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कैसे ली गई सरकार की सुपारी

2002 के गोधरा दंगों के बाद मीडिया, एनजीओ और एजेंडाधारी बुद्धिजीवी झूठ पर झूठ फैलाते रहे। झूठे गवाह पेश करते रहे। केवल इसलिए कि मुसलमानों की करतूत पर परदा डाला जा सके और हिंदुओं को बदनाम किया जा सके।

Written byतृप्ति श्रीवास्तवतृप्ति श्रीवास्तव
Jul 6, 2022, 12:25 pm IST
in गुजरात
पाञ्चजन्य से साक्षात्कार के दौरान उदय माहूरकर

पाञ्चजन्य से साक्षात्कार के दौरान उदय माहूरकर

2002 के गोधरा दंगों के बाद मीडिया, एनजीओ और एजेंडाधारी बुद्धिजीवी झूठ पर झूठ फैलाते रहे। झूठे गवाह पेश करते रहे। केवल इसलिए कि मुसलमानों की करतूत पर परदा डाला जा सके और हिंदुओं को बदनाम किया जा सके। षड्यंत्रकारियों के निशाने पर खासतौर से तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे

वर्तमान केंद्रीय सूचना आयुक्त और वरिष्ठ पत्रकार ने साल 2010 में अपने एक लेख में जो खुलासा किया था, उसके तथ्यों की प्रमाणिकता सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी में साफ झलकती है। 2002 में जब गुजरात में दंगे हुए, उस समय वे इंडिया टुडे में थे। गुजरात दंगों से लेकर इस पर सर्वोच्च न्यायालय निर्णय तक, उन्होंने हर पहलु को बारीकी से देखा और परखा है। वे कहते हैं, ‘‘सर्वोच्च न्यायालय ने अभी जो कहा है, उस पर मैंने 2010 में ही रिपोर्ट की थी कि जितने भी गवाह थे उन्हें पढ़ाया-सिखाया गया था। इससे पहले ही स्पष्ट हो गया था कि इस मामले के जो 4 या 5 मुख्य गवाह थे, वे सभी गलत थे। उन्हें तैयार किया गया था। 8 साल तक उनकी गवाही के आधार पर दुष्प्रचार किया गया। उनकी गवाही और फर्जी कहानियों के आधार पर गुजरात की तत्कालीन नरेंद्र मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए षड्यंत्र रचा गया था।’’

झूठ-1
गुजरात दंगों के दौरान गुलबर्ग सोसाइटी में पूर्व कांग्रेसी नेता एहसान जाफरी सहित अन्य लोगों की हत्या की जांच सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने की थी। इसने अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दी थी। एहसान जाफरी की बीवी जकिया जाफरी ने एसआईटी की रिपोर्ट के विरुद्ध याचिका दाखिल की थी, जिसमें तीस्ता सीतलवाड़ सह याचिकाकर्ता थी। माहूरकर बताते हैं कि इस मामले में इम्तियाज पठान नामक व्यक्ति ने गवाही दी थी कि जाफरी ने नरेंद्र मोदी को फोन कर मदद मांगी थी। लेकिन नरेंद्र मोदी ने उन्हें गालियां दीं। यह सरासर गलत है। जाफरी ने मोदी को फोन ही नहीं किया था। वास्तव में जाफरी ने अपनी जान बचाने के लिए भीड़ पर गोलियां चलाईं। गोलियां खत्म हो गईं आक्रोशित भीड़ ने हमला कर दिया।

झूठ-2
वे कहते हैं कि एक यही घटना नहीं थी जिसका दुष्प्रचार किया गया, बल्कि नरोड़ा पाटिया की कौसरबानो हत्या मामले में भी झूठी और घृणित कहानी गढ़ी गई थी। आठ साल तक उस झूठी कहानी को मीडिया और दंगा पीड़ितों की मदद का दावा करने वाले एनजीओ ने सच बता कर प्रचारित किया। कहा गया कि उसके साथ बलात्कार हुआ था और वह गर्भवती थी। उग्र भीड़ ने तलवार से उसका पेट चीर दिया और बच्चा निकाल कर फेंक दिया। 8 साल तक यह झूठ चलता रहा। 2010 में मैंने कौसरबानो का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को तलाशने का फैसला किया। मैंने डॉ. जे.एस. कनौरिया को नाडियाड से ढूंढ़ निकाला। उन्होंने कौसरबानों की मौत की कहानी को मनगढ़ंत करार देते हुए कहा कि उसकी मौत जलने से हुई थी। बलात्कार की बात झूठ है। जब उनसे पूछा कि आपने मीडिया को यह सब क्यों नहीं बताया तो बोले- मेरे पास कोई आता तभी तो बताता। लेकिन मैंने गौर किया कि सच कहते हुए वे डर रहे थे। दुष्प्रचार का इतना खौफ था।’’

झूठ-3
इसी तरह की कहानी मदीना नामक महिला को लेकर भी गढ़ी गई। प्रचारित किया गया कि मदीना के पूरे परिवार की हत्या करने के बाद उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। इस मामले में एसआईटी के समक्ष पेश नानूभाई मलिक ने झूठी गवाही दी। उदय माहूरकर ने उससे भी बात की। वह बताते हैं कि पुलिस के पास दंगाइयों के खिलाफ जो भी बयान आते थे, सभी टाइप किए गए होते थे। इसके पीछे एक टीम काम करती थी। वे शिविर में जाते थे और वहां जो भी प्रमुख नेता मौजूद होते थे, उनका नाम डाल देते थे। इससे उन्हें कोई मतलब नहीं था कि वे गवाह थे या नहीं। मदीना बीबी के बारे में झूठ गढ़ा गया कि दंगों के दौरान उसका बलात्कार हुआ, जिसका गवाह नानूभाई मलिक था। 2009 में उसने एसआईटी से कहा कि उसका बयान गलत है। तीस्ता सीतलवाड़ ने उससे यह जबरदस्ती लिखवाया। नानूभाई ने तीस्ता से कहा था कि उसने ऐसा कुछ नहीं देखा। फिर भी तीस्ता ने बयान पर उसका हस्ताक्षर करा कर भेज दिया। बकौल उदय माहूरकर, 2010 में साक्षात्कार के दौरान नानूभाई ने ये बातें कही थीं।

‘‘15 दिसंबर, 2002 को चुनाव जीतने के बाद नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार लेने के लिए उनके घर गया था। साक्षात्कार के दौरान जब उन्हें बदनाम करने के लिए की गई कोशिशों को लेकर प्रश्न पूछा तो उनकी आंखें भर आई थीं। उन्होंने बस इतना कहा कि सामाजिक जीवन में ईमानदारी और पारदर्शिता के जो मापदंड हैं, मुख्यमंत्री बनने के बाद मैंने हमेशा उसका पालन किया है। लेकिन किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। राज्य के प्रति मेरी प्रतिबद्धता पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। ये मुझे खलनायक ही दिखाते रहे। यह कहते समय उनकी आंखों में आंसू छलक आए थे।’’

हिंदुओं को बदनाम करना था उद्देश्य
माहूरकर मानते हैं कि दंगों की भयावहता दिखाने और पीड़ित मुसलमानों की झूठी कहानियां गढ़ने का एकमात्र उद्देश्य हिंदुओं को बदनमा करना और मोदी सरकार के विरुद्ध लहर तैयार करना था। दंगों के दूसरे-तीसरे दिन से ही गुजरात में सामाजिक कार्यकर्ताओं का जमघट लगने लगा था। दंगा पीड़ित मुसलमानों से वे क्या बात करते थे, इस बारे में पूछने पर माहूरकर बताते हैं, ‘‘3 या 4 मार्च की बात है। दंगे की आग मद्धम पड़ रही थी। शाह आलम नामक एक मध्यकालीन दरगाह है, जिसमें बड़े-बड़े कमरे हैं। दंगों के दौरान गांवों से आए मुसलमान इन्हीं कमरों में रहते थे।

सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह को वहां ठहराया गया था। जब मैं दरगाह गया तो काले कपड़ों में एक महिला बैठी, जिसके पास एक रिकॉर्डर था। वह नरोड़ा पाटिया के एक पीड़ित मुसलमान से कह रही थी कि तुम कहो कि तुम पर इतना अत्याचार हुआ है कि आतंकवादी बन जाओगे। वह सीधा-सादा आदमी था। वह जैसा कह रही थी, वैसा बोल नहीं पा रहा था, इसलिए महिला ने रिकॉर्डर बंद कर उसे फिर समझाया। कहा कि तुम जोर से कहो कि मैं आतंकवादी बनूंगा। मैं दूर खड़ा यह सब देख रहा था।

जब महिला को इसका आभास हुआ तो उसने रिकॉर्डर बंद कर दिया। रिपोर्ट की प्रामाणिकता के लिए मैं एक साथ दोनों की फोटो लेना चाहता था, इसलिए अपने फोटोग्राफर बंदीप सिंह, जो उस समय मेरे साथ इंडिया टुडे में थे, को बुलाने के लिए दौड़ा। लेकिन जब लौटा तो महिला वहां से जा चुकी थी। मैंने बगल वाले कमरे में जाकर लोगों से पूछा कि काले कपड़ों में जो महिला थी, वह कौन थी। लोगों ने वही नाम बताया जो अब लिया जा रहा है।’’ सोचिए कि यह कितना घिनौना प्रयास है कि एक पीड़ित प्रति सहानुभूति दिखाते हुए उससे यह पूछना चाहिए था कि तुम्हारी तकलीफ क्या? लेकिन उसे उकसाया जा रहा था कि वह कहे कि आतंकवादी बन जाएगा। इस घटना के बाद ही माहूरकर को आभास हो गया था कि दंगे की आग को बरसों तक भड़काने का काम एजेंडे के तहत शुरू हो गया है।

1995 में गुजरात में जब भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो राष्ट्रवाद का माहौल बनने लगा। दूसरा, 1998 में न्यूज चैनलों का युग आने के बाद यह पहला अवसर था जब 59 हिंदुओं को मारा गया। टीवी पर पहली बार लाइव रिपोर्टिंग हुई। उससे गुजरात के हिंदुओं में मन में ज्वाला भड़की। उन्हें लगा कि मुसलमानों ने पहले देश का विभाजन कराया और अब उन्हें जीने नहीं दे रहे हैं। इसके कारण आक्रोश का एक माहौल बना। यह थी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पहली रिपोर्टिंग।

जिसकी आशंका थी, वही हुआ
वह कहते हैं कि दंगों के चौथे-पांचवें दिन ही उन्हें इसके संकेत मिल गए थे कि षड्यंत्र बड़ा होने वाला है। उन्होंने दंगों पर मीडिया रिपोर्टिंग पर भी सवाल उठाए। उस समय जो भी पत्रकार गुजरात जाता था, पहले एक पंथनिरपेक्षता का लबादा ओढ़े एक मुसलमान से मिलता था जो ‘गुजरात टुडे’ नाम से अखबार निकालता था। वहां से उसे जो सामग्री मिलती थी, वही छापता था। ऐसे पांच बड़े पत्रकार थे, जो केवल ‘गुजरात टुडे’ ही जाते थे। वे कभी हिंदू पक्ष से बात नहीं करते थे। ऐसा नहीं है कि देश में गुजरात से पहले दंगे नहीं हुए या उसकी रिपोर्टिंग नहीं हुई। फिर गुजरात दंगों की रिपोर्टिंग को लेकर ही चर्चा क्यों होती है? इसके उत्तर में माहूरकर कहते हैं, ‘‘भारतीय पत्रकारिता में वामपंथी विचारधारा का प्रभाव रहा है।

1995 में गुजरात में जब भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो राष्ट्रवाद का माहौल बनने लगा। दूसरा, 1998 में न्यूज चैनलों का युग आने के बाद यह पहला अवसर था जब 59 हिंदुओं को मारा गया। टीवी पर पहली बार लाइव रिपोर्टिंग हुई। उससे गुजरात के हिंदुओं में मन में ज्वाला भड़की। उन्हें लगा कि मुसलमानों ने पहले देश का विभाजन कराया और अब उन्हें जीने नहीं दे रहे हैं। इसके कारण आक्रोश का एक माहौल बना। यह थी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पहली रिपोर्टिंग। भारत में साम्प्रदायिक हिंसा का यह पहला मामला था, जिसे टीवी पर सीधे दिखाया जा रहा था।’’

मीडिया के एक वर्ग और एनजीओ ने मिलकर गुजरात के दंगों की कहानी में से गोधरा में हुई नृशंस हत्याओं को हल्का बनाने की कोशिश कैसे की, इस पर माहूरकर कहते हैं, ‘‘आज जितने भी एनजीओ कठघरे में खड़े हैं, वे दूसरे-तीसरे दिन ही गोधरा पहुंच गए थे। वे गोधरा की हिंसा को कमतर दिखाने का प्रयास करते थे। अगर इन्हें हिंदू पीड़ित मिलते थे, तब भी अपने एजेंडे पर ही चलते थे। इनका उद्देश्य था कि जिसने गोधरा कांड किया, वह या तो बदनाम न हो या उसकी बदनामी कम हो। लेकिन इसकी प्रतिक्रिया के तौर पर हिंदुओं ने जो किया, उन्हें इन लोगों ने राक्षस के रूप में चित्रित किया।’’

मुसलमानों की जान बचाई, उसकी चर्चा तक नहीं
दंगों के दौरान राज्य कानून-व्यवस्था के बहाने भी मोदी सरकार को घेरा गया। लेकिन मीडिया में इसकी कभी चर्चा नहीं हुई कि चुनौतीपूर्ण माहौल में गुजरात पुलिस ने किस तरह मुसलमानों की जान बचाई। माहुरकर बताते हैं, ‘‘गोधरा से 50 किलोमीटर दूर दाहोद जिले में एक गांव है-संजेरी। गोधरा दंगे के बाद आक्रोशित लाखों हिंदू सड़कों पर उतर आए थे। संजेरी गांव में करीब ढाई हजार मुसलमान ने शरण ले रखी थी। 8-10 हजार जनजातीय समुदाय का समूह, जो तीर-कमान और बंदूकों से लैस थे, उस गांव को घेर लिया। जान बचाने के लिए मुसलमान तीन इमारतों में छिप गए। उनके पास भी बंदूकें थीं। वे ताबड़तोड़ गोलियां चला रहे थे। जनजातीय लोगों ने उनकी गोलियां खत्म होने का इंतजार किया।

जब मुसलमानों की गोलियां खत्म हो गईं तो जनजातीय समुदाय के लोग मुसलमानों की ओर बढ़े। तब एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें रोका। इसके लिए हवाई फायरिंग भी की। इस तरह अधिकारी ने ढाई हजार मुसलमानों की जान बचाई। इसी तरह, बोडेरी में भी अलग-अलग गांव से 3,000 मुसलमान इकट्ठा हुए थे। उन्हें भी 10,000 तीर-कमान और बंदूक से लैस जनजातीय लोगों की टोली ने घेर लिया था। उस समय मुसलमानों को बचाने के लिए पुलिस को गोलियां चलानी पड़ी, जिसमें समुदाय के दो लोगों की मौत भी हुई थी। केवल दो घटनाओं में ही पुलिस ने 5,500 मुसलमानों की जान बचाई। इस तरह कई जगहों पर पुलिस ने मुसलमानों की जान बचाई।’’

बीते 20 साल से विपक्ष, पत्रकार, एनजीओ का इकोसिस्टम गुजरात दंगों के नाम पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि बिगाड़ने में जुटा हुआ है। लेकिन मोदी ने कभी इन पर पलटवार नहीं किया। क्या इन षड्यंत्रों के कारण अपनी छवि धूमिल करने के कुत्सित प्रयासों से नरेंद्र मोदी कभी आहत हुए, इस पर माहूरकर कहते हैं, ‘‘15 दिसंबर, 2002 को चुनाव जीतने के बाद नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार लेने के लिए उनके घर गया था।

साक्षात्कार के दौरान जब उन्हें बदनाम करने के लिए की गई कोशिशों को लेकर प्रश्न पूछा तो उनकी आंखें भर आई थीं। उन्होंने बस इतना कहा कि सामाजिक जीवन में ईमानदारी और पारदर्शिता के जो मापदंड हैं, मुख्यमंत्री बनने के बाद मैंने हमेशा उसका पालन किया है। लेकिन किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। राज्य के प्रति मेरी प्रतिबद्धता पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। ये मुझे खलनायक ही दिखाते रहे। यह कहते समय उनकी आंखों में आंसू छलक आए थे।’’ नरेंद्र मोदी मीडिया से अधिक बात नहीं करते, प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते, क्योंकि 2002 दंगों के बाद मीडिया के साथ उनके अनुभव कड़वे रहे। उन्हें लगता है कि मीडिया के एक बड़े वर्ग का एजेंडा पहले से तय है।

Topics: इकोसिस्टम गुजरात दंगेंएजेंडाधारी बुद्धिजीवी झूठगुलबर्ग सोसाइटी
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