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होम भारत

जिद से जीत तक

श्रीराम जन्मभूमि पर विवाद उत्पन्न करने से जुड़े कुछ अल्पज्ञात पहलू

Written byडॉ. संतोष कुमार तिवारीडॉ. संतोष कुमार तिवारी
Jan 17, 2024, 08:07 am IST
in भारत, विश्लेषण, उत्तर प्रदेश, धर्म-संस्कृति
लंबी लड़ाई के बाद अयोध्या में बनकर तैयार है श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य एवं विशाल मंदिर

लंबी लड़ाई के बाद अयोध्या में बनकर तैयार है श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य एवं विशाल मंदिर

वाल्मीकि रामायण, स्कंद पुराण सहित अन्य पौराणिक ग्रंथों के कारण हिंदुओं का विश्वास है कि वह जगह राम का जन्मस्थान है। धार्मिक ग्रंथों की बातों को आधारहीन नहीं कहा जा सकता। रामचरितमानस और आइन-ए-अकबरी में अयोध्या को धार्मिक स्थल बताया गया है।

डॉ. संतोष कुमार तिवारी

अयोध्या में विवादित ढांचे का क्षेत्रफल मात्र 1500 वर्ग गज ही था। 9 नवंबर, 2019 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के पृष्ठ 922 पर 1500 वर्ग गज भूमि का ही उल्लेख है। श्रीराम जन्मभूमि पर अपने मालिकाना हक के बारे में मुस्लिम पक्ष सर्वोच्च न्यायालय को संतुष्ट नहीं कर पाया था। फिर भी इस निर्णय से मुस्लिम पक्षकारों को मालिकाना हक के साथ 5 एकड़ जमीन मिली है, जबकि बाबर या औरंगजेब, जिस किसी ने भी राम जन्मभूमि पर अपना ढांचा खड़ा करने का प्रयास किया, मुसलमानों को उस स्थान का मालिकाना हक कभी नहीं दिया था। बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेज सरकार ने भी मुसलमानों को कभी उस जमीन का मालिकाना हक नहीं दिया था। बहरहाल, उसके रखरखाव के लिए कुछ राशि दी जाती थी। वह सरकार की जमीन थी, न कि वक्फ की। वहां मुसलमानों का शांतिपूर्ण कब्जा कभी रहा ही नहीं।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में पृष्ठ संख्या 637 पर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल के निर्णय का जिक्र है। इसमें उन्होंने कहा था कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि विवादित ढांचे के भीतरी और बाहरी स्तंभों पर आकृतियां बनी हुई हैं। कुछ जगहों पर वे हिंदू देवी-देवता जैसी लगती हैं। अपने निर्णय में पृष्ठ संख्या 900-901 पर शीर्ष अदालत ने कहा कि मुस्लिम पक्ष ऐसा कोई प्रमाण नहीं दे सका, जिससे यह साबित हो सके कि मस्जिद बनने के बाद 1856-57 तक (अर्थात् 325 वर्ष के कालखंड में) वहां नमाज पढ़ी जाती थी।

के.के. मुहम्मद अपनी पुस्तक में कहते हैं-

‘‘नरमपंथी मुस्लिम बाबरी मस्जिद हिंदुओं को सौंपकर समस्या का समाधान करने के लिए तैयार थे, पर किसी में खुलकर यह कहने की हिम्मत नहीं थी।’’
वह आगे लिखते हैं, ‘‘कट्टरपंथी मुस्लिम गुट की मदद के लिए कुछ वामपंथी इतिहासकार आगे आए और बाबरी मस्जिद नहीं छोड़ने का सुझाव दिया। वास्तव में उन्हें यह मालूम नहीं था कि वे कितना बड़ा पाप कर रहे हैं। …(इन) इतिहासकारों ने ‘रामायण’ के ऐतिहासिक तथ्यों पर ही सवाल खड़े कर दिए और कहा कि 19वीं सदी के पहले मंदिर तोड़ने का साक्ष्य नहीं है। …(इनमें से) कई इतिहासकार बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के विशेषज्ञ के रूप में कई बैठकों में शामिल हुए थे।’’

1856-57 से 16 दिसंबर, 1949 तक वहां जुमे की नमाज पढ़ी तो जाती थी, पर इसमें बीच-बीच में व्यवधान भी आते रहे। अंतिम बार जुमे की नमाज 16 दिसंबर, 1949 को पढ़ी गई। 1856-57 और 1934 में इन्हीं विवादों को लेकर साम्प्रदायिक दंगे भी हुए थे। वहीं, पृष्ठ 46 पर कहा गया है कि 1856-57 के दंगों के बाद अंग्रेज सरकार ने वहां शांति बनाए रखने के लिए एक दीवार खड़ी कर दी थी। लेकिन इससे भी शांति नहीं हो सकी। 1934 के दंगे में विवादित ढांचे के गुंबद का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था। निहंग सिखों ने ‘मस्जिद’ में घुसकर झंडा गाड़ने के साथ वहां हवन-पूजा भी की थी।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि वाल्मीकि रामायण, स्कंद पुराण सहित अन्य पौराणिक ग्रंथों के कारण हिंदुओं का विश्वास है कि वह जगह राम का जन्मस्थान है। धार्मिक ग्रंथों की बातों को आधारहीन नहीं कहा जा सकता। रामचरितमानस और आइन-ए-अकबरी में अयोध्या को धार्मिक स्थल बताया गया है। साथ ही, अदालत ने अपने निर्णय में विलियम फिंच, जोसफ टेफेनथेलर आदि विदेशी यात्रियों के यात्रा वृत्तांतों, ईस्ट इंडिया गेजेटियर आफ वाटर हैमिल्टन सहित अन्य ऐतिहासिक साक्ष्यों को भी आधार बनाया। तमाम पुराने सरकारी दस्तावेजों में ‘मस्जिद’ को ‘मस्जिद जन्मस्थान’ कहा गया है। श्रीराम जन्मभूमि पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय एक हजार से अधिक पृष्ठों का है। निर्णय के अंग्रेजी में होने के कारण देश की अधिकांश आबादी इसे पढ़ने में सक्षम नहीं है। इस कारण इसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है, जिसमें कुछ विदेशी शक्तियां भी शामिल हैं।

नायर का अविस्मरणीय योगदान

1949 में फैजाबाद के उपायुक्त और जिला मजिस्ट्रेट के.के. नायर को राज्य सरकार की ओर से विवादित स्थल से भगवान की मूर्तियां हटाने का आदेश मिला। लेकिन नायर ने आदेश मानने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसा करने पर वहां खून-खराबा हो जाएगा। स्थिति बिगड़ जाएगी। (सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय, पृष्ठ-76)

उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत थे और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे। उस समय पूरे देश में कांग्रेस की तूती बोलती थी। किसी अधिकारी द्वारा ऊपर से आए आदेश को मानने से इनकार करना बहुत साहस का काम था। नायर के इनकार के कारण नेहरू और राज्य सरकार भी बहुत नाराज थी। उन्हें निलंबित कर दिया गया। नायर ने मुकदमा लड़ा और जीत गए। नौकरी पर वापस लौटे, लेकिन वह कांग्रेस सरकार की आंखों का कांटा बन चुके थे। बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की और आगे चल कर जनसंघ में शामिल हो गए। देश उनके साहसपूर्ण और अमूल्य योगदान को कभी नहीं भूल पाएगा।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय

निर्णय सुनाने से पहले शीर्ष अदालत ने दोनों पक्षों को सुलह-समझौते का पूरा मौका दिया था। मार्च 2019 को सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति फकीर मोहम्मद इब्राहीम कलीफुल्ला की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति भी गठित की थी, ताकि बातचीत के जरिए मुद्दे को सुलझाया जा सके। समिति के दो अन्य सदस्य थे—श्री श्री रवि शंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पांचू। हालांकि देश के नरमपंथी मुसलमान शुरू से ही समझौते के पक्ष में थे, लेकिन कथित सेकुलर इतिहासकार इसमें टांग अड़ाते रहे। जब यह मुकदमा इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में था, तब भी बातचीत से इस विवाद का हल नहीं निकला। अंत में उच्च न्यायालय को 2010 में निर्णय सुनाना पड़ा। इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी।

उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय के बिंदु संख्या 3623 और 3624 में मुस्लिम पक्ष के कुछ गवाहों द्वारा प्रकाशित एक पुस्तिका पर कहा था कि इस प्रकार के संवेदनशील मसलों पर समुचित शोध किए बिना कोई चीज छापने से जनता के आपसी मैत्रीपूर्ण संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। साथ ही, न्यायालय ने आश्चर्य किया कि इस प्रकार के प्रकाशन को उन लोगों ने लिखा है, जो इतिहासकार या पुरातत्वविद् होने का दावा करते हैं।

‘‘मेरे विभाग में जिन लोगों की दादागिरी चलती थी, वे मुझे पसंद नहीं करते थे। वे झूठे लोग थे और मैं उनको सलाम भी नहीं करता था। इस कारण मुझे पीएचडी में कभी दाखिला नहीं मिल पाया, जबकि मुझसे कम नंबर पाने वालों को न सिर्फ दाखिला दिया गया, बल्कि छात्रवृत्ति भी दी गई।’’

– के.के. मुहम्मद , अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग

मीडिया की संदिग्ध भूमिका

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आने से लगभग एक माह पहले अंग्रेजी अखबार टाइम्स आफ इंडिया ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के अध्यक्ष के पत्र को आधार बनाकर मोटे शीर्ष में समाचार प्रकाशित किया। इस पत्र में कहा गया था कि के.के. मुहम्मद भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (एएसआई) की उस टीम के सदस्य नहीं थे, जिसने 1976-77 में अयोध्या में विवादित स्थल का उत्खनन किया था। जबकि बी.बी. लाल के नेतृत्व वाली इस टीम में के.के. मुहम्मद एकमात्र मुस्लिम सदस्य थे। इससे पहले इसी अखबार ने एएसआई (उत्तर) के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक के.के. मुहम्मद का साक्षात्कार प्रकाशित किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि बाबरी ढांचे के नीचे भगवान विष्णु का एक बड़ा मंदिर था। बहरहाल, एएसआई के पूर्व महानिदेशक बी.बी. लाल ने समाचार का खंडन करते हुए उक्त अखबार को एक ईमेल भेजा था कि के.के. मुहम्मद उस समय उनकी टीम के सदस्य थे।

के.के. मुहम्मद की पुस्तक ‘मैं हूं भारतीय’ (प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018) में ‘अयोध्या: कुछ ऐतिहासिक तथ्य’ नाम से एक अध्याय है। इसमें उन्होंने लिखा है, ‘‘प्रो. बी.बी. लाल के नेतृत्व में अयोध्या उत्खनन टीम में ‘दिल्ली स्कूल आफ आर्कियोलॉजी’ से मैं एक सदस्य था। जब मैं उत्खनन के लिए वहां पहुंचा, तब बाबरी मस्जिद की दीवारों में मंदिर के स्तंभ थे। स्तंभ के निचले हिस्से में 11वीं व 12वीं शताब्दी के मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बनाए गए थे। मंदिर कला में पूर्ण कलश 8 ऐश्वर्य चिह्नों में से एक है। 1992 में बाबरी विध्वंस से पहले हमने एक या दो नहीं, बल्कि 14 स्तंभों को देखा है।’’

कथित इतिहासकार बने बाधा

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर एएसआई ने 2003 में विवादित स्थल का ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (जीपीआर) तकनीक से सर्वेक्षण किया था। डॉ. हरि मांझी और डॉ. बी.आर. मणि की देखरेख में संपन्न इस सर्वेक्षण की वीडियोग्राफी भी की गई थी। सर्वेक्षण टीम में गुलाम सईउद्दीन ख्वाजा, अतिक-उर-रहमान सिद्दिकी, जुल्फिकार अली, ए.ए. हाशमी जैसे मुस्लिम पुरातत्वविद् भी थे। इसमें मस्जिद के नीचे 17 पंक्तियों में 85 खंभों का पता चला। प्रत्येक पंक्ति में पांच खंभे थे और सभी हिंदू धर्म से संबंधित थे। मस्जिद की अपनी कोई नींव नहीं थी। उसका निर्माण पूर्व स्थित संरचना पर किया गया था। (सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय, पृष्ठ-905) यानी विवादित ढांचा के नीचे एक विशाल विष्णु मंदिर था।

के.के. मुहम्मद अपनी पुस्तक में कहते हैं, ‘‘नरमपंथी मुस्लिम बाबरी मस्जिद हिंदुओं को सौंपकर समस्या का समाधान करने के लिए तैयार थे, पर किसी में खुलकर यह कहने की हिम्मत नहीं थी।’’ वह आगे लिखते हैं, ‘‘कट्टरपंथी मुस्लिम गुट की मदद के लिए कुछ वामपंथी इतिहासकार आगे आए और बाबरी मस्जिद नहीं छोड़ने का सुझाव दिया। वास्तव में उन्हें यह मालूम नहीं था कि वे कितना बड़ा पाप कर रहे हैं। …(इन) इतिहासकारों ने ‘रामायण’ के ऐतिहासिक तथ्यों पर ही सवाल खड़े कर दिए और कहा कि 19वीं सदी के पहले मंदिर तोड़ने का साक्ष्य नहीं है। …(इनमें से) कई इतिहासकार बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के विशेषज्ञ के रूप में कई बैठकों में शामिल हुए थे।’’

विक्रमादित्य युग का था राम मंदिर

मुकदमे के दौरान राम जन्मभूमि पक्ष की ओर से कहा गया कि विवादित ढांचे की जगह महाराजा विक्रमादित्य के समय से एक मंदिर था। इसके कुछ हिस्से को बाबर के सेनापति मीर बाकी ने तोड़कर ‘मस्जिद’ बनवाने का प्रयास किया था। इसमें उसने उसी मंदिर के खंभे आदि इस्तेमाल किए। ये खंभे काले कसौटी पत्थर के थे और उन पर हिंदू देवी-देवताओं की आकृतियां उकेरी हुई थीं। इस निर्माण कार्य का बहुत विरोध हुआ।

हिंदुओं ने कई बार लड़ाइयां लड़ीं, जिनमें कई लोगों की जान भी गई। इस सब के कारण वहां मस्जिद की मीनार कभी नहीं बन सकी और वजू के लिए पानी का प्रबंध भी कभी नहीं हो सका। (सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय, पृष्ठ-102) मंदिर निर्माण के लिए राम जन्मभूमि परिसर के समतलीकरण के दौरान बड़ी संख्या में प्राचीन मंदिर के अवशेष मिले हैं। इनमें कलश, एक दर्जन से ज्यादा मूर्ति युक्त पाषाण स्तंभ, देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां, नक्काशीदार शिवलिंग, प्राचीन कुआं और चौखट आदि शामिल हैं।

उन्होंने लिखा है कि एक समय ऐसा भी था, जब बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की बैठकें (भारत सरकार के) भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के कार्यालय में होती थीं। परिषद के तत्कालीन सदस्य सचिव एवं इतिहासकार प्रो. एम.जी.एच. नारायण ने इसका विरोध भी किया था, लेकिन इसे अनसुना कर दिया गया। आईसीएचआर में विवाद का समाधान चाहने वाले लोग थे, लेकिन वे असहाय थे। स्वतंत्र विचार प्रकट करने वालों को साम्प्रदायिक कहा जाता है।

सच बोलने के लिए पद्मश्री के.के. मुहम्मद को नौकरी से निलंबित करने की धमकी दी गई। उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलती रहीं, इस कारण सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्हें पुलिस सुरक्षा मिली हुई है। के.के. मुहम्मद से यह पूछने पर कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में 10 वर्ष तक सहायक पुरातत्वेत्ता रहने के बावजूद उन्होंने वहां से पीएचडी क्यों नहीं की, इस पर उनका जवाब था, ‘‘मेरे विभाग में जिन लोगों की दादागिरी चलती थी, वे मुझे पसंद नहीं करते थे। वे झूठे लोग थे और मैं उनको सलाम भी नहीं करता था। इस कारण मुझे पीएचडी में कभी दाखिला नहीं मिल पाया, जबकि मुझसे कम नंबर पाने वालों को न सिर्फ दाखिला दिया गया, बल्कि छात्रवृत्ति भी दी गई।’’

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