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बोए पेड़ बबूल का…

पाकिस्तान का दुष्चक्र देखने लायक है। जो भी व्यक्ति वहां प्रधानमंत्री बनता है, और ऐसे कम से कम छह प्रकरण बहुत स्पष्ट हैं, वह किसी न किसी आरोप में फंस जाता है

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
May 15, 2023, 05:35 pm IST
in भारत, विश्व, सम्पादकीय

भ्रष्टाचार के आरोपों में सच्चाई है या नहीं। सच यह है कि हर प्रधानमंत्री को पता होता है कि वह जैसे ही सत्ता छोड़ेगा, अगली सत्ता सीधे उसकी गर्दन की तरफ बढ़ेगी। लिहाजा वह अपने सत्ता के बाद के जीवन के लिए लंदन, दुबई जैसे स्थानों पर अपना दूसरा ठिकाना बना लेता है। जनरल परवेज मुशर्रफ तो सैनिक तानाशाह रहे होने के बावजूद सत्ता छोड़ने के बाद पाकिस्तान में नहीं रह सके। इससे जाहिर होता है कि पाकिस्तान किस तरह के मत्स्य न्याय के तहत जीता रहा है।

पाकिस्तान के संदर्भ में यही बात अब प्रकट है। आज की स्थिति में पाकिस्तान सिर्फ घोर अराजकता का शिकार नहीं है, बल्कि वह एक राष्ट्र के रूप में अराजकता से निबट सकने की अपनी क्षमता भी खो चुका है। यह क्षमता उसके पास पहले भी कभी नहीं थी । डॉक्ट्रिन आफ नेसेसिटी, बेसिक डेमोक्रेसी, एनआरओ, प्रोविजनल कॉन्स्टिट्यूशन, एनएबी जैसे कागज रचकर जिस देश की हुकूमत चलती रही हो, उस देश में किसी भी व्यवस्था के टिके रहने की कल्पना करना ही कठिन था।

संगीन की नोक पर राष्ट्र नहीं चला करते, और पाकिस्तान संगीन की नोक को ‘एस्टेब्लिशमेंट’ मानता रहा! सिर्फ सत्ता और स्वार्थ की खातिर, हिंसा की धमकी के बूते, विदेशियों के सहयोग से, विदेशी साम्राज्यवादियों की इच्छाओं के अनुरूप एक देश का सीमांकन कर लिया गया और उसे दीन का किला (Citadel of Islam) बताकर पेश किया गया। इसके आगे क्या हुआ, इसके विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है।

पाकिस्तान का दुष्चक्र देखने लायक है। जो भी व्यक्ति वहां प्रधानमंत्री बनता है, और ऐसे कम से कम छह प्रकरण बहुत स्पष्ट हैं, वह किसी न किसी आरोप में फंस जाता है। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्रियों में से एक को फांसी हो चुकी है, दो (लियाकत अली खान और बेनजीर भुट्टो) को गोली से उड़ाया जा चुका है। शेख मुजीब को सत्ता ही नहीं दी गई और भ्रष्टाचार के आरोप में नवाज शरीफ को देश छोड़ने के लिए मजबूर किया जा चुका है। पांच प्रधानमंत्री सत्ता से उतरने के बाद गिरफ्तार हो चुके हैं।

प्रश्न यह नहीं है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में सच्चाई है या नहीं। सच यह है कि हर प्रधानमंत्री को पता होता है कि वह जैसे ही सत्ता छोड़ेगा, अगली सत्ता सीधे उसकी गर्दन की तरफ बढ़ेगी। लिहाजा वह अपने सत्ता के बाद के जीवन के लिए लंदन, दुबई जैसे स्थानों पर अपना दूसरा ठिकाना बना लेता है। जनरल परवेज मुशर्रफ तो सैनिक तानाशाह रहे होने के बावजूद सत्ता छोड़ने के बाद पाकिस्तान में नहीं रह सके। इससे जाहिर होता है कि पाकिस्तान किस तरह के मत्स्य न्याय के तहत जीता रहा है।

भविष्य में क्या होगा, यह भविष्य ही जानता है। लेकिन अगर पाकिस्तान की जनता, वहां के नेता, संस्थाएं और सेना अपने लोगों के लिए और अपनी जमीन के लिए जिम्मेदारी का थोड़ा भी भाव रखती हैं तो उन्हें सबसे पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी आंतरिक कलह किसी भी स्थिति में दूसरी शक्तियों को अवसर तलाशने का मौका न दे। अगर यह कसर भी पूरी हो जाती है तो यह विश्व इतिहास का एक अप्रतिम उदाहरण बनेगा। कहा जा रहा है कि कोई चमत्कार ही पाकिस्तान को बचा सकता है।

अब इस मत्स्य न्याय की कहानी थोड़ी आगे बढ़ गई है। वे मछलियां जो पहले किसी बड़ी मछली की जूठन खाकर गुजारा करने के लिए डॉक्ट्रिन आॅफ नेसैसिटी या मजबूरी का सिद्धांत ईजाद कर लेती थीं, वह भी अब स्वयं को मगरमच्छ मानने लगी हैं। इमरान खान को लगता है कि पाकिस्तान पर शासन करना उनका स्वाभाविक अधिकार है। सेना को लगता है कि एस्टेब्लिशमेंट होने के नाते हर प्रधानमंत्री को उसका सूबेदार ही होना चाहिए। अदालत को लगता है कि अगर रावलपिंडी पर्दे के पीछे से हुकूमत चला सकती है, तो वह भी किसी से कम नहीं है। लगातार महाशक्तियों का पिछलग्गू बने रहे पाकिस्तान को अधिकांश महाशक्तियां भी इसी दृष्टि से देखती हैं, जैसे वह उनके दरबार का पीछे का आंगन हो।

आतंकवाद की फैक्ट्री को पाकिस्तान ने औजार की तरह इस्तेमाल किया और अब सारी भीड़ को लगने लगा है कि ताकत के बूते लूट लेना-छीन लेना उनका भी स्वाभाविक अधिकार है। लोकतंत्र के स्वांग को आखिर कितनी पीढ़ियों तक स्वांग बना कर रखा जा सकता था? सेना की तानाशाही सिर्फ झूठे प्रचार से कब तक ढंकी रखी जा सकती थी? हालांकि अभी यह नहीं कहा जा सकता कि यह भांडा पूरी तरह फूट गया है, लेकिन पाकिस्तान के वर्तमान और भविष्य के लिए कोई अच्छे संकेत निश्चित रूप से नहीं बचे हैं। जो संकेत है, वह मात्र यह है कि अराजक तत्वों की भीड़ बहुत बड़ी हो जाने से वह राष्ट्र नहीं हो जाती, और राष्ट्र को दूर कर सिर्फ एक भौगोलिक क्षेत्र पर उनका दबदबा होने से वह कोई देश भी नहीं हो पाती है।

भविष्य में क्या होगा, यह भविष्य ही जानता है। लेकिन अगर पाकिस्तान की जनता, वहां के नेता, संस्थाएं और सेना अपने लोगों के लिए और अपनी जमीन के लिए जिम्मेदारी का थोड़ा भी भाव रखती हैं तो उन्हें सबसे पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी आंतरिक कलह किसी भी स्थिति में दूसरी शक्तियों को अवसर तलाशने का मौका न दे। अगर यह कसर भी पूरी हो जाती है तो यह विश्व इतिहास का एक अप्रतिम उदाहरण बनेगा। कहा जा रहा है कि कोई चमत्कार ही पाकिस्तान को बचा सकता है। लेकिन जिनके अतीत बहुत कपटपूर्ण कर्मों के रहे होते हैं, उन्हें या तो अपने कर्मों का फल भुगतना होता है या ऐसे चमत्कार की उम्मीद लगानी होती है, जो वास्तव में शायद ही होता हो।
@hiteshshankar

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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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