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सूबे को इंसेफेलाइटिस से मिली निजात

विषाणु जनित बीमारी इंसेफेलाइटिस की चपेट में वर्ष 2017 तक  50 हजार से अधिक बच्चों की मृत्यु हो चुकी थी. करीब 50 हजार बच्चे जीवन भर के लिए शारीरिक व मानसिक विकलांगता के शिकार हो गए. वर्ष 2017 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के  बाद योगी आदित्यनाथ ने समन्वित प्रयासों के लिए  "दस्तक" अभियान चलाया

Written byलखनऊ ब्यूरोलखनऊ ब्यूरो
Apr 6, 2022, 03:48 pm IST
in भारत, उत्तर प्रदेश

पूर्वी उत्तर प्रदेश में वर्ष 1978 में पहली बार दस्तक देने वाली  विषाणु जनित बीमारी इंसेफेलाइटिस की चपेट में वर्ष 2017 तक  50 हजार से अधिक बच्चों की मृत्यु हो चुकी थी. करीब 50 हजार बच्चे जीवन भर के लिए शारीरिक व मानसिक विकलांगता के शिकार हो गए. वर्ष 2017 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के  बाद योगी आदित्यनाथ ने समन्वित प्रयासों के लिए  “दस्तक” अभियान चलाया. इस अभियान का परिणाम है कि प्रदेश इंसेफेलाइटिस मुक्त हो चुका है.

एक दौर था जब गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज के इंसेफलाइटिस वार्ड में एक बेड पर दो से तीन बच्चों को भर्ती करना पड़ता था. अब इस वार्ड के   बेड खाली रहने लगे हैं. उल्लेखनीय है कि

    • वर्ष 1956 में देश मे पहली बार तमिलनाडु में इस बीमारी का पता चला था.  इंसेफेलाइटिस का वायरस नर्वस सिस्टम पर हमला करता है इसलिए जन सामान्य की भाषा में इसे मस्तिष्क ज्वर या दिमागी बुखार कहा जाने लगा.
    • वर्ष  1978 से इस बीमारी ने अपना प्रकोप शुरू किया. हर वर्ष जून माह से अक्टूबर तक ये बीमारी तबाही मचाती थी. ये महीने गोरखपुर और बस्ती मंडल के लोगों के लिए बहुत भयावह होते थे. इस बीमारी से ग्रामीण जनता अधिक प्रभावित होती थी.
    • वर्ष 1978 से वर्ष 2016 तक पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रतिवर्ष औसतन 1200 से 1500 बच्चों की  इंसेफेलाइटिस के कारण मृत्यु होती थी. जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) के नाम से शुरू यह बीमारी बाद में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) के रूप में भी पहचानी गई. वर्ष 2017 के बाद इंसेफेलाइटिस पर नियंत्रण के उपाय किये गए. हर वर्ष यह बीमारी नियंत्रित होती चली गई.

 पूर्वी उत्तर प्रदेश में इंसेफेलाइटिस के इलाज का केंद्र बिंदु गोरखपुर मेडिकल कॉलेज ही था. मरीजों की संख्या के मुकाबले वहां पर तब इंतजाम भी पर्याप्त   नहीं थे. योगी आदित्यनाथ ने सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी-पीएचसी) को इंसेफेलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर के रूप में विकसित कर इलाज की सभी सुविधाएं सुनिश्चित कराया. सीएचसी-पीएचसी स्तर पर विशेषज्ञ चिकित्सकों के साथ मिनी पीकू (पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट) की व्यवस्था कराई गई .

गोरखपुर, देवरिया, महराजगंज, कुशीनगर, बस्ती, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर के अलावा यूपी की सीमा से लगे बिहार के गोपालगंज, बगहा, सिवान तथा  नेपाल की तराई के जिलों से इंसेफेलाइटिस रोगी पहले बीआरडी मेडिकल कॉलेज ही उपचार के लिए आते थे. यूपी में सरकार के प्रयासों से बीमारी नियंत्रित हुई है तो जिलों में सीएचसी और पीएचसी स्तर पर बेहतर चिकित्सकीय सुविधा मिलने से बीआरडी में आने की जरूरत नहीं के बराबर पड़ रही है.

वर्ष 2016 में 1765 इंसेफेलाइटिस मरीज भर्ती हुए थे जिनमें से 466 की मौत हो गई थी. योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद  गोरखपुर में एईएस के 817 और जेई के 52 मरीज मिले. मरीजों की संख्या कम होने के साथ ही मृत्यु की संख्या में भी कमी आई. गोरखपुर में वर्ष 2017 में मृत्यु का  ग्राफ घटकर  124 पर आ गया. वर्ष 2020 में जेई व एईएस मिलाकर 240 मरीज भर्ती हुए. मृत्यु का आंकड़ा भी गिरकर 15 पर सिमट गया। 2021 में गोरखपुर में एईएस के सिर्फ 219 मरीज आए जिनमे से 15 की मृत्यु हुई.

Topics: इंसेफेलाइटिस के इलाजजापानी इंसेफेलाइटिस (जेई)विषाणु जनित बीमारी इंसेफेलाइटिस
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