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अलगाववादी और खालिस्तान समर्थकों का सांसद चुना जाना, लोकतंत्र की जय या राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा? उठ रहे कई प्रश्न

लोकतंत्र की जीत का दावा तो ठीक, परंतु राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिकों की सुरक्षा या साथी नेताओं की सुरक्षा का क्या? क्या वे उन संवेदनशील दस्तावेजों का दुरुपयोग तो नहीं करेंगे, जिनपर उनकी पहुंच एक सांसद होने के नाते होगी?

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jun 5, 2024, 06:22 pm IST
inभारत, विश्लेषण

2024 के लोकसभा चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं और अप्रत्याशित परिणाम भी आ चुके हैं। परंतु उनमें से भी जो कुछ अप्रत्याशित परिणाम आए हैं, वे हैं कश्मीर के बारामूला से इंजीनियर रशीद शेख, पंजाब से फरीदकोट से सरबजीत सिंह खालसा एवं खडूर साहिब से अमृतपाल सिंह की जीत। इन तीनों की विचारधारा भारत विरोधी है। ये तीनों ही निर्दलीय जीते हैं और अब वे भारत की संसद में बात रखेंगे।

पहले बात बारामूला की। शेक्सपियर ने कहा था कि “नाम में क्या रखा है?” मगर कश्मीर का वराहमूल, या बाद में वरमूल जब बारामूला हो जाता है तो वहां की जनता किसी अब्दुल रशीद शेख को अपना नेता चुन कर भारत की संसद मे भेजने का फैसला करती है। अब्दुल रशीद कोई साधारण व्यक्ति नहीं है, अब्दुल रशीद जेल में बंद है और वह किसी साधारण अपराध के लिए नहीं, बल्कि आतंकी गतिविधियों के कारण जेल में बंद है। उसे वर्ष 2019 में एनआईए ने यूएपीए के अंतर्गत गिरफ्तार किया था। उसने और किसी को नहीं बल्कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला को हराया है। रशीद दो बार विधायक रह चुका है। और अब टेरर फन्डिंग के आरोपों में दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है। उसके जेल में रहने के कारण उसके बेटों ने चुनावी कमान संभाली थी और जनता से संपर्क किया था। रशीद की जीत सरकार के लिए इस बात को लेकर बहुत बड़ी चुनौती है कि वह कैसे क्षेत्र में अलगाव वाली मानसिकता से निपटेगी।

सरबजीत सिंह खालसा

फरीदकोट पंजाब से भी विजयी सरबजीत सिंह खालसा की सोच भारत के प्रति घातक है। वह और कोई नहीं बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कातिल बेअंत सिंह का बेटा है। उसने भी निर्दलीय जीत हासिल की है और उसे कुल 23.38 प्रतिशत मत प्राप्त हुए हैं। खालसा परिवार अपने खालिस्तानी विचारों के लिए कुख्यात है।  गौर करने वाली बात यह है कि सरबजीत सिंह ने आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार करमजीत सिंह अनमोल को हराया है और यह वही आम आदमी पार्टी है, जिस पर खालिस्तानियों को खुलेआम समर्थन देने का आरोप बार-बार लगता है। ऐसे में क्या यह समझा जाए कि अब खालिस्तान के समर्थक किसी और को समर्थन न देकर अपने खुद के प्रत्याशी उतारने आरंभ कर दिए हैं? सरबजीत की जीत भी देश की एकता और अखंडता के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है।

अमृतपाल सिंह

वर्तमान में डिब्रूगढ़ की जेल में बंद अमृतपाल सिंह एनएसए अर्थात राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया है। उसने जेल से ही चुनाव लड़ा और 38.62 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। अमृतपाल ‘वारिस पंजाब दे’ संगठन का प्रमुख है, जिसका उद्देश्य खालिस्तान की स्थापना करना है। उसका नाम अचानक से तब सुर्खियों में आया था, जब उसने अपने साथी को छुड़ाने के लिए थाने पर हमला बोल दिया था और हिंसा की थी। अमृतपाल का कहना है कि वह शांतिपूर्ण तरीके से खालिस्तान की मांग कर रहा है। मगर उसने खालिस्तान की मांग पर अपने साथी को नहीं छुड़ाया था। उस पर और उसके साथी लवप्रीत पर यह आरोप एक व्यक्ति बरिंदर सिंह ने लगाया था कि उसे अमृतपाल के साथियों ने अगवा किया था और उसकी पिटाई की थी। इस पर उसने अजनाला में थाना घेर लिया था और जमकर हिंसा की थी।

इंजीनियर रशीद से लेकर अमृतपाल सिंह तक, जहां इन्हें चुने जाने की घटना भारत में सभी को स्वतंत्रता की बात को मजबूत करती है तो वहीं एक बहुत ही आधारभूत प्रश्न भी उठाती है कि क्या अलगावादी सोच रखने वालों को लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं का हिस्सा बनना चाहिए? क्या ऐसे लोग लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से चुनकर आकर फिर से उन्हीं गतिविधियों में तो लिप्त नहीं हो जाएंगे?

क्या वे उन संवेदनशील दस्तावेजों का दुरुपयोग तो नहीं करेंगे, जिनपर उनकी पहुंच एक सांसद होने के नाते होगी? उन्हें संसद और राष्ट्रपति भवन सहित अन्य गोपनीय स्थानों तक पहुंच उपलब्ध होगी, तो ऐसे में यह बहुत महत्वपूर्ण है कि क्या कनाडा में बैठे खालिस्तानियों और पाकिस्तान में आईएसआई तक ये संवेदनशील सूचनाएं नहीं पहुंचेगी? लोकतंत्र की जीत का दावा तो ठीक, परंतु राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिकों की सुरक्षा या साथी नेताओं की सुरक्षा का क्या? ये विजय कहीं भारत की अस्मिता के लिए ही तो खतरा नहीं हैं? इन जीतों से कई प्रश्न उठ खड़े हुए हैं।

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