समाज को दिशा देने वाला साहित्य होना चाहिए  :  राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर
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होम भारत बिहार

समाज को दिशा देने वाला साहित्य होना चाहिए  :  राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 26, 2023, 02:57 pm IST
in बिहार
दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन करते श्री राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर, साथ में हैं बाएं से श्री बालमुकुंद पांडे और श्री सुनील आंबेकर

दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन करते श्री राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर, साथ में हैं बाएं से श्री बालमुकुंद पांडे और श्री सुनील आंबेकर

साहित्य समाज का दर्पण होता है। साहित्य के माध्यम से हम कई बातों को समाज के समक्ष रोचक ढ़ंग से प्रस्तुत करते हैं। हमारे प्राचीन साहित्य में हमारी भावनाओं का प्रगटीकरण होता है और उसके आलोक में हम एक दिशा पाते हैं। प्राचीन साहित्य में उल्लेखित भावनाओं की आवश्यकता आज भी महसूस की जा रही है। उक्त विचार पटना में आयोजित चंद्रगुप्त साहित्य महोत्सव के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए बिहार के राज्यपाल डाॅ. राजेंद्र विश्वनाथ ने व्यक्त किए।

 

पटना के स्काउट्स एण्ड गाइड्स मैदान में आयोजित दो दिवसीय महोत्सव के उद्घाटन कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि साहित्य पढ़कर समाज जागृत होता है। भारत में ऐसे कई साहित्य रचे गए हैं जो हमारे मन के तार को झंकृत कर देते हैं। दुर्भाग्य से गुलामी के कालखंड के बाद हम ऐसे साहित्य की रचना नहीं कर पाए। अपनी जड़ों से कटे रहने के कारण राजनैतिक स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी हम अपना मार्ग ढूंढ रहे हैं। जबकि स्वतंत्रता के बाद पूरा विश्व हमारी ओर आशा की निगाह से देख रहा था। परंतु, हमने उस अवसर का उपयोग नहीं किया। इतने दिनों बाद जागरण का अवसर आया है और हम सब उसके साक्षी बन रहे हैं।

उन्होंने चंद्रगुप्त सभागर में उपस्थित जन समूह को संबोधित करते हुए कहा कि मनोरंजन के लिए साहित्य लिखना और समाज प्रबोधन के लिए साहित्य लिखना अलग-अलग बातें हैं। भारतीय मनीषियों ने मनोरंजक ढ़ंग से समाज प्रबोधन के लिए साहित्य रचा। वीर सावरकर ने ‘संन्यस्त खड़्ग’ की रचना की। प्रख्यात फिल्मकार रमेश देव ने पुर्तगालियों की क्रूरता पर साहित्य लिखा और उस पर डाॅक्यूमेंट्री भी बनाई। परंतु, तथाकथित वामपंथियों ने उसका विरोध किया। ये वही लोग थे जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कहते हैं। अपितु, अपने मत से इतर लोगों की बातों को स्वीकार नहीं करते। उन्होंने उपस्थित प्रबुद्ध जनों से आग्रह किया कि वे पाठकों की भी निर्मिति करें। लेखन करने वाले बहुत हैं लेकिन उसको पढ़ने वाला भी होना चाहिए। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के अपने अनुभव को भी साझा किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने अपने ‘स्व’ की चर्चा करते हुए कहा कि ‘स्व’ के आधार पर ही व्यवस्थाएं बननी चाहिए। इसी में ‘स्वभाषा’ भी है। कोई भी स्वतंत्र देश अपनी प्रकृति के अनुसार अपनी व्यवस्थाएं बनाता है। उसी के अनुरूप अपना मार्ग बनाता है। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद हमने अपनी प्रकृति के अनुरूप अपनी व्यवस्था नहीं बनाई। यह साहित्य में भी दिखा। फलतः देश में स्खलन का दौर शुरू हुआ। भारत की मौलिक बातों पर आघात करने वाले साहित्य भी रचे गए। आपस में जोड़ने वाले साहित्य की रचना करनी चाहिए। मनोरंजन का पर्याय फूहड़ता नहीं होता।

कार्यक्रम की अध्यक्षता भारतीय रिजर्व बैंक के सेवानिवृत पदाधिकारी राजकुमार सिन्हा ने की। मंच पर इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन मंत्री डाॅ. बालमुकुंद, विश्व संवाद केंद्र के अध्यक्ष श्रीप्रकाश नारायण सिंह, कार्यक्रम के संयोजक प्रो. राजेंद्र प्रसाद गुप्ता एवं कार्यक्रम के स्वागताध्यक्ष प्रो. अमरनाथ सिन्हा उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन नालंदा विश्वविद्यालय की डाॅ. स्मिता सिंह ने एवं धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम के सह संयोजक मिथिलेश सिंह ने किया।
 

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