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‘खिचड़ी’ से ‘पोंगल’ तक मन मोहता है भारत का बहुरंगी सांस्कृतिक सौन्दर्य

मकर संक्रांति भारतीय लोकजीवन का सर्वाधिक बहुरंगी पर्व है जिसमें हमारे भारत के सांस्कृतिक सौन्दर्य की मनमोहक छटा देखते ही बनती है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Jan 15, 2023, 09:07 am IST
in विश्लेषण

भारत की सनातन संस्कृति में सूर्य को आँखों से दिखायी देने वाले प्रत्यक्ष देवता की संज्ञा दी गयी है। पृथ्वी पर उपस्थित समस्त जीव जगत को जितनी गहराई से सूर्यदेव जीवन प्रभावित करते हैं, दूसरा कोई अन्य तत्व नहीं। मकर संक्रांति भारतीय लोकजीवन का सर्वाधिक बहुरंगी पर्व है जिसमें हमारे भारत के सांस्कृतिक सौन्दर्य की मनमोहक छटा देखते ही बनती है। यह पर्व मूल रूप से सूर्य नारायण को नमन कर उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए मनाया जाता है। संक्रांति का अर्थ होता है गमन और इस पर्व पर सूर्य देव धनु राशि से मकर राशि में संक्रमण कर अपनी दिशा बदल कर उत्तरायण हो जाते हैं। हमारे धर्मशास्त्रों में ‘उत्तरायण’ की अवधि को देवताओं का दिन तथा ‘दक्षिणायन’ को देवताओं की रात कहा गया है। इस दिन से खरमास में रुके हुए सारे शुभ काम पुनः शुरू हो जाते हैं।

पौराणिक मान्यता के अनुसार इस मुहूर्त में प्राण त्यागने वाला आवागमन के चक्र से मुक्त हो मोक्ष प्राप्त कर लेता है। इसी वजह से महाभारत युद्ध में घायल हो शरशैया पर लेटे पितामह भीष्म ने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने तक प्रतीक्षा की थी।
सूर्योपासना, नवान्न का भोग, पशुओं के प्रति कृतज्ञता करने वाला मकर संक्रांति का लोकपर्व स्थानीय विविधताओं के साथ समूचे देश में भारी हर्षोल्लास से मनाया जाता है। उत्तर में खिचड़ी की खुशबू से साथ निखरी संक्रांति की धूम, दक्षिण में पोंगल की मस्ती, पूर्व में बिहू की लचक और पश्चिम में पतंगबाजी की होड़ के साथ पूरे परवान पर दिखायी देती है। उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार में मकर संक्रांति को विशेष रूप से ‘खिचड़ी’ व ‘दही चूड़ा’ पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन श्रद्धालु गंगा स्नान करने के बाद खिचड़ी दान कर इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इस मौके पर उत्तरप्रदेश के गोरखधाम मंदिर में आयोजित होने वाले एक मासीय ‘खिचड़ी मेले’ की ख्याति तो अब सात समुन्दर पार तक पहुँच चुकी है।

वहीं, बिहार के मैथिल समुदाय के लोग इस दिन सुबह स्नान करने के बाद भगवान को तिल अर्पण करते हैं। फिर दही-चूड़ा, तिलकुट खाते हैं। दिन में ही खिचड़ी बनाई जाती है। रात में भी पकवान बनते हैं। इस दिन बुजुर्ग छोटों को तिल-गुड़ बांटते हैं। मिथिला के लोग, जिनके घर में नई शादी हुई होती है, वे एक-दूसरे के घर भार भेजते हैं। उत्तराखंड में मकर संक्रांति पर ‘घुघुतिया’ त्योहार मनाया जाता है। इस दिन आटे व तिल से एक विशेष प्रकार का व्यंजन ‘घुघुत’ बनाया जाता है। इस दिन बच्चे सुबह-सुबह उठकर कौओं को बुलाकर कई तरह के पकवान खिलाते हैं। राजस्थान में लोग मकर संक्रांति के दिन की शुरुआत भगवान को तिल से बने व्यंजनों का भोग लगाकर करते हैं। रात 12 बजे के बाद से ही मकर संक्रांति की गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। लोगों के घरों में दाल की पकौड़ियां और पुए बनाते हैं। मारवाड़ी समाज के लोग मकर संक्रांति के दिन 14 सुहागिनों को सुहाग से जुड़ी चीजें भेंट करते हैं। वहीं पंजाबी समुदाय एक दिन पहले ही अग्नि जलाकर, गीत गाकर, रेवड़ी, मूंगफलियां, गजक, मकई के लावे बांटकर ‘लोहड़ी’ के रूप ने पर्व की खुशियां मनाते हैं।

लोहड़ी पर नववधुओं और नये जन्मे शिशुओं का विशेष स्वागत होता है। गुजराती समुदाय संक्रांति के दिन पूजा-पाठ, तिल-गुड़ खाने के अलावा पतंगबाजी करते हैं। माना जाता है कि इस दिन पतंग उड़ाने और दूसरों की पतंग काटने से दुश्मनों का नाश होता है। महाराष्ट्र में मकर संक्रांति को ‘हल्दी-कुमकुम’ पर्व के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन मराठी स्त्रियां हल्दी और कुमकुम लेकर एक-दूसरे के घर जाती हैं और तिलक लगाकर गुड़ और तिल के लड्डू आपस में बांटती हैं। असम में यह पर्व फसलों की कटाई के उपलक्ष्य में ‘माघ-बिहू’ के नाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर युवतियां पारंपरिक पोशाक पहनकर आंगन और द्वार पर फूल सजाती हैं। माघी बिहू में परंपरा के अनुसार देवता की पूजा करने के बाद तरह-तरह के पकवान बनाते हैं। मुख्य रूप से भोज देने की प्रथा है, इसलिए ‘भोगासी बिहू’ भी कहा जाता है। इस मौके पर युवा पुरुषों-महिलाओं द्वारा बिहू नृत्य किया जाता है।

असम में भी अग्नि के चारों तरफ घूमकर नृत्य करने की परंपरा है। चावल के कई प्रकार के पीठे और नारियल के लड्डू बनाये जाते हैं। कहीं-कहीं बैलों की पारंपरिक लड़ाइयां भी आयोजित होती हैं। तमिलनाडु में इस मौके पर मनाये जाने वाले ‘पोंगल’ पर्व में बारिश, सूर्य, खेत और पशु सभी का पूजन किया जाता है। तड़के नए कपड़े पहनकर प्रार्थना की जाती है। इस पर्व का विशेष व्यंजन पोंगल है, जिसे दूध में चावल, गुड़ और चना को उबालकर बनाया जाता है। पहले दिन भोगी पोंगल, दूसरे दिन सूर्या पोंगल, तीसरे दिन मट्‌टू पोंगल और चौथे दिन कानूम पोंगल मनाया जाता है। पोंगल को बनाने के दौरान जब लोग उबलते हुए दूध में चावल, गुड़ और चना डालते हैं तो जोर-जोर से ‘पोंगोलो पोंगल…’ बोलते हैं। बंगाली समुदाय के लोग संक्रांति पर चावल के आटे, मूड़ी, चूड़ा या लावा का मोया (लड्डू बनाना) आदि व्यंजन बनाते हैं। सुबह जल्दी नहाकर नए या धोए कपड़े पहनकर पकवान बनाने के लिए लोग जुट जाते हैं। मकर संक्रांति के दिन पश्चिम बंगाल के गंगासागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है। इस दिन गंगासागर में स्नान-दान के लिए लाखों लोगों की भीड़ होती है। इस अवसर कपिल मुनि मंदिर में खास पूजा होती है।

भारत के बाहर भी बरकरार है पर्व की खुशबू
जानना दिलचस्प हो कि मकर संक्रांति का पर्व भारत के बाहर भी कई देशों में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के हिन्दू समाज के लोग अपनी विवाहित बेटियों को तिल के बने लड्डू और चिक्की (लाई) भेजते हैं। भारत में सिंधी समुदाय भी मकर संक्रांति को ‘तिमूरी’ के रूप में मनाते हैं, जिसमें माता-पिता अपनी बेटियों को मीठे व्यंजन भेजते हैं। श्रीलंका के तमिल किसान अच्छी फसल के लिए इस दिन सूर्यदेव का नमन पूजन करते हैं। वहीं इस पर्व को बांग्लादेश नये चावल के पकवान का प्रसाद चढ़ा कर ‘शकरैन महोत्सव’ के रूप में मनाया जाता है। जबकि नेपाल में इसे ‘माघ संक्रांति’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन नेपाली हिन्दू समाज द्वारा नदियों के संगम पर स्नान करके सूर्य की पूजा की जाती है। माघ संक्रांति की पूजा कर नेपाली लोग अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को तिल के लड्डू, घी और शकरकंद जैसे खाद्य पदार्थ प्रसाद रूप में बांटते हैं और घर में मातायें अपने परिवार के सभी सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं।

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