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जनसंख्या विस्फोट के पीछे घुसपैठ

उत्तर प्रदेश और असम में अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे इलाकों में कुछ ही साल के अंदर मुस्लिमआबादी में बेतहाशा वृद्धि के प्रमाण ग्राम पंचायतों के ताजा आंकड़ों से सामने आ रहे हैं

Written byअनुरोध भारद्वाजअनुरोध भारद्वाज
May 30, 2024, 08:47 am IST
in विश्लेषण, उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश में इस प्रकार के दृश्य आम दिखते हैं

उत्तर प्रदेश में इस प्रकार के दृश्य आम दिखते हैं

उत्तर प्रदेश-बिहार के सीमावर्ती इलाकों के साथ उत्तराखंड, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर के कुछ विशेष भूभाग में एकपक्षीय जनसंख्या विस्फोट बड़े पैमाने पर घुसपैठ की ओर इशारा करता है। इस अप्रत्याशित जनसांख्यिकीय बदलाव के दुष्प्रभाव लगातार सामने आ रहे हैं। सीमावर्ती इलाकों में ही नहीं, दूसरे क्षेत्रों के साथ राजधानी दिल्ली तक अवैध एवं आपराधिक गतिविधियां बढ़ती नजर आ रही हैं। आगरा, मथुरा, गाजियाबाद, मेरठ में रोहिंग्या मुसलमानों के अड्डे पकड़े जा चुके हैं।

सीमांचल में अवैध मदरसे और मस्जिदों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी का स्याह सच भी किसी से छिपा नहीं है। सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की चिंता के बीच बड़ा सवाल यह है कि कुछ ही वर्षों में उ.प्र. से बिहार तक खास इलाकों में मुस्लिम आबादी की बेतहाशा बढ़ोतरी के पीछे कहीं कोई गहरा षड्यंत्र तो नहीं है?

एकपक्षीय जनसंख्या विस्फोट के खतरनाक प्रभाव कैसे होते हैं, इसे समझने के लिए पश्चिमी उ.प्र. में मुजफ्फरनगर जिले के गांव हुसैनपुर कलां के हालात समझने होंगे। एक साल पहले यह गांव तब चर्चा में आया था, जब गांव के जैन मंदिर से समाज के लोगों को भगवान चंद्रप्रभु जिनालय समोशरण मूर्तियों को हटाकर शहरीय आबादी के बीच बुढ़ाना कस्बे के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में स्थापित करने को मजबूर होना पड़ा। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि मिश्रित आबादी वाले हुसैनपुर कलां गांव में मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ते-बढ़ते 80 फीसदी से अधिक हो गई और अपनी-अपनी चिंता में सभी जैन परिवार गांव से दूसरे स्थानों को पलायन कर गए। समाजवादी सरकार के शासन में कैराना में पलायन हो या फिर पश्चिमी उ.प्र. में भीषण सांप्रदायिक दंगे, वे कहीं न कहीं एकपक्षीय जनसंख्या विस्फोट के ही परिणाम माने जाते हैं।

जनसांख्यिक परिवर्तन का नमूना

महाराष्ट्र में मुंबई से लगभग 50 किलोमीटर दूर भिवंडी के पास एक जुड़वां गांव है-पडघा-बोरीवली। पडघा हिंदू बहुल है, जबकि बोरीवली मुस्लिम बहुल। जनसांख्यिक परिवर्तन का एक नमूना देखिए। जिहादियों ने इस गांव को न केवल ‘आजाद’ घोषित कर रखा था, बल्कि वहां आईएसआईएस का महाराष्ट्र मॉड्यूल आधार भी बना रखा था। आतंकियों की योजना मुंबई सहित देश के कई बड़े शहरों में आतंकी हमले की थी। इस आतंकी मॉड्यूल का सरगना साकिब नाचन था, जो मुंबई बम धमाके में 10 साल की सजा काट चुका है। एनआईए के अधिकारियों के अनुसार, यहां ‘बयाथ’ चलता था, यानी देशभर से नए आतंकियों की भर्ती की जाती थी। नाचन आतंकियों को ड्रोन चलाने चलाने का प्रशिक्षण देता था। एनआईए, महाराष्ट्र पुलिस और महाराष्ट्र एटीएस के 400 जवानों ने पडघा-बोरीवली में छापा मार कर भारी मात्रा में हथियार, नकदी, डिजिटल उपकरण, हमास के झंडे आदि जब्त किए थे। एनआईए ने बोरीवली-पडघा, ठाणे, मीरा रोड व पुणे तथा कर्नाटक के बेंगलुरु सहित 44 ठिकानों पर छापेमारी कर जिन 15 आतंकियों को गिरफ्तार किया था, वे अपने विदेशी आकाओं के संपर्क में थे और उन्हीं के निर्देश पर आईईडी बनाने सहित विभिन्न, आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने की फिराक में थे।

स्थानीय स्तर पर खुलेआम यह बात सुनने को मिलती है कि सीमापार से घुसपैठ कर आने वाले बाहरी लोग पहले अपने परिचितों के यहां चोरी-छिपे पनाह लेते हैं, फिर धीरे-धीरे सरकारी जमीन पर कब्जा और जोड़तोड़ से जरूरी कागजात बनवा लेते हैं। वे सरकारी योजनाओं का लाभ लेते हैं और मूल निवासियों के हितों पर डाका डालते हैं। बिहार के सीमांचल में आने वाले चार जिलों अररिया, कटिहार, किशनगंज और पूर्णिया की यही कहानी है।

पश्चिम बंगाल और नेपाल की सीमा सीमांचल के जिलों से जुड़ती है। इन जिलों में बांग्लादेश से आए मुसलमानों की बहुत बड़ी आबादी है। घुसपैठ शुरू से इस क्षेत्र में मुद्दा रही है। 2011 की जनगणना में सीमांचल में मुस्लिम आबादी 47 प्रतिशत, बिहार में औसत मुस्लिम आबादी 17 प्रतिशत और भारत में औसत 14 प्रतिशत दर्ज हुई थी। अब हालात बिलकुल बदल गए हैं। किशनगंज जिले को ही देखें, जहां अब 70 फीसदी से भी अधिक मुस्लिम आबादी बताई जाती है। यहां के दूसरे जिलों के हालात भी इसी ओर जाते दिख रहे हैं।

बिहार में सीमांचल क्या, उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिले पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बहराइच, श्रावस्ती, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर और महराजगंज के सीमाई ग्रामों में जनसंख्या वृद्धि की कहानी भी राज्य के दूसरे हिस्सों के मुकाबले बेहद चिंताजनक हो चुकी है। 116 ऐसे गांव सामने आए हैं, जहां मुसलमानों की जनसंख्या कुछ ही साल में बढ़कर 50 प्रतिशत से ज्यादा हो चुकी है। 303 गांवों में मुसलमानों की जनसंख्या 30 से 50 प्रतिशत के बीच पहुंच चुकी है।

इन सीमावर्ती जिलों में मस्जिदों और मदरसों की संख्या अप्रैल 2018 से लेकर मार्च 2022 तक ही 25 प्रतिशत बढ़ने के प्रमाण सामने आए हैं। 2018 में यहां 1,349 मस्जिदें और मदरसे थे, जो अब बढ़कर 1700 ये अधिक हो गए हैं। सीमांत क्षेत्रों में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ने को सीधे तौर पर सीमा पार से घुसपैठ से ही जोड़कर देखा जा रहा है। बताने की जरूरत नहीं है कि बाहर से आकर बसने वाले अधिकांश मुस्लिम ही होते हैं। ऐसे में जनसंख्या असंतुलन का कारण भी वही माने जाते हैं।

सीमावर्ती क्षेत्रों की चिंता के बीच पश्चिमी उ.प्र. के मथुरा, हापुड़, मेरठ, सहारनपुर और गाजियाबाद जिलों में रोहिंग्या घुसपैठ का सच सुरक्षा एजेंसियों की चिंता का बड़ा कारण बन चुका है। एटीएस, एसटीएफ की छापेमारी में बड़ी संख्या में रोहिंग्या घुसपैठिये पकड़े भी गए हैं। पश्चिमी उ.प्र. के अधिकांश जिले आतंकी एवं राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को लेकर शुरू से संवेदनशील रहे हैं।

उत्तर प्रदेश और असम में अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे इलाकों में कुछ ही साल के अंदर मुस्लिम आबादी में बेतहाशा वृद्धि के प्रमाण ग्राम पंचायतों के ताजा आंकड़ों से भी सामने आ रहे हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में इस तरह से जनसांख्यिक परिवर्तन सिर्फ आबादी बढ़ने का मसला नहीं, बल्कि इसके पीछे भारत में घुसपैठ का नया डिजाइन माना जा रहा है, जो कि पूरे देश की सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। बांग्लादेश से लगते असम के जिले धुबरी, करीमगंज, दक्षिण सलमारा और कछार में मुस्लिम आबादी 32 प्रतिशत तक बढ़ने की बात सामने आ चुकी है।

Topics: जनसांख्यिक परिवर्तनपश्चिम बंगालDemographic Changeरोहिंग्या मुसलमानRohingya MuslimsWest Bengalनेपाल सीमाNepal Borderपाञ्चजन्य विशेष
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