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दशावतारों में समाया सृष्टि का अनूठा ज्ञान-विज्ञान!

चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के जिस सिद्धांत को 19वीं सदी में पूरी दुनिया ने मान्यता दी थी। सनातन हिंदू दर्शन में उसकी व्याख्या हजारों साल पहले ही हो चुकी थी।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Feb 28, 2023, 11:55 am IST
in विश्लेषण
प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

हमारे वेदों और पुराण ग्रंथों में वर्णित कथानकों को मनगढ़ंत कपोल कल्पना बताकर डेढ़-दो शताब्दी पूर्व तक पाश्चात्य जगत के बुद्धिजीवियों द्वारा जिस भारतीय मेधा की खिल्ली उड़ायी जाती थी, 19वीं व 20वीं सदी में हुए यूरोपीय शोध-अध्ययनों में उनकी वैज्ञानिकता साबित होने से आज देश-दुनिया का समूचा प्रबुद्ध वर्ग हमारे गौरवशाली अतीत की चमत्कारी उपलब्धियों के समक्ष नतमस्तक है। उदाहरण के तौर पर दशावतारों में निहित जैव विकास के अनूठे ज्ञान विज्ञान को ही लें! सुप्रसिद्ध जीव विज्ञानी चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के जिस सिद्धांत को 19वीं सदी में पूरी दुनिया ने मान्यता दी थी। सनातन हिंदू दर्शन में उसकी व्याख्या हजारों साल पहले ही हो चुकी थी। यही वजह डार्विन द्वारा प्रतिपादित जैव विकास के सिद्धांतों और हमारी महान वैदिक मनीषा द्वारा व्याख्यायित दशावतारों के तत्वदर्शन में एक अनूठी समानता परिलक्षित होती है।

ज्ञात हो कि 19वीं सदी में चार्ल्स डार्विन ने अपनी शोधों के आधार पर यह तथ्य प्रतिपादित किया था कि धरती पर जीवों की उत्पत्ति जल के भीतर सूक्ष्म जीवों से शुरू हुई थी और क्रमिक रूप से उनके डीएनए में लगातार परिवर्तन होते जाने से जीवों की नयी-नयी प्रजातियों का निरंतर विकास होता गया। डार्विन की सुप्रसिद्ध कृति ‘ऑरिजिन ऑफ स्पीसीज’ में जैव विकास के इस तथ्य की विस्तार से व्याख्या की गयी है। डार्विन के अनुसार करीब 58 करोड़ वर्ष पहले सृष्टि का प्रथम जीव जल में विकसित हुआ था और सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार जगतपालक श्रीहरि विष्णु का प्रथम मत्स्य अवतार भी उसी कालखंड में जल के भीतर हुआ था। डार्विन एक कोशकीय सूक्ष्मजीव का उद्भव जल से हुआ बताते हैं और वैदिक मान्यता के अनुसार सृष्टि का प्रथम जीव मछली जीव जगत के विकास का मूल आधार था। है न कितना अद्भुत साम्य! डार्विनवाद के अनुसार दूसरे चरण उभयचर विकसित हुए, यानी ऐसे प्राणी जो जल एवं थल दोनों पर रहने में समर्थ थे। आश्चर्य देखिए कि श्रीविष्णु का दूसरा अवतार कूर्मावतार था। कूर्म यानी कछुआ, जल एवं थल पर दोनों पर रहने में सक्षम। वैज्ञानिक दृष्टि से उभयचरों के पश्चात् थलचर और स्तनपायी जीव विकसित हुए। विष्णु के तृतीय वराह अवतार (वन्य शूकर) में यह दोनों विशिष्टतायें मौजूद थीं। वैज्ञानिक मान्यता के अनुसार इस समय तक मानव के विकास की शुरुआत हो गयी पर अभी पूर्ण मानव आकार में नहीं आया था बल्कि मानव एवं पशु के सम्मिश्रण से नया जीव आकार ले रहा था।

गौरतलब हो कि भगवान विष्णु के चतुर्थ नृसिंह अवतार (आधा मानव और आधा सिंह) में यह वैज्ञानिक अवधारणा स्पष्ट प्रतिबिम्बित देखी जा सकती है। आधुनिक विज्ञान कहता है जैव विकास के इस पड़ाव तक मानव का विकास हो चुका था परन्तु अपने प्रथम स्वरूप में मनुष्य काफी छोटे कद का था। ज्ञात हो कि ईश्वर का पंचम वामन अवतार इस मानक पर पूरा उतरता है। शास्त्र कहते हैं कि भगवान वामन मात्र बावन अंगुल के थे। डार्विन के विकासवाद की मानें तो अगले चरण में मानव को जीविकोपार्जन व अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए लड़ना पड़ता था और प्रागैतिहासिक काल के आरंभिक अस्त्र-शस्त्रों में फरसा या परशु एक प्रमुख हथियार था। विष्णु का षष्ठम परशुराम अवतार इस वैज्ञानिक अवधारणा पर पूरा उतरता है। तत्पश्चात मानव सभ्यता विकसित हुई। चूंकि समाज के संतुलित विकास के लिए निर्धारित नियमों का पूर्णरूपेण पालन करना अनिवार्य होता है, अन्यथा अराजकता फैल जाती है। ऐसे में सप्तम अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम राम की प्रासंगिकता पूर्ण समीचीन प्रतीत होती है। कालांतर में विभिन्न समाजों के गठन के साथ राजनीति, कूटनीति व युद्धनीति का जन्म हुआ। इसके प्रतीक रूप में अष्टम अवतार योगीश्वर श्रीकृष्ण को देखा जा सकता है जो प्रखर बौद्धिकता के सर्वोच्च प्रतिनिधि माने जाते हैं। तदुपरांत समाज में स्थिरता एवं विश्व में शांति के प्रयत्नों का समय आया। इस विचार परिवर्तन के प्रतीक माने जा सकते हैं नवम अवतार गौतम बुद्ध। काबिलेगौर हो कि वर्तमान का समूचा वैज्ञानिक समाज सृष्टि के लगातार विनाश की ओर बढ़ने की चेतावनी दे रहा है और इसी विचार का प्रतिपादन भविष्य पुराण में वर्णित वर्तमान 22वें वैवस्वत मनु के मन्वंतर के अंत में अगले दिनों होने वाले भगवान विष्णु के दशम कल्कि अवतार के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि यहां गौर करने वाला तथ्य यह है कि जहां आधुनिक विज्ञान की सीमा इस बिंदु पर आकर समाप्त हो जाती है, वहीं हमारे महान पुराणकार मनीषी कलियुग के उपरांत पुनः सतयुग के सृजन की बात कहकर सृष्टिचक्र के सतत गतिमान रहने की वैदिक मान्यता का प्रतिपादन करते हैं।

प्रसिद्ध कथाकार व लेखक प्रमोद भार्गव का लोकप्रिय उपन्यास ‘दशावतार’ हिंदु पौराणिक कथाओं में वर्णित अवतारों के स्वरूपों की जीव वैज्ञानिक व्याख्या देकर तुलनात्मक दृष्टि से अवतारों की वैज्ञानिकता सिद्ध करता है। इस उपन्यास में लेखक यह तथ्य प्रतिपादित करते हैं कि दशावतार वस्तुतः जैव विकास को क्रमबद्ध रूप में रेखांकित किए जाने की सटीक अवधारणा है क्योंकि इनमें एक सुस्पष्‍ट और तार्किक कालक्रम मौजूद है। इस उपन्यास की विलक्षणता यह है कि यह जीव के विकासक्रम के साथ-साथ संपूर्ण सृष्टि अर्थात ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और वह किस वैज्ञानिक ढंग से अस्तित्व में है, उनके कारण एवं कारकों की भी सार्थक प्रस्तुति करता है। भार्गव जी के अनुसार दशावतार और डार्विन में समानता होने का जिक्र स्वामी विवेकानंद और जवाहरलाल नेहरू भी कर चुके हैं। बावजूद इसके, खेद की बात है कि आजादी के बाद की वामपंथी सोच वाली कांग्रेस सरकारों द्वारा इस सारगर्भित भारतीय चिंतन की घोर उपेक्षा की गयी।

बताते चलें कि भारतीय दर्शन एवं योग पर अत्यंत महत्वपूर्ण शोधकार्य करने वाले ब्रिटेन में जन्मे जाने माने भारतविद सर जॉन वुडरॉफ (1865-1936) जिन्होंने तत्कालीन बंगाल सरकार के एडवोकेट जनरल के पद पर रहते हुए प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के विशद अध्ययन के उपरांत बीस से अधिक तांत्रिक ग्रंथों का अनुवाद कर भारत के वैदिक साहित्य को समृद्ध बनाने में अपना अमूल्य योगदान दिया था; की यह टिप्पणी सचमुच विशिष्ट है कि डार्विन और लैमार्क से पहले ही भारत के ऋषियों ने सृष्टि के जैव विकास के मूल सिद्धांत को जान लिया था। सर जॉन वुडरॉफ के मुकाबिक बहुत संभव है कि चार्ल्स डार्विन को दशावतारों की अवधारणा से ही अपना सिद्धांत सिद्ध करने की प्रेरणा मिली हो क्योंकि खुद डार्विन की आत्मकथा में इस बात उल्लेख मिलता है कि अपनी शोध यात्रा शुरू करने के पहले उन्होंने वैदिक साहित्य का गंभीर अध्ययन व अनुशीलन किया था।

सनातन धर्म की दशावतारों की अवधारणा पर ब्रिटेन के आनुवंशिकी और विकासवादी जीव विज्ञानी जान बर्डन सैंडर्सन हल्डेन का अध्ययन भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। स्वेच्छा से भारत की नागरिकता ग्रहण करने वाले इस सुप्रसिद्ध ब्रिटिश जीवविज्ञानी का कहना था कि दशावतार एक अनुक्रमिक विकास का सच्चा और सटीक चित्रण है। उन्होंने बीती सदी के चौथे दशक में जैव व मानव विकास के व्यवस्थित क्रम में अवतारों का अध्ययन पहले चार अवतार मत्स्य, कूर्म, वराह और नरसिंह को सतयुग से, अगले तीन वामन, परशुराम और राम अवतार को त्रेता से और आगामी दो बलराम और कृष्‍ण अवतार को द्वापर युग से जोड़कर अपनी पुस्तक ‘द कॉजेज आफ इवोल्यूशन‘ में जैविक विकास के तथ्यों को रेखांकित किया है। परन्तु विडंबना है कि सृष्टिवाद से जुड़ी इतनी सटीक व्याख्या करने के बावजूद हल्डेन की इस अवधारणा को कोई महत्व नहीं दिया गया क्योंकि उनकी आंखों पर वामपंथी वैचारिकता का चश्‍मा चढ़ा था। ऐसे में अब इस बात की नितांत आवश्यकता है कि अतीत में हुईं भूलों को सुधारकर वैदिक भारत के इस अनूठे ज्ञान-विज्ञान से देशवासियों खासकर युवा पीढ़ी को परिचित कराया जाए ताकि हमारा भारत पुनः विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर हो सके।

ब्रह्मांड की उत्पत्ति के वैदिक सिद्धांत को प्रमाणिक मानता है आधुनिक विज्ञान
ईसाई पंथ की मान्यता है कि परमेश्वर ने सृष्टि को छह दिन में रचा और सातवें दिन आराम किया। उसने सबसे पहले एक मानव को रचा और उसकी छाती की पसली से एक स्त्री को रचा। लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक शोध इस मान्यता को सच नहीं मानते। ऋग्वेद के 10 वें मण्डल के 129 वें  ‘नासदीय सूक्त’ में ब्रह्मांड की उत्पत्ति और सृष्टि रचना का जो सिद्धांत वर्णित है, आज का विज्ञान उसे प्रमाणिक मानता है। इस सूक्त में भारतीय तर्कशास्त्र के बीज छिपे हैं। इस वैदिक मान्यता के अनुसार आरंभिक काल में पृथ्वी आग का एक गोला थी। वह करोड़ों वर्षों तक ठंडी होती रही और फिर सुदीर्घ काल तक वर्षा का समय रहा। समुद्र एवं महासागर भरे और फिर हिमयुग आया, जो अरबों वर्ष तक रहा। तदुपरांत लगभग 58 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी पर जीव की उत्पत्ति हुई। सृष्टि की इसी ऋग्वेद की इस गूढ़ व्याख्या को सरल भाषा में रूपायित करते हुए प्रमोद जी ‘दशावतार’ में लिखते हैं, ‘’अरबों साल पहले जब ब्रह्मांड नहीं था, तब ईश्वर ने अपने संकल्प से ब्रह्म बिंदु की उत्पत्ति की। फिर वह बिंदु मचलने लगा और फिर उसके भीतर महाविस्फोट हुआ। नाद और बिंदु के इसी मिलन से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। नाद अर्थात ध्वनि और बिंदु अर्थात प्रकाश। परमेश्वर का प्रकाश। ऋषियों ने इस अनहद ध्वनि को ॐ के रूप में अभिव्यक्त किया है। ‘’ ज्ञात हो कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बारे में प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफ़न हॉकिंग ने अपनी पुस्तक ‘अ ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम’ में लिखा है कि समय की अवधारणा ‘बिग बैंग’ से ही आरंभ होती है। सृष्टि की उत्पत्ति जानने के लिए ही बिग-बैंग अर्थात महामशीन का प्रयोग किया गया था और इसके निष्कर्ष रूप में यह प्रतिपादित हुआ था कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का मूल कारक ‘गॉड पार्टिकल‘ अर्थात ‘ईश्वरीय-कण‘ हैं। इन्हीं कणों को श्रीमद्भागवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ‘अल्पांश’ की संज्ञा दी है। गीता में कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं-संपूर्ण ब्रह्माण्ड का आधार मैं हूं। मेरे एक अल्पांश से अभिव्यक्त प्रत्यक्ष दिखने वाले ब्रह्माण्ड का कारक मैं हूं और मुझसे ही सारा संसार गतिशील है।‘ इन कथनों से यह बात सिद्ध होती है कि भारतीय चिंतन और आधुनिक विज्ञान की खोज में अद्भुत समानता है।

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