भाजपा से घृणा के कारण भारत को नीचा दिखाना कांग्रेसी फितरत..?
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भाजपा से घृणा के कारण भारत को नीचा दिखाना कांग्रेसी फितरत..?

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कम अनुभवी टीम की एक हार को 4 जून के साथ जोड़ना और उसे घमंड बताया जाना, वह असहिष्णुता है, जिसका परिचय कॉंग्रेस आजादी के बाद से देती आ रही है।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jul 10, 2024, 07:53 pm IST
in भारत, विश्लेषण

राजनीति में पार्टी का विरोध करते-करते अब भारत के विपक्षी दल भारत के ही विरोधी दिखने लगे हैं। जब से 4 जून 2024 को चुनाव परिणाम घोषित हुए हैं, तभी से ही कॉंग्रेस इस सदमे से बाहर नहीं आ पा रही है कि वह चुनाव हार चुकी है। 99 सीटों की अकड़ ऐसी है कि वह हिन्दू विरोधी और भारत विरोधी भी बातें लगातार करती जा रही है। वैसे तो 4 जून 2024 के बाद संसद के प्रथम सत्र में नेता प्रतिपक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दों से यह स्पष्ट हो गया था कि राजनीति की दिशा क्या होगी, मगर जिस प्रकार से राहुल गांधी की अगुवाई में कॉंग्रेस पार्टी ने दिशा पकड़ी है, वह हिन्दू एवं भारत विरोध पर जाकर रुकती है।

कॉंग्रेस के सबसे शिक्षित माने जाने वाले नेता शशि थरूर ने पिछले दिनों क्रिकेट मैच के माध्यम से निशाना साधा। हालांकि उनका यह दिखाने का प्रयास था कि वे कितना भारत के प्रति प्रेम रखते हैं। आदर करते हैं और वे भारत के क्रिकेट मैच हारने को लेकर दुखी हैं। मगर उसमें भी तंज उनका कथित घमंड पर था? मगर घमंड की बात क्या थी? दरअसल 29 जून को भारत ने टी-20 का विश्वकप जीता था और उसके बाद भारतीय विजेता टीम का भारत आने पर स्वागत किया गया था। बीसीसीआई की ओर से विक्ट्री परेड का आयोजन मुंबई में किया गया था।

और 6 जून से भारत और जिम्बाब्वे के बीच क्रिकेट मैच की शृंखला का आयोजन किया गया था। यह स्पष्ट है कि जो टीम विश्व कप जीतकर के बाद वापस आई है, वह टीम जिम्बाब्वे से खेलने के लिए नहीं जाएगी। युवा खिलाड़ियों से भरी टीम जिम्बाब्वे के साथ खेलने के लिए गई थी।

वह टीम अपना पहला मैच जिम्बाब्वे से हार गई थी। इस पर शशि थरूर ने एक्स पर पोस्ट लिखा कि “जबकि अभी तक जीते हुए विश्वकप फाइनल मैच की ध्वनि जिंदा है, हमें हरारे में छोटी जिम्बाब्वे की टीम ने हरा दिया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बीसीसीआई ने चीजों को हल्के में लेना शुरू कर दिया था। चाहे 4 जून हो या फिर 6 जुलाई, घमंड ने लोगों का सिर झुकाया है। बहुत शानदार खेले जिम्बाब्वे!”

यह पोस्ट काफी हैरान करने वाला इसलिए था क्योंकि इस पोस्ट में शशि थरूर का वही घमंड झलक रहा है, जो उनके नेता राहुल गांधी की हर बात से 4 जून के बाद झलक रहा है। आज तक राहुल गांधी और उनके इर्द गिर्द के लोग यही समझ रहे हैं और ऐसा व्यवहार कर रहे हैं, जैसे कि वे चुनाव जीत गए हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कम अनुभवी टीम की एक हार को 4 जून के साथ जोड़ना और उसे घमंड बताया जाना, वह असहिष्णुता है, जिसका परिचय कॉंग्रेस आजादी के बाद से देती आ रही है।

दरअसल एक झूठ जब हजार बार आत्मविश्वास के साथ बोला जाता है, तब वह सत्य प्रतीत होने लगता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दस वर्षों के बाद भी एनडीए की 295 सीटें आई हैं, तो वहीं यूपीए के दस वर्षों के शासन के बाद कॉंग्रेस की सीटें महज दहाई के आंकड़ों में सिमट गई थीन। कॉंग्रेस 50 का आंकड़ा भी पार करने में असफल हुई थी। उस समय भी कॉंग्रेस के समस्त नेताओं की भाषा और शैली इसी प्रकार थी, जो आज है। तब भी उनके दिल में वही असहिष्णुता थी, जो शशि थरूर के इस पोस्ट से दिखाई दे रही है।

दरअसल वर्ष 2014 के चुनावों में जब भारतीय जनता पार्टी की जीत हुई थी तो इसे दस वर्ष की यूपीए सरकार के प्रति नाराजगी मानी गई थी। और इसे एक्सीडेंटल माना गया था। मगर जब वर्ष 2019 में एनडीए की जीत हुई थी, तब कॉंग्रेस का घमंड और असहिष्णुता एक बार फिर से प्रकट रूप में आई थी और नकारने का दौर आरंभ कर दिया था। मगर वह नकारना कब भारत विरोध में बदल गया, यह नहीं पता चल पाया था और उसे असहिष्णुता को हर उस कदम के विरोध के साथ देखा गया, जो सरकार ने नीतिगत परिवर्तनों के लिए उठाए थे। सरकार का विरोध करना हर प्रतिपक्ष का कर्तव्य होता है, परंतु देश की गरिमा के विरुद्ध जाना? यह आज तक नहीं देखा था।

शशि थरूर ने भारत की कम अनुभवी क्रिकेट टीम की एक मैच में पराजय को 4 जून के साथ जोड़ा तो उन्होनें वही नकारे जाने का भाव दिखाया जो नागरिकता संशोधन अधिनियम के पारित होने के बाद शाहीन बाग में हिन्दू और देश विरोधी आंदोलन के रूप में दिखाया गया था और उसे कॉंग्रेस ने समर्थन दिया था।

यह वही भाव है जो किसान आंदोलन के दौरान देखा गया था। और यह वही भाव है जो फैजाबाद सीट जीतने के बाद कॉंग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी से कहलवाता है कि उन्होनें अयोध्या मे राम मंदिर आंदोलन को हरा दिया है। राहुल गांधी शायद यह भूल गए कि आंदोलन तो शताब्दियों से चल रहा था। पूरे पाँच सौ वर्षों के संघर्ष के बाद भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने श्रीराम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया था। चुनावी हारजीत से मंदिर आंदोलन का क्या लेना देना? क्योंकि इसके लिए तो हिंदुओं ने तब भी सिर कटाए थे जब कॉंग्रेस का भी नाम लेने वाला कोई नहीं था।

दरअसल ऐसे वक्तव्य उस घमंड को दिखाते हैं, जो 4 जून 2024 के बाद कॉंग्रेस के सिर पर चढ़कर बोल रहा है। हालांकि यह भी सत्य है कि दस वर्षों के बाद भी कॉंग्रेस दहाई के ही आंकड़ों में रुक गई है। वह 100 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई है, मगर फिर भी यह पीढ़ी दर पीढ़ी कॉंग्रेस का घमंड है, जो कॉंग्रेस को यह स्वीकार नहीं करने दे रहा है कि वे इस बार भी सत्ता से दूर हो गए हैं।

शशि थरूर जब 4 जून और 6 जुलाई को एक साथ जोड़कर कुछ लिखते हैं, तो उस घृणा को दिखाते हैं, जो उन्हें उस भारत से है जो भारतीय जनता पार्टी को वोट देता है, प्रधानमंत्री को अपना प्रधानमंत्री मानता है और जो भारत की क्रिकेट की जीत के साथ मगन हो जाता है। बीसीसीआई से उनकी घृणा इसलिए भी है क्योंकि उसमें जय शाह हैं और जय शाह अमित शाह के बेटे हैं। अमित शाह के साथ घृणा करते-करते शशि थरूर जय शाह से घृणा करते हैं और जब बीसीसीआई कुछ अच्छा करती है, अपनी टीम के मनोबल को बढ़ाने के लिए विक्ट्री परेड का आयोजन करती है तो जय शाह के प्रति घृणा बीसीसीआई के प्रति घृणा में परिवर्तित हो जाती है और यह नहीं भूलना चाहिए कि बीसीसीआई ही क्रिकेट में भारत का प्रतिनिधित्व करती है।

प्रश्न तो पूछा ही जाना चाहिए कि कॉंग्रेस अपनी हार को स्वीकार न करके भाजपा के प्रति अपनी घृणा को भारत और हिंदुओं के प्रति घृणा में परिवर्तित क्यों कर रही है?

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