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होम भारत

बढ़ता ई-कचरा, कराहती धरती

भारत में डिजिटल क्रांति के साथ ही ई-कचरा बढ़ता जा रहा है

Written byदीपक उपाध्यायदीपक उपाध्याय
May 24, 2022, 12:32 pm IST
in भारत, दिल्ली

भारत में डिजिटल क्रांति के साथ ही ई-कचरा बढ़ता जा रहा है। इससे मानव जीवन के साथ ही पारिस्थितिकी तंत्र को खासा खतरा है। सही ढंग से इसका निस्तारण न होने के भी खतरे हैं। सरकार ने ई-कचरा निस्तारण के लिए नीतियां बनाई हैं परंतु अभी जनजागरुकता शेष है

दिल्ली के मुस्तफाबाद इलाके में जैसे ही आप अंदर घुसते हैं, आपको छोटी-छोटी दुकानें दिखनी शुरू हो जाएंगी। उनके अंदर से लेकर बाहर तक, सभी ओर आपको कंप्यूटर, टीवी और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों का ढेर नजर आएगा। दरअसल ये इलाका दिल्ली एनसीआर के ई-कचरा को खरीदने-बेचने का एक केंद्र है। यहां कबाड़ी आपको इस ई-कचरा से अलग-अलग पार्ट्स निकालते हुए दिख जाएंगे।

देश में लगातार मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम की खरीद बढ़ रही है। कारों, फ्रिज आदि में भी बहुत सारा ऐसा सामान है, जो कि ई-कचरा का हिस्सा है। लेकिन ये भी लगातार बड़े ढेर में तब्दील होता जा रहा है। दिल्ली के मुस्तफाबाद से लेकर सीलमपुर में ये ढेर आपको गलियों में दिखने लगा है। लेकिन यहां से करीब 150 किलोमीटर दूर मुरादाबाद में देश का सबसे बड़ा ई-कचरा केंद्र है जो पूरे उत्तर भारत के साथ-साथ बेंगलुरु तक से सामान खरीदता है। यहां असालतपुरा और दूसरे एक-दो स्थानों पर सिर्फ ई-कचरा का काम ही होता है। पहले ये ई-कचरा यहां आता है, फिर राम गंगा के किनारे इसको धोया जाता है और फिर इसको अलग-अलग करके बेचा जाता है। यानी एक पूरी नदी ही इस ई-कचरा की भेंट चढ़ती जा रही है।

सोने की खान है मोबाइल का मदरबोर्ड
कबाड़ के बाजार में सबसे ज्य़ादा मांग मोबाइल के पत्ते यानी उसके मदरबोर्ड की होती है। मोबाइल के मदरबोर्ड में सोने की कुछ तारें होती है, जिनको पिघलाकर उसमें से सोना अलग किया जाता है और उस सोने को बेचा जाता है। जिन मोबाइल के मदरबोर्ड ठीक हालत में होते हैं, उन्हें एकत्र कर वापस चीन भी भेजा जाता है। इस ट्रेड के एक जानकार बताते हैं कि चीन में बड़ी संख्या में इन मदरबोर्ड को ठीक कर, इन्हें नए मोबाइल में तब्दील कर दिया जाता है। तभी तो वहां की कंपनियां इतने सस्ते मोबाइल बेच रही हैं। हालांकि कोरोना के बाद और चीन के साथ तनाव के बाद यहां से मदरबोर्ड लेकर जाने वाले लोगों की संख्या काफी कम हो गई है।

मोबाइल के अलावा लैपटॉप और कंप्यूटर में भी सोना और दूसरे उत्पाद निकलते हैं, जिन्हें निकालने के लिए पहले इन उत्पादों को साफ किया जाता है, फिर उन्हें कई बार केमिकल से धोया जाता है। इसके बाद फोन या लैपटॉप की प्लास्टिक, तारें और अन्य मेटल अलग-अलग कर दिए जाते हैं। इसके बाद इसके मदरबोर्ड को अलग कर दिया जाता है। इस कबाड़ के बाजार में सबसे ज्य़ादा फोकस मोबाइल के मदरबोर्ड पर होता है, स्थानीय भाषा में इसे पत्ता कहा जाता है। इसी पत्ते में सोना छुपा होता है। पूरे फोन में इसी वजह से इसकी कीमत सबसे ज्य़ादा होती है। कबाड़ियों को इसकी कीमत पता है, लिहाजा खराब फोन खरीदने के लिए लाइनें लगी रहती हैं।

ई-कचरा की स्थिति
एक रिपोर्ट के अनुसार चीन और अमेरिका के बाद भारत ई-कचरा उत्पादक देशों में तीसरे स्थान पर है। भारत के ई-कचरा उत्पन्न करने वाले 10 सबसे बड़े राज्यों में महाराष्ट्र पहले स्थान पर है। इसके बाद तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, कर्नाटक, गुजरात,मध्य प्रदेश और पंजाब हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में 2018-19 में केवल 10 प्रतिशत ई-कचरे की रिसाइक्लिंग हो सकी थी, जबकि इसी वर्ष देश में कुल 7,71,215 टन ई-कचरा का उत्पादन हुआ। इसके एक वर्ष पूर्व यानी 2017-18 में देश में ई-कचरा शोधन की क्षमता केवल 3.5 प्रतिशत थी। देश में ई-वस्तुओं का उपयोग तेजी के साथ बढ़ रहा है और 2019-20 में ही कुल ई-कचरे का उत्पादन 10,14,961 टन की सीमा को पार कर चुका है।

ई-कचरा निस्तारण
भारत में ई-कचरा को लेकर सरकार ने 2016 में एक पॉलिसी तैयार की थी, जिसमें कंपनियों को अपने उत्पाद से बना ई-कचरा खुद ही लेना और उसका निस्तारण करना था। इसमें भी सरकार ने इन कंपनियों पर सिर्फ 16 प्रतिशत का ही भार डाला था। बाकी के लिए सरकार ने रिसाइकलिंग कंपनियों को लाइसेंस देने के लिए कहा था। लेकिन राज्य सरकारों को इस पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2019 को स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्लास्टिक को पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बताया। प्लास्टिक के उपयोग को घटाने और रिसाइकिल प्लास्टिक का उपयोग बढ़ाने की बात भी कही। दिसंबर 2020 में प्रधानमंत्री ने इलेक्ट्रॉनिक कचरे को बेहतर ढंग से संभालने की आवश्यकता पर बात की थी।  बजट बाद के वेबिनार में प्रधानमंत्री ने स्टार्टअप जगत से ई-कचरा प्रबंधन पर अभिनव समाधान तलाशने का आह्वान किया

ब्राइट ई-कचरा रीसाइक्लिंग इंडिया के डायरेक्टर जावेद मलिक बताते हैं कि सरकार ने कुछ कंपनियों को रीसाइक्लिंग का लाइसेंस दिया है। यही कंपनियां इसको रीसाइकिल करती हैं, लेकिन इसमें एक बड़ी समस्या आ रही है। लाइसेंस कुछ ही कंपनियों को मिला है, जो बहुत ही कम मात्रा यानी सिर्फ 25 से 30 प्रतिशत ही ई-कचरे को रीसाइकिल कर पा रही हैं। बाकी का कबाड़ अभी भी खुले में ही रीसाइकिल किया जा रहा है। यानी उसको खुले में केमिकल से धोना और जलाना जारी है। जरूरत इस बात की है कि ये रीसाइक्लिंग कंपनियों में होने लगे। लेकिन सख्ती के अभाव में अभी भी कबाड़ का निस्तारण ठीक से नहीं हो रहा है।

खास बात ये है कि इस रीसाइक्लिंग के कारोबार में बड़ी संख्या में बच्चे भी लगे हैं। चाहे वो मुस्तफाबाद हो, सीलमपुर हो या फिर मुरादाबाद, हर जगह सस्ते मजदूर के चक्कर में बच्चों को इस खतरनाक काम में स्थानीय कबाड़ माफिया लगाए रखता है।

पर्यावरण को लेकर लंबे समय से काम कर रहे चंद्र भूषण बताते हैं कि कंपनियों के लिए सरकार ने ई-कचरा के लिए बड़े ही स्पष्ट नियम बनाए हुए हैं। कंपनियों को अपने ई-कचरा को खुद एकत्र करना है। उनको इसके लिए केंद्र बनाने थे, ताकि लोग अपने पुराने मोबाइल, टीवी, कंप्यूटर्स और दूसरे उपकरण वहीं पर दें, लेकिन कंपनियों ने आज तक ई-कचरा संग्रह केंद्र नहीं बनाए हैं। अब जब संग्रह केंद्र ही नहीं बने हैं तो फिर ई-कचरा कहां से रीसाइकलिंग कंपनियों में जाएगा। वो तो कबाड़ियों के जरिए से खुले में ही जलाया और तोड़ा जाएगा। इसकी वजह से ना सिर्फ प्रदूषण फैलता है, बल्कि जो लोग इस काम में लगे हैं, उनको गंभीर बीमारियां हो रही हैं। बच्चों तक को छोटी उम्र में इस काम की वजह से त्वचा से लेकर फेफड़ों तक की गंभीर बीमारियों से दो-चार होना पड़ रहा है।

ई-कचरा के खतरे
ई-कचरा को लेकर दुनियाभर में बहुत सारे संगठन काम कर रहे हैं जो ई-कचरा को लेकर जागरुकता फैला रहे हैं। डॉ. बीना बस्नेत के मुताबिक इस ई-कचरा में कई खतरनाक तत्व हैं, जिसमें पारा, कैडमियम, क्रोमियम, निकल और कई अन्य खतरनाक तत्व शामिल हैं। इसकी वजह से सबसे पहले त्वचा, आंख और फेफड़ों पर असर आता है जो धीरे-धीरे करके दिल तक पहुंच जाता है। इन खतरनाक तत्वों से व्यक्ति धीरे-धीरे बीमारियों से इस तरह से घिर जाता है कि वो लगातार बीमार रहने लगता है और उसका ठीक होना भी मुश्किल होने लगता है। साथ ही जहां भी इस तरह का काम हो रहा है, वहां की जमीन और वहां के पानी पर भी इसका असर होता है, पानी भी दूषित होने लगता है और आपके चाहने, ना चाहने के बाद भी आप इस तरह के पदार्थों के संपर्क में आ जाते हैं। बच्चों पर इसका सबसे ज्य़ादा असर होता है। बच्चों को इन पदार्थों से मानसिक बीमारियां भी होने लगती हैं। इसलिए ई-कचरा को ठीक प्रकार से प्रबंधित किया जाना बहुत जरूरी है।

प्रधानमंत्री ई-कचरे के निस्तारण पर गंभीर
ई-कचरा के प्रबंधन पर प्रधानमंत्री भी सचेत हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2019 को स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्लास्टिक को पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बताया। उन्होंने पहली बार के प्लास्टिक के उपयोग को घटाने और रिसाइकिल प्लास्टिक का उपयोग बढ़ाने की बात भी कही। दिसंबर 2020 में प्रधानमंत्री ने इलेक्ट्रॉनिक कचरे को बेहतर ढंग से संभालने की आवश्यकता पर बात की थी। अगस्त 2021 में उन्होंने बेहतर उपयोग के लिए कचरे के उपयोग पर ध्यान केंद्रित कर अपशिष्ट से धन मिशन की घोषणा की। फरवरी, 2022 में बजट बाद के वेबिनार में प्रधानमंत्री ने स्टार्टअप जगत से ई-कचरा प्रबंधन पर अभिनव समाधान तलाशने का आह्वान किया।

Topics: डायरेक्टर जावेद मलिकभारत में ई-कचरालैपटॉप और कंप्यूटरअमेरिका के बाद भारत ई-कचरा उत्पादक देशब्राइट ई-कचरारीसाइक्लिंग इंडिया
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