भारत की भारतीयता का रूप सदैव गतिशील रहा है : डॉ. हरिवंशराय बच्चन
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भारत की भारतीयता का रूप सदैव गतिशील रहा है : डॉ. हरिवंशराय बच्चन

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jan 19, 2022, 09:24 am IST
inभारत, साक्षात्कार, दिल्ली
डॉ हरिवंश राय बच्चन

डॉ हरिवंश राय बच्चन

‘जिज्ञासाएं मेरी:समाधान बच्चन के’ लेखक कमल किशोर गोयनका द्वारा किया गया एक ऐसा प्रयास है जिसमें लोकप्रिय कवि डॉ हरिवंश राय बच्चन के जीवन, सृजन-प्रक्रिया, विचार तथा साहित्य को प्रश्नोत्तर के माध्यम से पहली बार समझने की चेष्टा की गई। इस पुस्तक के लिए बच्चन जी से हिन्दी धर्म, औद्योगिकीकरण, पश्चिमीकरण, भारतीयता आदि पर हुई बातचीत को पाञ्चजन्य ने 1 दिसम्बर 1985 के अंक में प्रकाशित किया था। प्रस्तुत है पाञ्चजन्य अभिलेखागार से उस साक्षात्कार के कुछ अंश 

बच्चन जी, आज के अर्थप्रधान युग में आप धर्म की क्या उपयोगिता मानते हैं?
धर्म से आपका तात्पर्य चाहे विश्वास हो चाहे नैतिकता, अर्थ संजोने में आपकी सहायता नहीं कर सकेगा। अगर आपका सिद्धांत है ‘‘सर्वं खल्विदं अर्थ’’ तो आप धर्म से पूरी तरह पल्ला झाड़ लें। अगर आपका सिद्धांत अर्थ प्राधान्य है तो किसी और के लिए स्थान की संभावना आप देखते हैं। उसमें धर्म को भी आप स्थान दे सकते हैं।

आपने लिखा है कि मनुष्य को सभ्य रखने का काम कभी धर्म ने किया था, अब इसे साहित्य और कला को करना है। 
धर्म ने मनुष्य को सभ्य बनाने का काम प्राय: प्रलोभन और भय के माध्यम से किया। विज्ञान-सचेत जातियों में धर्म पुराने माध्यम से काम न कर सकेगा। पुराना धर्म एक तरह से निरर्थक हो जाएगा, पर मनुष्य को सभ्य बनाने की आवश्यकता तो रहेगी। यह काम साहित्य-कला के द्वारा किया जा सकता है।
सुशिक्षित जातियों में यह काम एक सदी पहले शुरू हो गया था। मैथ्यू आर्नल्ड (1922-88) ने सबसे पहले साहित्य को धर्म का स्थानापन्न बनाने की बात कही थी।

क्या आपको यह नहीं लगता कि जैसे-जैसे धर्म का प्रभाव कम होता जा रहा है, वैसे-वैसे समाज भी भ्रष्ट होता जा रहा है?
हमारी व्यक्तिगत एवं सामाजिक नैतिकता जिन विश्वासों पर आधारित थी उन पर संदेह होने लगा है। वे शीघ्रता से टूटते जा रहे हैं। तोड़ने वाला विज्ञान है, आधुनिक युग की तार्किकता है। युगीन तार्किकता और वैज्ञानिकता ने अभी अपनी नैतिकता नहीं गढ़ी। वह गढ़ेगी, पर पहले अपनी तार्किकता और वैज्ञानिकता का भीषण परिणाम देखकर।

आपने ‘प्रवास की डायरी’ में लिखा है कि आधुनिक युग में आधुनिक बनकर जीने की हिन्दुत्व में पूरी क्षमता है। कृपया हिन्दुत्व से अपना अभिप्राय स्पष्ट करें।
हिन्दू धर्म को जैसा मैंने समझा है वह अत्यंत प्रजातांत्रिक (जिसमें हर एक की वैयक्तिक स्वतंत्रता सम्मानित है), अत्यंत मनोवैज्ञानिक, अत्यंत कवित्वपूर्ण और अत्यंत शांतिप्रद है। यह सर्वथा रूढ़िमुक्त और उसी से शायद सर्वधर्म सहिष्णु है। संसार के अन्य धर्मों में यह गुण नहीं। इसी कारण वह और रिलीजन के समान धर्म नहीं। वह अपने स्वभाव के अनुरूप जीवन जीने की विधा की शोध और उसके अनुसरण का अभियान है।

हिन्दू धर्म की क्षमता के संबंध में कुछ बतायें।
हिन्दुत्व उस अर्थ में ‘धर्म’ नहीं है जिस अर्थ में ईसाइयत या इस्लाम है। हिन्दुत्व विकासशील धर्म है। वैदिक युग से चलकर बीसवीं सदी तक उसने अपने को कितना बदला है। व्यक्ति-व्यक्ति के बौद्धिक स्तरों और मानसिक स्थितियों की विविधता को स्वीकार कर उसने किसी पर किसी प्रकार की रूढ़ि लादने का प्रयत्न नहीं किया। राजनीतिक शब्दावली में कहें तो हिन्दुत्व आदर्श प्रजातांत्रिक धर्म है, जिसमें हर व्यक्ति को अपनी स्थापनाएं, आस्थाएं, मान्यताएं निश्चित करने की स्वतंत्रता है। इसे स्वतंत्रता की उत्कटता ही कहेंगे। आधुनिक युग विज्ञान का युग है और विज्ञान अपनी नित नयी खोजों से जीवन में नित नए परिवर्तन कर रहा है। उन परिवर्तनों के साथ पटरी बिठाने की क्षमता उसी में हो सकती है जो किसी प्रकार की रूढ़ि से आबद्ध न हो और उस श्रेणी में हिन्दू सबसे आगे खड़ा होगा।

भारत में आजादी के बाद पश्चिम निरन्तर हावी होता जा रहा है।
भारत इस समय पश्चिम को आत्मसात करने की प्रक्रिया में है। पश्चिम के आवश्यक आने के साथ कुछ अनावश्यक भी आएगा, पर मुझे विश्वास है कि भारत आवश्यक को हजम कर अनावश्यक को उगल देगा। संक्रांति काल में हम नजर रखें कि अनावश्यक क्या आ रहा है और उसके विरुद्ध राष्ट्र को आगाह करते रहें।
                    (पाञ्चजन्य:1 दिसम्बर, 1985)

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