भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु : राष्ट्र के लिए त्याग और बलिदान की मिसाल
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भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु : राष्ट्र के लिए त्याग और बलिदान की मिसाल

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 23, 2022, 12:20 am IST
inभारत, दिल्ली
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को हालांकि अलग-अलग मामलों में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन पुलिस ने तीनों को जॉन सॉन्डर्स की हत्या के लिए आरोपित किया। गिरफ्तारी के बाद सॉन्डर्स की हत्या में शामिल होने के आरोप में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव पर देशद्रोह तथा हत्या का मुकदमा चलाया गया और उन्हें मौत की सजा सुनाई।

योगेश कुमार गोयल

अंग्रेजों से भारत को आजाद कराने के लिए स्वतंत्रता आंदोलन में अनेक वीर सपूतों ने अपने प्राण न्यौछावर किए। 23 मार्च के दिन भारत मां के वीर सपूतों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को अंग्रेजों ने ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या के आरोप में फांसी दी थी। इन वीर सपूतों को 24 मार्च 1931 को फांसी दी जानी थी, लेकिन इनके बुलंद हौसलों से भयभीत ब्रिटिश सरकार ने जन आन्दोलन को कुचलने के लिए उन्हें एक दिन पहले 23 मार्च को ही फांसी दे दी थी।

28 सितम्बर 1907 को जन्मे भगत सिंह ने अपने 23 वर्ष के छोटे से जीवनकाल में वैचारिक क्रांति की ऐसी मशाल जलाई थी, जिससे आज के दौर में भी युवा काफी प्रभावित हैं। भगत सिंह जब पांच साल के थे, तब एक दिन अपने पिता के साथ खेत में गए और वहां कुछ तिनके चुनकर जमीन में गाड़ने लगे। पिता ने उनसे पूछा कि यह क्या कर रहे हो तो मासूमियत से भगत सिंह ने जवाब दिया कि मैं खेत में बंदूकें बो रहा हूं। जब ये उगकर बहुत सारी बंदूकें बन जाएंगी, तब इनका उपयोग अंग्रेजों के खिलाफ करेंगे। शहीदे आजम भगत सिंह ने स्वतंत्रता सेनानी चन्द्रशेखर आजाद से अपनी पहली मुलाकात के समय ही जलती मोमबती की लौ पर हाथ रखकर कसम खाई थी कि उनका समस्त जीवन वतन पर ही कुर्बान होगा।

राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह तीनों की विचारधारा एक थी, इसीलिए तीनों की मित्रता बेहद सुदृढ़ और मजबूत थी। भगत सिंह और सुखदेव के परिवार लायलपुर में आसपास ही रहते थे और दोनों परिवारों में गहरी दोस्ती थी। 15 मई 1907 को पंजाब के लायलपुर में जन्मे सुखदेव, भगत सिंह की ही तरह बचपन से आजादी का सपना देख रहे थे। 24 अगस्त 1908 को पुणे के खेड़ा में जन्मे राजगुरु छत्रपति शिवाजी महाराज की छापामार शैली के प्रशंसक थे और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से काफी प्रभावित थे। अच्छे निशानेबाज रहे राजगुरु का रुझान जीवन के शुरुआती दिनों से ही क्रांतिकारी गतिविधियों की तरफ होने लगा था। वाराणसी में उनका सम्पर्क क्रांतिकारियों से हुआ और वे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से जुड़ गए। चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह और जतिन दास राजगुरु के अभिन्न मित्र थे।

राजगुरु ने पुलिस के बर्बर लाठीचार्ज के कारण स्वतंत्रता संग्राम के दिग्गज नेता लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए 19 दिसम्बर 1928 को भगत सिंह के साथ मिलकर लाहौर में जॉन सॉन्डर्स को गोली मारकर स्वयं को गिरफ्तार करा दिया था और भगत सिंह वेश बदलकर कलकत्ता निकल गए थे, जहां उन्होंने बम बनाने की विधि सीखी। भगत सिंह बिना कोई खून-खराबा किए ब्रिटिश शासन तक अपनी आवाज पहुंचाना चाहते थे, लेकिन तीनों क्रांतिकारियों को अब यकीन हो गया था कि पराधीन भारत की बेडि़यां केवल अहिंसा की नीतियों से नहीं काटी जा सकती, इसीलिए उन्होंने अंग्रेजों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीतियों के पारित होने के खिलाफ लाहौर की केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंकने की योजना बनाई।

चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में 'पब्लिक सेफ्टी' और 'ट्रेड डिस्प्यूट बिल' के विरोध में सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने के लिए 1929 में 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' की पहली बैठक हुई। योजनाबद्ध तरीके से भगत सिंह ने 8 अप्रैल 1929 को बटुकेश्वर दत्त के साथ केन्द्रीय असेंबली में एक खाली स्थान पर बम फेंका, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि वे चाहते तो भाग सकते थे, लेकिन भगत सिंह का मानना था कि गिरफ्तार होकर वे बेहतर ढंग से अपना संदेश दुनिया के सामने रख पाएंगे। असेंबली में फेंके गए बम के साथ कुछ पर्चे भी फेंके गए थे, जिनमें भगत सिंह ने लिखा था, 'आदमी को मारा जा सकता है, उसके विचारों को नहीं। बड़े साम्राज्यों का पतन हो जाता है लेकिन विचार हमेशा जीवित रहते हैं और बहरे हो चुके लोगों को सुनाने के लिए ऊंची आवाज जरूरी है।'

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को हालांकि अलग-अलग मामलों में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन पुलिस ने तीनों को जॉन सॉन्डर्स की हत्या के लिए आरोपित किया। गिरफ्तारी के बाद सॉन्डर्स की हत्या में शामिल होने के आरोप में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव पर देशद्रोह तथा हत्या का मुकदमा चलाया गया और उन्हें मौत की सजा सुनाई। इसी मामले को बाद में 'लाहौर षड्यंत्र केस' के नाम से जाना गया। भगत सिंह और उनके साथियों ने 64 दिनों तक भूख हड़ताल की। 23 मार्च 1931 की शाम करीब 7:33 बजे भारत मां के इन तीनों महान वीर सपूतों को फांसी दे दी गई।

भगत सिंह कहा करते थे कि एक सच्चा बलिदानी वही है, जो जरूरत पड़ने पर सबकुछ त्याग दे। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव भारत माता के ऐसे सच्चे सपूत थे, जिन्होंने देशप्रेम और देशभक्ति को अपने प्राणों से भी ज्यादा महत्व दिया। ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले इन तीनों महान स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को देश सदैव याद रखेगा। वतन के लिए त्याग और बलिदान इनके लिए सर्वोपरि रहा। इनके विचार आज भी देश के करोड़ों युवाओं का मार्गदर्शन करते हैं।

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