हिजाब विरोधी आन्दोलनों के बीच ईरान में मौत की सजा में 75% की वृद्धि! आरोप अलग परन्तु उद्देश्य?

मानवाधिकारों के लिए कार्य करने वाले दो समूहों ने अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया है कि ऐसा आम लोगों में डर फैलाने के लिए किया जा रहा है।

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सोनाली मिश्रा

ईरान में हिजाब विरोधी आन्दोलन के चलते वर्ष 2022 में मौत की सजा में 75% की वृद्धि हुई है। मानवाधिकारों के लिए कार्य करने वाले दो समूहों ने अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया है कि ऐसा आम लोगों में डर फैलाने के लिए किया जा रहा है। महसा अमीनी की मृत्यु के बाद ईरान में अनिवार्य हिजाब की नीति के चलते लोगों का विरोध बढ़ता जा रहा है और ईरान में आन्दोलनों की एक लहर पैदा हुई थी और बच्चियां एवं युवक भी इस आन्दोलन में शामिल हो गए थे।

कलाकारों से लेकर खिलाडियों तक इस अनिवार्य हिजाब की अन्यायपूर्ण नीति के विरोध में उतर आए थे। उसके बाद पूरे विश्व ने देखा कि कैसे फिर ईरान की सरकार द्वारा दमनचक्र चलाया गया और असंख्य लोगों को गिरफ्तार किया गया। उन्हें दंड दिया गया, यहाँ तक कि उन्हें अपने प्राण भी गंवाने पड़े। उन पर अनेक अत्याचार अभी तक हो रहे हैं। मसीह अलीनेजाद ने हुसैन होसेंपौर की तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि इनकी आँख हिजाब विरोधी आन्दोलन में चली गयी थी, क्योंकि उन्हें गोली लगी थी। उन्होंने अपने इन्स्टाग्राम पेज पर यह लिखा कि अधिकारी उन्हें आँखों का इलाज नहीं कराने दे रहे हैं,

और फिर हमने देखा कैसे उन लड़कियों की आवाज को दबाने के लिए उन्हें प्रताड़ित किया गया और बाद में यह भी पता चला कि लड़कियों को कैसे जहर तक दिया जा रहा है, जिससे स्कूल ही भेजने के लिए उनके अभिभावक डरने लगे। मगर अब तो और भी डराने वाला समाचार प्राप्त हुआ है। मानवाधिकारों के लिए कार्य करने वाले दो संगठनों ने यह रिपोर्ट की है कि ईरान में अब मृत्यु दंड की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है और पिछले वर्ष कम से कम 582 लोगों को मौत की सजा दी गयी। नॉर्वे आधारित ईरान ह्यूमेन राइट्स और पेरिस आधारित टुगेदर अगेंस्ट द डेथ पेनाल्टी ने यह रिपोर्ट बनाई है। ट्वीटर पर भी जो आंकडें हैं वह भी इन मृत्युदंड की पुष्टि करते हैं। आज ही यह समाचार आया है कि बुधवार को ईरान ने चार लोगों को बलात्कार एवं ड्रग सम्बंधित मामलों को लेकर फांसी दी है और यह संख्या पिछले सप्ताह दस हो गयी थी, जिन्हें फांसी दे दी गयी।

यह भी कहा जा रहा है कि चूंकि ईरान पर आन्दोलन को लेकर दबाव बढ़ रहा था और राजनीतिक कारणों से फांसी दी जाने को लेकर आलोचना हो रही थी, अत: अब बलात्कार और ड्रग्स को लेकर गिरफ्तारियां की जा रही हैं। अल-मॉनिटर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार मानवाधिकार समूहों का यह कहना है कि बलात्कार के मामलों में स्वीकारोक्ति अत्यंत अत्याचार के कारण इन आरोपियों द्वारा की जाती है और फिर इन्हें वकील भी उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भी ईरान में हर सप्ताह लगभग 10 लोगों को फांसी दे दी जाती है। चीन के बाद ईरान ऐसा देश है जहां पर फांसी की सजा सबसे ज्यादा दी जाती है।

एमनेस्टी इंटरनेश्नल के अनुसार यह भी कहा जा रहा है कि जिन लोगों को वहां पर फांसी दी जा रही है, वह अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हैं और उन्हें कई अजीबोगरीब मामलों में हिरासत में लिया गया है जैसे “धरती पर भ्रष्टाचार फैलाने के लिए” या “अल्लाह के खिलाफ दुश्मनी” आदि। ट्वीटर पर भी यदि देखते हैं तो पाते हैं कि लोग इंगित कर रहे हैं कि बलोच समुदाय के लोगों को फांसी दी जा रही है और बलोच जीनोसाइड हो रहा है।

एमनेस्टी इंटरनेश्नल की मार्च 2023 की एक रिपोर्ट के अनुसार जनवरी और फरवरी में ही कम से कम 94 लोगों को मौत के घाट उतारा है। इसके अनुसार ईरानी अधिकारियों ने 1 अहवाज़ी अरब, 14 कुर्दों और 13 बलूचों को भेदभाव पूर्ण तरीके से मुक़दमे चलाकर फांसी दे दी गयी।

एमनेस्टी के अनुसार “20 फरवरी को, एक अहवाज़ी अरब व्यक्ति, हसन अबयात, को खुज़ेस्तान प्रांत के सेपिदार जेल में मार दिया गया था, जबकि एक कुर्द व्यक्ति, अराश (सरकवत) अहमदी को 22 फरवरी को केरमानशाह प्रांत के डिज़ेल अबाद जेल में मार दिया गया था।“ यह भी कहा जा रहा है कि अपराधों को इनसे जबरन क़ुबूल करवाया गया और उस कुबूलनामे का प्रसारण सरकारी मीडिया पर करवाया गया। उन्हें कोई भी कानूनी सहायता नहीं दी गयी और उन्हें गुपचुप फांसी दे दी गयी। 6 और अहवाज़ी लोगों को फांसी देने से पहले की प्रक्रिया के रूप में क्वारांटीन में भेज दिया है। और लोगों का कहना है कि यह विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के लिए किया जा रहा है

वर्ष 2023 में अब तक लगभग 200 लोगों फांसी की सजा दी जा चुकी है। यह सजा आन्दोलनकारियों को दी जा रही है।

बलोच कैदियों को दी जा रही मौत की सजा को लेकर लगातार ट्वीटर पर मांग उठाई जा रही है।

परन्तु यहाँ पर यह बात समझ से परे है कि जब भी जाति की बात आती है तो इस्लाम के पैरोकार यह बात बार-बार कहते हैं कि हैं कि इस्लाम समानता की बात करता है, फिर अल्पसंख्यक की अवधारणा कैसे आ जाती है? सोशल मीडिया पर लोग यह कह रहे हैं कि मृत्युदंड लोगों की आवाज दबाने की चाल है। और 9 दिनों में ही 26 बलोच लोगों को फांसी दे दी गयी है

यहाँ तक कि महिलाओं को फांसी देने से परहेज नहीं किया जा रहा है। 30 अप्रैल को बिरजंद जेल में एक महिला को फांसी पर चढ़ा दिया गया है। ईरानी शासन में महिलाओं को सबसे अधिक फांसी दी जा रही है। ईरान की वीमेन कमिटी ऑफ नेशनल काउंसिल ऑफ रेसिस्टेंस ने एक सूची बनाई है, जिसमें वर्ष 2007 से लेकर अभी तक उन महिलाओं का नाम है, जिन्हें फांसी दे दी गयी थी। इस संस्था के अनुसार महिलाओं को फांसी देने के मामले में ईरानी शासन विश्व रिकॉर्ड धारी है और इनके अनुसार वर्ष 2007 से लेकर अब तक 210 महिलाओं को ईरानी शासन द्वारा फांसी दी जा चुकी है और मदीनेह सब्ज़ेबन की फांसी के बाद यह संख्या
बढ़कर 211 हो गयी है। उन्हें भी ड्रग के आरोपों के चलते फांसी दी गयी थी।

विरोधों के स्वर दबाने के लिए युवाओं से लेकर महिलाओं तक सभी की आवाज को दबाया जा रहा है।

मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर इनकी पीड़ा और वेदना तथ्यों के साथ उपस्थित हैं, परन्तु फिर भी कहीं न कहीं मौन की अजीब चादर पसरी हुई है। ठंडी चादर, ऐसी चादर, जिसने न जाने क्यों उन लोगों के मुंह सिले हुए हैं, जो निरंतर “जीवन के अधिकार” के लिए आवाज उठाते रहते हैं। क्या हर सप्ताह ईरानी शासन के हाथों मारे जाने वाले लोगों के जीवन के अधिकार पर इसी प्रकार मौन पसरा रहेगा?

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