विभाजन की विभीषिका : हिंदुओं को मारकर कुंओं में फेंका गया
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विभाजन की विभीषिका : हिंदुओं को मारकर कुंओं में फेंका गया

मेरे दादाजी खेती-किसानी का काम किया करते थे। तो घर के अन्य लोग विभिन्न व्यवसायों में लगे थे। यानी दादाजी ने परिवार के सभी लोगों को हुनरमंद बनाया और उन्हें कोई ना कोई काम सिखाया था

अरुण कुमार सिंहअश्वनी मिश्रWritten byअरुण कुमार सिंहandअश्वनी मिश्र
Nov 26, 2022, 05:07 pm IST
inभारत
शकुंतला नागपाल

शकुंतला नागपाल

 

न भूलने वाला पल
कट्टरपंथी ज्यादातर लूटपाट तब करते थे जब अंधेरा हो जाता था। कभी-कभी तो दिन में ही मार काट का शोर मच जाता था।

शकुंतला नागपाल

मुल्तान, पाकिस्तान

बंटवारे के समय मेरी उम्र छह साल थी। परिवार में दादा-दादी, माता-पिताजी, दो भाई और बहन थी। कुल मिलाकर हमारा संयुक्त परिवार था। भरपूर आनंद था। मेरे दादाजी खेती-किसानी का काम किया करते थे। तो घर के अन्य लोग विभिन्न व्यवसायों में लगे थे। यानी दादाजी ने परिवार के सभी लोगों को हुनरमंद बनाया और उन्हें कोई ना कोई काम सिखाया था। इसलिए सभी लोग कमाते थे। मेरी उम्र ज्यादा तो थी नहीं, इसलिए बहुत ज्यादा कुछ ध्यान नहीं है, लेकिन बाद में माता-पिता जी और परिजनों ने जो बताया, वह रोंगटे तो खड़े करता ही है, गुस्सा भी दिलाता है।

गांव के आस-पास बंटवारे की आहट सुनाई देने लगी थी। हिन्दुओं को मारा और भगाया जाने लगा था। दिन में कई-कई घटनाएं सुनने को मिलती थीं। सब डरने लगे थे इस माहौल में। कुछ लोगों ने तो पहले ही घर छोड़ दिया तो कुछ डटे थे, इसलिए कि यह हमारी जन्मभूमि है और हम कहीं नहीं जाएंगे इसे छोड़कर। इसमें खासकर वे लोग थे जो वृद्ध थे। उनको अपनी माटी से बेहद लगाव था। एक दिन अचानक हमारे गांव पर भी हमला हुआ। मुसलमानों ने एक झुंड में आकर हिन्दुओं के घरों में लूटपाट करनी शुरू कर दी। ऐसा कई दिन तक चला। और तब हद हो गई जब जिहादी लोगों को मारने लगे। चारों तरफ चीत्कार के सिवाय कुछ ना था।

हालात इतने खराब हो गए थे कि एक दिन भी वहां रहना मुश्किल हो रहा था। हमारे गांव में मुसलमानों के हमले 15 अगस्त,1947 से पहले शुरू हो गये थे। तब तक हमें यह नहीं पता था कि भारत का एक हिस्सा अब पाकिस्तान के नाम से जाना जाएगा। कट्टरपंथी ज्यादातर लूटपाट तब करते थे जब अंधेरा हो जाता था। कभी-कभी तो दिन में ही मार काट का शोर मच जाता था। हिन्दू अपने खेतो में जाते तो रास्ते में ही मुसलमान उनके साथ मारपीट पर उतारू हो जाते थे। गांव के कई लोग मारे गये इन हमलों में।

मुसलमान इतने ताकतवर हो गए कि मेरे चार लालों को मुसलमान बना दिया। यानी चाचा, चाची और उनके दो बच्चे। पर चाचा बहुत सूझबूझ के साथ वहां से निकलकर अपने देश आ गये। हालात इस कदर खराब थे कि जिस मां की गोद में छोटे बच्चे होते थे, मुसलमान उनको ले जाते थे। लोगों को मार-मारकर कुओं में फेंका जा रहा था।

मुझे एक दिन की बात याद है जब मेरे चाचा जी अपनी ससुराल गए हुए थे। उन दिनों उनका परिवार वहीं था। अचानक मेरे पिताजी घर में जोर-जोर से रोने लगे। परिजनों ने पिताजी से पूछा तो उन्होंने बताया कि जहां चाचा जी की ससुराल है, वहां सभी हिन्दुओं को मुसलमान बना दिया गया है। मेरे पिताजी रो-रोकर कह रहे थे- मुसलमान इतने ताकतवर हो गए कि मेरे चार लालों को मुसलमान बना दिया। यानी चाचा, चाची और उनके दो बच्चे। पर चाचा बहुत सूझबूझ के साथ वहां से निकलकर अपने देश आ गये। हालात इस कदर खराब थे कि जिस मां की गोद में छोटे बच्चे होते थे, मुसलमान उनको ले जाते थे। लोगों को मार-मारकर कुओं में फेंका जा रहा था।

अगर कोई इसका विरोध करता था तो वे निर्ममता से हत्या कर देते थे। इस सबको जब आज याद करने बैठती हूं तो आंखों में आंसू आ जाते हैं। अंतत: एक दिन सेना की गाड़ी से हम लोग वहां से निकले और शिविर में आकर रुक गए। यहां पर हम लोग दो दिन रहे। फिर किसी तरह ट्रेन से कई जगह होते हुए अटारी आ पाए। रास्ते में कई जगह ट्रेन को रोक दिया जाता था। कहा जाता था कि कोई कुछ नहीं बोलेगा और बिल्कुल अंधेरा कर दिया जाता था। क्योंकि जगह-जगह मुसलमान झुंड में आकर हमला करने की फिराक में रहते थे। खैर किसी तरह बच-बचाकर हम भारत आ पाए और गुजर बसर करने लगे।

Topics: विभाजन की विभीषिकाहिन्दुओं को मुसलमानहमारा संयुक्त परिवारनिर्ममता से हत्यामार-मारकर कुओं में फेंका
अरुण कुमार सिंह
अरुण कुमार सिंह
समाचार संपादक, पाञ्चजन्य | अरुण कुमार सिंह लगभग 25 वर्ष से पत्रकारिता में हैं। वर्तमान में साप्ताहिक पाञ्चजन्य के समाचार संपादक हैं। [Read more]
अश्वनी मिश्र
अश्वनी मिश्र
@kashmirashwaniअश्वनी मिश्र भारत की सबसे पुरानी और व्यापक रूप से प्रसारित राष्ट्रवादी हिंदी साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य में वरिष्ठ संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं. देश के ज्वलंत मुद्दों की ग्राउंड रिपोर्ट करने के साथ ही मुख्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा एवं राजनीतिक मुद्दों के बारे में लिखते हैं. जम्मू—कश्मीर, पश्चिम बंगाल एवं आतंकरोधी घटनाक्रम विशेष रुचि के क्षेत्र हैं. देश की विभिन्न राजनीतिक घटनाओं पर तीक्ष्ण नजर रखते हुए उनका समग्र विश्लेषण पत्रकारिता जगत में एक विशिष्ट स्थान रखता है। भारतीय राजनीति, समाज, खेल, मानवाधिकार क्षेत्र की विशिष्ट विभूतियों से निरंतर साक्षात्कार और चर्चा उनके पत्रकारीय अनुभव को मजबूत बनाती हैं. उनके अनेक आलेखों पर देश के राजनीतिक गलियारों में एक नरैटिव खड़ा हुआ. विभिन्न प्रासंगिक विषयों की रिपोर्ट और आलेखों को संसद के पुस्तकालय में संग्रहणीय तौर पर शामिल किया गया. बंगाल की चुनावी हिंसा की ग्राउंड रिपोर्ट एवं उसके पहले की अनेक हिंसाओं में पीड़ितों के जीवंत साक्षात्कार देशभर में सराहे गए. सोशल मीडिया पर उनकी उपस्थित विशेष दर्जा रखती है. [Read more]
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