ज्येष्ठ शुक्ल दशमी : दो देवशक्तियों ‘गंगा’ व ‘गायत्री’ का हुआ था धराधाम पर अवतरण
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ज्येष्ठ शुक्ल दशमी : दो देवशक्तियों ‘गंगा’ व ‘गायत्री’ का हुआ था धराधाम पर अवतरण

सनातन हिन्दू संस्कृति में ज्येष्ठ माह की विशिष्ट आध्यात्मिक व सांस्कृतिक महत्ता है। सूर्य की तपन की ज्येष्ठता (प्रचंडता) के कारण इस महीने को ‘ज्येष्ठ’ कहा जाता है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Jun 16, 2024, 10:49 am IST
in भारत, धर्म-संस्कृति

सनातन हिन्दू संस्कृति में ज्येष्ठ माह की विशिष्ट आध्यात्मिक व सांस्कृतिक महत्ता है। सूर्य की तपन की ज्येष्ठता (प्रचंडता) के कारण इस महीने को ‘ज्येष्ठ’ कहा जाता है। क्या ही दुर्लभ संयोग है कि ‘ज्येष्ठ’ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दो दिव्य दैवीय शक्तियां ‘गंगा’ और ‘गायत्री’ एक साथ धराधाम पर अवतरित हुई थीं। एक ओर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के सूर्यवंशी वंशज राजा भगीरथ ने अपने पुरखों को कपिल मुनि के शाप मुक्ति के लिए कठोरतम तप करके देवनदी ‘गंगा’ को स्वर्ग से धरती पर उतारा था तो दूसरी ओर क्षत्रिय से ब्राह्मणत्व ग्रहण करने वाले महामुनि विश्वामित्र अपनी दुर्धर्ष तपश्चर्या के बल पर ज्ञान गंगा की अधिष्ठात्री माँ गायत्री को देवताओं तक सीमित न रहने देकर भूलोक के कल्याण के लिए धरती पर लाये थे। एक ही पर्व एक तिथि पर दो दिव्य दैवीय शक्तियों का अवतरण भारतीय संस्कृति की विलक्षणता को सिद्ध करता है। भारतीय ज्योतिष के विद्वान आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार वर्ष 2024 में ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की पुण्यफलदायी दशमी तिथि 16 व 17 जून को मान्य रहेगी। इस हिन्दू तिथि पंचांग के अनुसार उदया तिथि के मुताबिक गंगा दशहरा का पर्व 16 जून को तथा 17-18 जून को निर्जला एकादशी के दिन गायत्री जयंती पर्व पड़ रहा है।

दस महापातक नष्ट करता है ‘गंगा दशहरा’
शास्त्रीय उद्धरण बताते हैं कि ‘गंगा दशहरा’ के पावन पर्व पर सूर्यवंशी राजा भगीरथ का कठोर तप सार्थक हुआ था और स्वर्गनदी गंगा देवाधिदेवशिव की जटाओं से प्रवाहित होती हुई धराधाम पर ब्रह्मा द्वारा निर्मित बिंदुसर सरोवर में उतरीं थीं। इस सरोवर की आकृति गाय के मुख के समान दिखने के कारण यह तीर्थ स्थल “गोमुख” के नाम से जाना जाता है। शास्त्रज्ञ कहते हैं कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दस योगों में माँ गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। इसलिए इस पर्व को “दशहरा” ( दस प्रकार के पापों को नष्ट करने वाला) कहा जाता है। यह दस योग हैं- ज्येष्ठ माह, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि, बुधवार, हस्त नक्षत्र, व्यतिपात योग, गर करण, आनंद योग, कन्या का चंद्रमा और वृषभ का सूर्य। ब्रह्म पुराण में कहा गया है कि गंगा का तत्वदर्शन जीवन में उतारने से दस महापातक सहज ही छूट जाते हैं। यह दस महापातक हैं- चोरी, झूठ बोलना, अनैतिक हिंसा, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, चुगली, परनिंदा, परस्त्री गमन और नास्तिक बुद्धि। शास्त्रों में गंगा माता को मोक्षदायिनी कहा गया है। इसी कारण सनातन हिन्दू धर्मावलम्बियों की प्रगाढ़ मान्यता है कि ‘गंगा दशहरा’ के दिन सच्ची श्रद्धा से माँ गंगा में डुबकी लगाने से व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं। चूंकि माँ गंगा शिव जी की जटाओं से होती हुई भूलोक पर आती हैं, इसलिए इस दिन माँ गंगा के साथ देवाधिदेव शिव का अर्चन-वंदन भी शुभ फलदायी होता है। गंगा दशहरा पर ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नानकर सूर्यदेव को अर्घ्य के साथ गंगा स्त्रोत का पाठ करने से व्यक्ति को शुभ फलों की प्राप्ति होती है तथा पूजा के बाद जरूरतमंदों को दान देने से पुण्य प्राप्त होता है। जानना दिलचस्प हो कि कई साल पहले गंगा की प्रशस्ति में एक गीत लिखा गया था- “गंगा तेरा पानी अमृत झर झर बहता जाय, युग युग से इस देश की धरती तुझसे जीवन पाये…”। वाकई एक दौर में गंगा वैसी ही थी। लेकिन; बहुआयामी उपयोगिता व गहन धार्मिक आस्था के बावजूद हम मनुष्यों के पापपूर्ण कृत्यों के चलते माँ गंगा आज प्रदूषण की गहरी मार झेल रही है। आइए भूल सुधारें और हम सब भारतवासी कलिमल हारिणी मां गंगा की शुद्धि व सुरक्षा के लिए संकल्पबद्ध होकर पूरे मन से प्रयास करें तभी गंगा दशहरा का पर्व मनाना सार्थक होगा।

हंसवाहिनी माँ गायत्री के प्रादुर्भाव का शुभ दिवस
शास्त्र कहते हैं कि समूचे सनातन ज्ञान विज्ञान की अधिष्ठात्री हंसवाहिनी माँ गायत्री का प्रादुर्भाव ‘ज्येष्ठ’ माह के शुक्ल पक्ष की पावन दशमी तिथि को हुआ था। बीसवीं सदी के गायत्री महाविद्या के महामनीषी पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में माँ गायत्री ने सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी के समक्ष प्रकट होकर मंत्र रूप में गायत्री का तत्वदर्शन प्रकट किया था; जिसके बाद ब्रह्मा जी ने गायत्री मंत्र की व्याख्या के रूप में अपने चारों मुखों से चारो वेदों की रचना की थी। इसीलिए गायत्री मंत्र को वेदों का सार माना जाता है। ज्ञात हो कि गायत्री मंत्र का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद के तृतीय मंडल में मिलता है। यह महामंत्र यजुर्वेद के मन्त्र ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ और ऋग्वेद के ३,६२,१० वें छन्द तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गोदेवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्। के संयोजन से बना है। इस मंत्र में सविता देवता की उपासना है। इसलिए इसे सावित्री भी कहा जाता है। ऋषि मनीषा कहती है कि गायत्री अर्थात गय ( प्राण तत्व) और त्रय (त्राण यानी मुक्त) करने वाले इस महामंत्र के तत्वदर्शन के चिंतन के साथ जप से ईश्वर की प्राप्ति होती है। इस महामंत्र का हिन्दी में भावार्थ है- उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

शास्त्रीय उद्धरण बताते हैं कि आरंभ में गायत्री सिर्फ देवताओं तक सीमित थी। लेकिन; जिस प्रकार राजा भगीरथ कठोर तप से गंगा मैया को स्वर्ग से धरती पर उतार लाए थे, ठीक उसी तरह क्षत्रिय विश्वरथ से ब्राह्मणत्व ग्रहण करने वाले महामुनि विश्वामित्र अपनी दुर्धर्ष तपश्चर्या के बल पर ज्ञान गंगा की अधिष्ठात्री माँ गायत्री को देवताओं तक सीमित न रहने देकर भूलोकवासियों के कल्याण के लिए धराधाम पर उतार लाये और मां गायत्री की महिमा अर्थात गायत्री मंत्र के तत्वज्ञान को सर्वसाधारण तक पहुंचाया। ऋषि विश्वामित्र के अनुसार गायत्री से बढ़कर पवित्र करने वाला मंत्र और कोई नहीं है। जो मनुष्य नियमित रूप से गायत्री का जप करता है वह पापों से वैसे ही मुक्त हो जाता है जैसे केंचुली से छूटने पर सांप होता है। श्रीमद्भागवद्गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण का यह कथन कि मन्त्रों में मैं ‘गायत्री’ हूं; इसकी महत्ता को स्वयं प्रमाणित करता है। उपनिषदों के ऋषि कहते हैं कि भारतीय धर्म के ज्ञान विज्ञान का मूल स्रोत होने के कारण गायत्री सर्वोत्तम गुरुमंत्र भी है। इसीलिए गायत्री को “ज्ञान गंगा” भी कहा जाता है।

आधुनिक युग के विश्वामित्र माने जाने वाले गायत्री महाविद्या के महासाधक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य अपने ग्रन्थ ‘गायत्री महाविज्ञान’ में लिखते हैं कि चारों वेदों का ज्ञान लेने के बाद जिस पुण्य की प्राप्ति होती है अकेले गायत्री मंत्र को समझने मात्र से चारों वेदों का ज्ञान मिलता जाता है। चारों वेद, शास्त्र और श्रुतियां सभी गायत्री से ही पैदा हुए माने जाते हैं। वेदों की उत्पति के कारण इन्हें ‘वेदमाता’ कहा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं की आराध्या होने के कारण इन्हें ‘देवमाता’ कहा जाता है तथा समूचे विश्व के समस्त ज्ञान-विज्ञान का मूल आधार होने के कारण इन्हें ‘विश्वमाता’ कहा जाता है। महाभारत के रचयिता वेद व्यास जी ‘गायत्री महिमा’ में लिखते हैं, ‘’ जैसे फूलों में शहद तथा दूध में घी सार रूप में उपस्थित होता है; वैसे ही समस्त वेदों का सार गायत्री है। यदि गायत्री को सिद्ध कर लिया जाए तो यह कामधेनु (मनोकामना पूर्ण करने वाली गोमाता) के समान मनुष्य की समस्त वांछित मनोकामनाओं को सहज ही पूर्ण कर देती है। जिस प्रकार माँ गंगा शरीर के पापों को धो कर तन मन को निर्मल कर देती हैं, उसी प्रकार गायत्री रूपी ज्ञानगंगा में स्नान कर जीव की आत्मा पवित्र हो जाती है।

Topics: Ganga and Gayatriज्येष्ठ शुक्ल दशमीसनातन वैदिक संस्कृतिGanga and Gayatri coming together on earthSanatan Vedic cultureGoddess Ganga
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