPakistanभारतBangladesharmyबांग्लादेश
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